देश की आज़ादी के लिए कई क्रांतिकारियों ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी. आज उन्हीं क्रांतिकारियों की वजह से हम आज़ाद होकर सांस ले पा रहे हैं. अंग्रेज़ी हुकूमत की उस घुटन भरी ज़िंदगी को पैरों तले रौंदकर भारत मां के हज़ारों लालों ने देश के एक उज्जवल भविष्य के लिए ख़ुद को क़ुर्बान कर दिया था.

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भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल जैसे क्रांतिकारियों के बारे में तो आप सभी सुना ही होगा. लेकिन आज हम आपको देश के उन छोटे शहरों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने देश की आज़ादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

1- मेरठ

साल 1857, मेरठ स्वाधीनता संग्राम का बिगुल फ़ूंकने वाला पहला शहर था. वो ऐतिहासिक दिन 10 मई ही था, जब भारत की आज़ादी के लिए पहली चिंगारी भड़की थी. अंग्रेज़ों को भारत से खदेड़ने के लिए पूरे देश में एक साथ बिगुल बजाना था, लेकिन मेरठ में तय तारीख से पहले ही अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नींव साल 1857 में सबसे पहले मेरठ के सदर बाजार में भड़की, जो पूरे देश में फैल गई. ये चिंगारी उस वक्त भड़की जब पूरे देश में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जनता में गुस्सा भरा था. 11 मई की सुबह यहां से भारतीय सैनिक दिल्ली के लिए रवाना हुए और 14 मई को दिल्ली पर हमला बोलकर उसे अपने कब्जे में ले लिया.

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2- बैरकपुर

प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सूत्रपात इसी स्थान से हुआ था, जब मंगल पांडेय नामक सैनिक ने गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों के इस्तेमाल के विरोध में 29 मार्च 1857 अंग्रेज़ अफ़सरों पर गोलियां चला दी थीं. इस घटना को ही 1857 के विद्रोह की शुरुआत माना जाता है. बैरकपुर परेड ग्राउंड में मंगल पांडे ने क्वार्टर गार्ड से निकल कर गोली चलाई थी और अपने साथियों को हुंकारा था– 'निकलि आव पलटुन, निकलि आव हमार साथ'. बैरकपुर भारत में अंग्रेज़ों की बसाई पहली छावनी थी. सेना की टुकड़ियों के निवास के कारण इसका नाम 'बैरकपुर' पड़ा.

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3- झांसी

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की महान वीरांगना के रूप में जानी जाती हैं. अंग्रेज़ों की भारतीय राज्यों को हड़पने की नीति के विरोध में उन्होंने ही पहली हुंकार 'अपनी झांसी नहीं दूंगी' भरी थी. झांसी की आन, बान और शान के लिए लक्ष्मीबाई ने पीठ पुत्र दामोदर राव को बिठाकर और घोड़े पर सवार होकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ युद्ध का उद्घोष किया था.

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4- दांडा (दांडी)

ब्रिटिश सरकार द्वारा निष्पक्ष व्यवहार ना होता देख 1 अगस्त, 1920 को महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की. ये आंदोलन 1922 तक चला और सफ़ल रहा. इसके बाद महात्मा गांधी ने मार्च 1930 में अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से 388 किमी दूर समुद्र के किनारे बसे दांडा (दांडी) शहर तक 'दांडी यात्रा' यानि कि 'नमक आंदोलन' की शुरुआत की. इस दौरान गांधी जी के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ों के एकछत्र अधिकार वाला कानून तोड़ा और नमक बनाया था.

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5- गोरखपुर

20 वीं सदी की शुरुआत से गोरखपुर भी क्रांतिकारियों का गढ़ माना जाता था. 5 फ़रवरी, 1922 की 'चौरी चौरा' घटना को स्वतंत्रता से पहले भारत की सबसे प्रमुख घटनाओं में से एक माना जाता है. इसी दिन 'चौरी चौरा' थाने के दारोगा गुप्तेश्वर सिंह ने आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे वॉलेंटियरों की खुलेआम पिटाई शुरू कर दी थी. इसके बाद सत्याग्रहियों की भीड़ पुलिसवालों पर पथराव करने लगी. जवाबी कार्यवाही में पुलिस ने गोलियां चलाई, जिसमें लगभग 260 व्यक्तियों की मौत हो गई थी. पुलिस की गोलियां तब रुकीं जब उनके सभी कारतूस समाप्त हो गए. इसके बाद सत्याग्रहियों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होनें थाने में बंद 23 पुलिसवालों को जिंदा जला दिया. इस घटना के बाद महात्मा गांधी ने 'असहयोग आंदोलन' वापस ले लिया था.

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6- बनारस

यूपी के बनारस की भी देश के स्वाधीनता संग्राम में अहम भूमिका रही है. बनारस यानि कि उस वक़्त का काशी देश के क्रांतिकारियों का गढ़ माना जाता था. भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों ने देश की आज़ादी के लिए यहीं पर रहकर नीतियां बनाया करते थे. साल 1905 में बंगाल विभाजन की पृष्ठभूमि में कांग्रेस का अधिवेशन वाराणसी में ही संपन्न हुआ था. इसमें 'गरम दल' के नेता विशेष रूप से सक्रिय रहे और उन्होंने पुरानी सड़ी गली नीतियों की जमकर आलोचना की. इसके साथ ही उन्होंने विदेशी उत्पादों के बहिष्कार और स्वदेशी आंदोलन पर भी जोर दिया था.

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7- मैनपुरी

स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान अंग्रेज़ों को देश से बाहर निकालने के लिये उत्तर प्रदेश के मैनपुरी ज़िले में सन 1915-16 में एक क्रान्तिकारी संस्था 'मातृवेदी' की स्थापना हुई थी. इस संस्था ने छिप कर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आज़ादी की नीति तैयार की थी. जब अंग्रेज़ी हुकूमत को इस षड्यंत्र का पता चला तो उसने इस संस्था के 6 क्रांतिकारियों को पकड़ लिया. पकड़े गए क्रांतिकारियों के लीडर रामप्रसाद बिस्मिल थे, लेकिन पुलिस उन्हें पकड़ नहीं पाई. इस षड्यंत्र का फ़ैसला आने के 2 साल बाद तक बिस्मिल भूमिगत रहे.

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8- कोल्हापुर

सन 1844 में अंग्रेज़ों ने दाजी कृष्ण पंडित नाम के एक नए कर्मचारी की राज्य में नियुक्ति करके उसके द्वारा दोनों राजकुमारों को कैद करने का षड़्यंत्र रचा. प्रजा सजग हो गई और अंग्रेज़ अफ़सरों को ही कैद किया जाने लगा. कई किले अंग्रेज़ों से छीन लिए गए. जिसे 'कोल्हापुर विद्रोह' भी कहा जाता है. साथ ही अंग्रेज़ी खजाने लूट लिये गए. अंग्रेज़ रक्षक मार डाले गए. कर्नल ओवांस को कैद कर लिया गया. बड़ी मुश्किल से संगठित होकर अंग्रेज़ों ने विद्रोह का दमन किया.

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9- भागलपुर

ब्रिटिश शासन के दौरान बंगाल और बिहार में संथाल जाति के लोग रहा करते थे. लेकिन अंग्रेज़ों ने कर प्रणाली लागू कर संथालों की ज़िंदगी को नर्क बना दिया था. अंग्रेज़ों द्वारा कर वसूली के नाम पर न सिर्फ़ पुरुषों का बल्कि महिलाओं का भी बड़े पैमाने पर यौन शोषण किया गया. इसी समय पुलिस प्रशासन ने कुछ संथालों को चोरी के इलज़ाम में पकड़ लिया था. इस घटना ने गुस्से को और भड़का दिया. 30 जून 1855 को भागिनीडीह गांव में 400 गावों के हज़ारों संथाल जमा हुए और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया.

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10- पूना

महाराष्ट्र के पूना में दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर नाम के तीन सगे भाइयों ने सन 1897 के आसपास 'चापेकर संघ' की स्थापना की थी. इसके तहत ये तीनों भाई युवकों को अर्द्ध-सैनिक प्रशिक्षण देकर ब्रिटिश साम्रज्य के विरुद्ध तैयार किया करते थे. इन लोगों को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का संरक्षण प्राप्त था. 22 जून 1897 को उन्होंने पूना के अत्याचारी प्लेग कमिश्नर मि. रैंड और एक पुलिस अधिकारी मि. आयरिस्ट को गोलियों से भून डाला. इस कांड में तीनों चापेकर बंधुओं को फांसी दे दी गई.

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आज स्वतंत्रता दिवस के इस ख़ास मौके पर हम उन शहीद क्रांतिकारियों को नमन करते हैं.