छई छप्पा छई छप्पा के छई... हां तो भइया, ऐसा है बारिश का चौकस मौसम आ चुका है. तड़तड़ा के बूंदें भी पड़ने लगी है. कमरे में अंधेरा कर के चद्दर में घुसड़ू टाइप मूड बन रहा है. अगर ग़रीब लोग की तरह ऑफ़िस का काम कर रहे हैं तो मेरी संवेदनाएं, लेकिन खलिहारे राजा हैं तो भइया मौसम के मिजाज़ को देखते हुए बहुब्बड़े प्लान बना सकते हैं.

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अमा लेकिन अपन क्यों ये कहानी बता रहे? ऊपर वर्णित ग़रीब नौकरी पेशा लोगों की छत्री तले तो हम भी हैं. दरअसल, वर्क फ़्रॉम होम में बैठे-बैठे रंग तो जमा नहीं सकते तो सोचे रंगनाथ ही बन लें. काहे कि आप चाहें हमारी तरह बंधुआ मज़दूर हों या फिर खलिहारे राजा, एक बात दोनों में सेम टू सेम है. वो है बारिश का नाम सुनते ही आने वाले ख़याल. जे गुरू... सट से मुंडी उठा लिए न.

तो चलिए फिर बिना रंगबाज़ी किए हम आपको वो 10 ख़याल बताते हैं, जो बारिश का नाम सुनते ही सबसे पहले दिमाग़ में आते हैं.

1- बाहर कपड़े तो नहीं पड़े सूखने के लिए

जी हां, जब ज़िंदगी की कहानी ‘मुर्दे की चड्ढी ख़तरे में’ और ‘रोती कुतिया के दो आंसू’ टाइटल से पेश की जाए, तो ऐसा ही ख़याल आता है. पूरी गर्मी चमड़ी जलाने के बाद पहली फ़ुवार देखकर बत्तीसी फाड़ ही रहे होते हैं कि सट से दिमाग़ में बाहर सूख रहे कपड़े याद आ जाते हैं. अगर ग़लती से नहीं भी आया तो कौनो चिंता की ज़रूरत न है बाबू. काहे कि अम्मा की गाली और चप्पल आपको भूलने नहीं देगी. ‘मर-मर के इन लोगों के कपड़े धो और उसके बाद छत से उतार कर भी लाओ. ज़रा सी शर्म नहीं है. कपूत पैदा हो गए हैं.'

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2- अगर छत पर टंकी का कवर खुला छोड़ दूं, तो क्या वो बारिश के पानी से भर जाएगी?

कुछ लोगों को ऐसा भी ख़याल आता है. भले वो दिल्ली में बैठे हों लेकिन कलाकारी चेरापूंजी वाली सूझती है. फिर चाहें इस चक्कर में ढेरों कीड़े-मकौड़े टंकी में घुस जाएं, लेकिन ख़याल तो ख़याल होता है गुरू, इत्ता लॉजिक लगाओगे तो फिर हो चुका काम. हम सभी ऐसे ही तो हैं. याद नहीं बेटे, बचपन में कैसे नाली में कपड़ा ठूस के आंगन को स्विमिंग पूल बनाया करते थे. एक कोने से दूसरे कोने में फ़िसलने की मौज ही अलग थी.

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3- बस बारिश तो आ गई अब लाइट न चली जाए

देख भाई, अगर व्यवस्था ख़राब हो ते ख़्यालों पर भी उसका असर पड़ता है. वैसे ये ख़याल कम हक़ीक़त ज़्यादा है. ससुरी दो बूंदे नहीं गिरती हैं कि फ़ट से लाइट ग़ायब. जैसे कोई क़सम खाकर बैठा हो कि मुन्ना बस बूंद की टप से आवाज आवन दो फिर देखी कैसे बत्तिया गुल होत है.

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4- अब फिर सब जगह पानी भर जाएगा

बारिश में आदमी भीगे न भीगे हमारी सड़कें पहले भीग जाती हैं. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि नेता लोगों ने ख़ुद का बचपना याद करने के लिए ही ऐसी सड़कें बनाई हों. मतलब हो सकता है कि कोई नेता नाले में कपड़ा ठूंसकर सड़क पर स्विमिंग करना चाहता हो. अब देखो सबके अपने-अपने शौक होते हैं. प्लीज़ नेताओं को जज मत करिए.

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5- दोस्तों के साथ बाइक से किसी चाय की टापरी पर जाना

आह! ये वो ख़याल है, जो अब हक़ीक़त कम ही बनता है. एक ज़माना था कि बस बादल छाए नहीं कि लौंडों के फ़ोन आने लगते थे. ‘अमा चलो बे, आज झमाझम बारिश होगी, हौक के नहाएंगे.’ अब तो बस बाइक पर भीगना तब ही होता है, जब मजबूरी में कहीं फंस गए हों.

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6- कार में बॉलीवुड म्यूज़िक बजा कर लॉन्ग ड्राइव पर निकलना, फिर बीच में गाड़ी रोक कर फ़ोटोशूट

भइया देखो माहौल बदल चुका है और शौक भी. सिर्फ़ चाय की टपरी पर पहुंच जाना ही अब मौज नहीं है. बाइक की जगह कार ले चुकी है और दोस्तों की चक्कलस को थोड़ा-बहुत बॉलिवुड म्यूज़िक ने रिप्लेस कर दिया है. अब लॉन्ग ड्राइग पर निकलकर चाय के लिए नहीं बल्क़ि फ़ोटोशूट के लिए रूका जाता है. #Baarish #FeelingAwesome.

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7- इस वक़्त भुट्टे कहां मिलेंगे?

आए हाए... सच बता रहे भाई. बारिश में भुट्टा ग़ज़ब ही ढाता है. अंगीठी पर भुनता और फिर नींबू-नमक लगाकर जो चटकारा आता है, श्श्श्श्श्... ज़ुबान लपलपाई जा रही. एकदम जबर स्वाद होता है. बस ससुरे को ढूंढना बहुत पड़ता है.

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8- तेज़ बारिश में किस करने की तमन्ना. हाय!

ये ख़याल भी आता है. ख़ासकर उन लौंडों को तो बहुत आता है, जो पूरी गर्मी अपनी पुच्चू को बाहर धूप का बहाना बनाकर घुमाने नहीं ले गए. अचानक से ही उनका प्यार जाग जाता है. लेकिन क्या करें, ये ज़माना भी तो ऐसा है. उसके घर जा नहीं सकते और बाहर कुटाई का डर है. काहे कि सड़क पर लोग ज़्यादा हो गए हैं प्यार करने की जगह कम. बेचारों की तमन्ना अधूरी ही रह जाती है.

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9- ये तो व्हिस्की वाला मौसम है. साथ में पकोड़े भी हों तो मज़ा आ जाए.

कुछ लोगों को ये भी सूझता है. अब भइया एक तमन्ना अधूरी रहना का मतलब ये तो है नहीं कि आदमी जीना ही छोड़ दे. बढ़िया सा छत पर बरामदा हो और सामने आंगन में झमाझम बारिश चालू. हाथ में व्हिस्की का ग़िलास, साथ में पकोड़े मिल जाएं तो मज़ा एकदम गगनचुंबी हो जाए. हालांकि, मज़ाक से हटकर इसे ख़याल ही रखें. काहे कि सेहत को नुक़सान हो सकता है. अगर मम्मी को पता चल गया तो.

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10- याद आती है मोहब्बत!

‘बारिश की बूंद के पार जब उसकी भीगी ज़ुल्फ़ों का दीदार हुआ

हां वो सावन ही था जब मुझे पहला प्यार हुआ’

जो इश्क़ मुकम्मल हो जाए, वो फिर इश्क़ नहीं रहता. इज़हार से एतबार तक पहुंचने से पहले ही न जाने कितनी मोहब्बतें ख़त्म हो जाती हैं. ज़िंदा रहती हैं, तो बस हमारे ख़यालों में. वो ख़याल जो पहली बारिश के साथ कभी एक पुराने ज़ख़्म सा उभर आता है तो कभी बेधड़क बचपन वाली मुस्कुराहट दे जाता है. याद आ जाती हैं मुहल्ले की वो सुनसान गलियां, जहां सड़कों के शोर से बचकर कभी उन्हें अपना सुकून करार देते थे.

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पहली बारिश के साथ ये सब ख़याल बूंदों की तहर हमारे ज़हन पर बरसते रहते हैं.