वो भी क्या दिन थे? स्कूल का नाम सुन जब कोई ऐसा फर्जी नोस्टेलजिया पेलता है, तो उसे लोटाकर कूटने का मन करता है. अबे अपन ने स्कूल में दिन देखा ही कब. सारा टाइम तो क्लास में माथा फोड़ते थे. बैग में किताबें इतनी ज़्यादा थीं कि उसमें अपनी ख़ुशी रखने की कभी जगह ही नहीं बची. सच कहूं तो बस्ता सेट करते-करते सारा बचपना बिगड़ गया. 

ऊपर से 90s की किताबें, हाय तौबा! उन्हें देख लगता था, मानो हम नरक में बैठकर अपने पापों का हिसाब पढ़ रहे हैं. ऐसे में आज हम सोचे काहे नहीं आज आप लोगों संगे मिलकर स्कूल की उन किताबों को याद कर लिया जाए, जिन्हें हम कभी बचपन में याद करने की हिम्मत न कर पाए. 

तो ये रहीं स्कूल की वो महा-भयंकर किताबें, जिन्होंने ज़िंदगी को जहन्नुम सरीखा बना दिया था.

1. अमा जो स्कूली बच्चे अपने मोहल्ले में खो जाते हों, उन्हें दुनियाभर का नक्शा क्या ख़ाक याद होगा. 

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2. संस्कृत के नाम पर हम सिर्फ़ अयम्-यूयम्-मयम् ही बोल पाए हैं, पठति-पठत:-पठंति से हमारा कभी संबंध नहीं रहा.

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3. भौतिकी की किताब देखकर हम आज भी भौंकने लगते हैं, सोचिए बचपन में क्या हाल होता होगा.

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4. इस किताब को पकड़ते ही मेरे हाथ तब भी पसीना छोड़ते थे, और आज भी कुछ बदला नहीं.

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5. दिल पर हाथ रख कर कसम खाओ और बताओ, इस ससुरी किताब से मिले ज्ञान का कहां इस्तेमाल किये हो?

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6. इन किताबों ने हमारा भूत-वर्तमान-भविष्य तीनों खराब किया था. 

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7. साइंस लेकर इतराने वालों कभी कॉमर्स में अपना अकाउंट खुलवाकर देखो, दिमाग़ से दिवालिया हो जाओगे.

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8. मीन, मीडियन, मोड पढ़कर मूड खराब करने से बेहतर अर्थव्यवस्था ही तबाह कर देना था.

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9. अपना सीधा हिसाब था, जिस भी किताब के आगे-पीछे साइंस लग जाए, उसे छूना भी नहीं.

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10. हिंदी मीडियम वालों को ये किताब अचानक क्रांतिकारी बना देती थी, 'अंग्रेज़ों भारत छोड़ो'

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