हो सकता है आप कभी राजस्थान (Rajasthan) न पधारे हों. लेकिन ये बात तो तय है कि राजस्थान आप तक किसी न किसी जरिए से ज़रूर आया होगा. कभी दाल-बाटी चूरमा जैसे मन ललचा देने वाले व्यंजन के रूप में तो कभी 'केसरिया बालम' जैसे प्रचलित गीत की धुन बनकर. अब ये गीत इस अलबेले राज्य की पहचान ही नहीं, बल्कि आन, बान, शान सब कुछ बन चुका है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि मौजूदा समय में देश-दुनिया के न जाने कितने लबों पर बसने वाले इस गीत को पहचान दिलाने का क्रेडिट किसे जाता है? नहीं, तो आइए आज हम आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं. 

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क्या है 'केसरिया बालम' का असल मीनिंग?

'केसरिया बालम' राजस्थान राज्य का एक लोकगीत है. ये राज्य के सबसे पॉपुलर लोक संगीतों में से एक है. गाने को मांड गायन शैली में गाया गया है. 'केसरिया' का प्रतीकात्मक अर्थ है अच्छा स्वास्थ्य और सौंदर्य. 'बालम' शब्द का यूज पति या प्रेमी के लिए किया जाता है. इस गाने में राजस्थानी महिलाएं अपने पति या प्रेमी को अपने वतन आने और उसे देखने का न्योता भेज रही है.

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किसने दी इस गाने को आवाज़?

न जाने कितनी सदियों से राजस्थान की मिट्टी में रजने-बसने वाले 'केसरिया बालम' को अल्लाह जिलाई बाई ने अपनी आवाज़ दी थी. 1 फरवरी 1902 को बीकानेर में जन्मीं अल्लाह जिलाई बाई राजस्थान की एक मशहूर लोक गायिका थीं. उन्होंने संगीत की शिक्षा उस्ताद हुसैन बक्श खान से ली थी.

ऐसे निख़रा अल्लाह जिलाई बाई का हुनर

इसके अलावा अगर अल्लाह जिलाई बाई को प्रशिक्षित गायिका बनाने का श्रेय बीकानेर के राजा महाराजा गंगा सिंह को दिया जाए तो बिल्कुल भी अतिशयोक्ति नहीं होगी. महाराजा ने उनका हुनर तभी पहचान लिया था जब वो मात्र 10 साल की थीं. जिसके बाद उन्हें संगीत के महा ज्ञानियों ने ट्रेनिंग दी. संयोग देखिए कि अल्लाह जिलाई बाई ने महाराजा गंगासिंह के दरबार में ही पहली बार 'केसरिया बालम' गाया था. उस वक़्त मानो ऐसा लगा था कि राजस्थान की बंजर ज़मीन जिलाई बाई के सुरों की नदियों में डूब गई हो.

समय के साथ अल्लाह जिलाई बाई संगीत में माहिर हो गईं. अपने शिक्षक से उन्होंने मांड, ठुमरी, ख्याल और दादरा जैसी सभी शैलियों में गाना सीखा था. ये शायद उसी गंगा-जमुनी तहजीब का कमाल था जो इस्लाम से ताल्लुक रखने वाली बाई जी के स्वर पाकर ‘हिंदू केसरिया’ निखर गया था.

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भारत सरकार ने किया सम्मानित 

महाराजा गंगा सिंह का निधन होने के बाद अल्लाह जिलाई बाई ने अपनी कला को और पंख दिए. नतीजा ये हुआ कि वो ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से अपने संगीत की प्रस्तुति देने लगीं. इस तरह उनकी आवाज़ देश-दुनिया में लोकप्रिय हो गई. लोग उनके गाने बड़े चाव से सुनने लगे. संगीत में उनके अतुल्य योगदान के लिए 1982 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया.

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आज 'केसरिया बालम' गाने के कई सारे वर्ज़न निकल चुके हैं. लेकिन अल्लाह जिलाई बाई द्वारा गाए इस गाने की टक्कर का कोई नहीं है.