ये बात है 4 मई ,1999 की.

रात के सन्नाटे में 21 सिपाही टाइगर हिल तक चढ़ाई कर रहे थे. 7 सिपाही बाकी सिपाहियों से ज़रा आगे चल रहे थे. इन सात सिपाहियों में से ही एक थे सुबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव.

ये कहानी है वीर सुबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव की, जिनकी वीरता ने कारगिल युद्ध का परिणाम बदल दिया.

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले योगेंद्र, मात्र 16 वर्ष और 5 महीने की उम्र में भारतीय सेना में शामिल हो गए थे. उनकी प्लाटून 'घातक' को टाइगर हिल के 3 बंकर्स पर कब्ज़ा करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी.

योगेंद्र को सेना में शामिल हुए ढाई साल ही हुए थे और उनके पास ज़्यादा अनुभव भी नहीं था. कुछ था, तो वो था मातृभूमि के लिए हर हद पार कर जाने का जुनून.

5 मई 1999 की सुबह योगेंद्र की बटालियन '18th Grenadiers' टाइगर हिल की चोटी पर पहुंची और उन पर दुश्मनों ने 3 दिशाओं से हमला कर दिया. सिपाहियों के पास ज़्यादा हथियार नहीं थे लेकिन वे बहादुरी से लड़े, 7 में से 6 जवान शहीद हो गए.

योगेंद्र को 17 गोलियां लगीं, लेकिन देशप्रेम और मातृभूमि की सुरक्षा की भावना ने जान को जिस्म से जुदा होने नहीं दिया. उन्होंने कुछ देर तक मरने का नाटक किया ताकी पाकिस्तानी सिपाहियों की बातचीत सुन सकें.

योगेंद्र ने सुना कि पाकिस्तानी सेना भारत के मीडियम मशीन गन पोस्ट पर हमले की योजना बना रही है. काफ़ी ख़ून बहने के बावजूद ज़िन्दा रहना चाहते थे और भारतीय सेना तक ये बहुमू्ल्य जानकारी पहुंचाना चाहते थे.

इसी बीच 2 पाकिस्तानी सिपाहियों ने मृत भारतीय सैनिकों की मृत्यु सुनिश्चित करने के लिए गोलियां चलानी शुरू कर दी. योगेंद्र को सीने में गोली लगी और उन्हें लगा अब बचने का आख़िरी मौका भी चला गया. तभी एक पाकिस्तानी सिपाही का पैर योगेंद्र के पैर को छुआ और योगेंद्र को लगा कि वो ज़िन्दा हैं.

दर्द में होने के बावजूद, योगेंद्र ने शांति से एक ग्रेनेड निकाला और पाकिस्तानी सिपाहियों की ओर फेंका. वो ग्रेनेड पाकिस्तानी सिपाही के जैकेट में जा गिरा और इससे पहले की वो कुछ समझ पाता, एक ज़ोरदार धमाका हुआ.

इतनी गोलियां लगने के बावजूद, योगेंद्र ने एक राइफ़ल उठाई और दुश्मनों पर अंधा-धुंध फ़ायरिंग शुरू कर दी. दुश्मन सिपाहियों को भ्रमित करने के लिए वो जगह बदल-बदलकर फ़ायर कर रहे थे. सिपाहियों को लगा कि भारतीय सिपाहियों का दल वहां पहुंच चुका है और वो भाग निकले.

योगेंद्र वहां से कुछ मीटर तक रेंगकर आगे बढ़े और उन्हें पाकिस्तानी सेना का बेस, उनके टैंक और मोटर पोज़िशन दिखाई दिए. वो जल्द से जल्द ये जानकारी अपनी यूनिट तक पहुंचाना चाहते थे.

आगे बढ़ने से पहले योगेंद्र अपने 6 साथियों के पास वापस पहुंचे. लेकिन वो सभी शहीद हो गए थे. योगेंद्र अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाए और साथियों के क्षत-विक्षत शरीर देख कर रो पड़े.

योगेंद्र ने ख़ुद को संभाला, अपना टूटा हाथ अपने कंधे पर डाला और साथियों की दिशा में रेंगने लगे (17-18 गोलियां लगी थीं उन्हें, चलना दूभर था). जैसे-तैसे वे एक छोटी से गड्ढे तक पहुंचे और वहां बाकी सैनिकों का इंतज़ार करने लगे.

कुछ देर बाद भारतीय सैनिकों ने उन्हें देख लिया और गड्ढे से बाहर निकाला. योगेंद्र को कमांडिंग अफ़स करनल कुशल चंद ठाकुर के पास ले जाया गया, जहां उन्होंने पूरा आंखों-देखी कहानी सुना दी. इसके बाद योगेंद्र बेहोश हो गए.

श्रीनगर के एक अस्पताल में 3 दिन बाद उनकी आंख खुली. तब तक भारतीय सेना ने टाइगर हिल पर कब्ज़ा कर लिया था.

26 जनवरी, 2006 को सुबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव को राष्ट्रपति के.आर.नारायणन द्वारा परम वीर चक्र द्वारा सम्मानित किया गया.

यहां देखिए इस वीर का इंटरव्यू-

ये थी वतन के मर-मिटने वाले एक वीर सपूत की कहानी. गर्व है आप पर योगेंद्र जी.