बचपन के दो हिस्से बड़े ख़ास होते हैं पहला जो हम स्कूल में बिताते हैं और दूसरा जो हम स्कूल से आकर ट्यूशन में बिताते हैं.

आज हम यहां ट्यूशन के दिनों की बात करेंगे. स्कूल से निकले और 2 घंटे में उन्हीं दोस्तों से दोबारा मिलना, आधे घंटे पहले पहुंच नुकड़ वाले कैफ़े में समोसा और पैटीज़ खाना, ट्यूशन टीचर से स्कूल की चुगली करना, क्लासेज़ बंक मारना और ग़लती से क्लास में बैठे हैं तो दोस्त के साथ बैक बेंच पकड़ ख़ुराफ़ात करना.

बड़े होते-होते न जाने कितनी ट्यूशन क्लासेज़ बदली होंगी मगर हर जगह ट्यूशन टीचर के कुछ डायलॉग्स एक ही होते थे. मानों सबने कहीं से रट्टा मार कर रखा हुआ है.

आज का हमारा ये आर्टिकल हर ट्यूशन टीचर के नाम. प्रस्तुत है वो बातें जो हर ट्यूशन टीचर के मुंह से आपको सुनने मिल जाएंगी.

तो याद आए ट्यूशन डेज़ !

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