'पानी-पानी, हर तरफ़ पानी, एक बूंद पीने को नहीं.'


सैम्युअल टेलर कॉलरिज की कविता, द राइम ऑफ़ द ऐंशियंट मैरिनर की ये पंक्ति आज के संदर्भ में सटीक बैठती है. कविता 1834 में लिखी गई थी.

कहने को तो पृथ्वी का 70% हिस्सा पानी से ढका हुआ है पर दुनिया में हर साल 4,85,000 लोग डायरिया की वजह से मरते हैं. Times of India की 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार, गंदे पानी से हर 4 घंटे में 1 मृत्यु होती है.

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सवाल तो उठना वाजिब है कि इतना पानी होने पर भी पानी की वजह से मौत. जवाब आसान है, 70% में से कुछ प्रतिशत पानी ही पीने और इस्तेमाल के लायक है. उस कुछ प्रतिशत को भी हम बहुत 'अच्छे से' इस्तेमाल करते आए हैं, ये किसी से नहीं छिपा है. ज़रूरत से ज़्यादा पानी फैलाना, ज़रूरत से ज़्यादा पानी बर्बाद करना हमारी आदतों में शुमार है. जहां आधी बाल्टी पानी में काम हो जाए, वहां हम 2 बाल्टी ख़र्च करते हैं. ये कहते हुए कि हमने मोटर लगाई है, हम जितना मन उतना पानी इस्तेमाल कर सकते हैं.

पानी बचाना क्यों ज़रूरी है, ये बताने के लिए ये कारण काफ़ी हैं-

1) 2020 तक देश के कई बड़े शहरों में भूमिगत जल ख़त्म हो जाएगा, कहती है एक रिपोर्ट

2) चुनाव आए और चले गए पर अगर कुछ नहीं गया है तो वो है महाराष्ट्र के कई हिस्सों में पड़ा सूखा.

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3) चेन्नई में पानी की इतनी भारी किल्लत हो गई है कि वहां के कई स्कूल बंद है. IT कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को घर से काम करने को कहा है. एक रिपोर्ट के अनुसार, इज़रायल ने मदद की पेशकश भी कर दी है.

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4) भारत में 100 करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं, जहां हमेशा पानी की कमी रहती है.

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5) पश्चिमी महाराष्ट्र के कई इलाकों में इस साल के सूखे ने 47 सालों का रिकॉर्ड तोड़ा है. यहां के बीड ज़िले के कई लोग अपने घरों को छोड़कर रिलीफ़ कैंप में रह रहे हैं.

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6) महाराष्ट्र के औरंगाबाद में दो डब्बे पानी के लिए एक 10 साल का बच्चा ट्रेन से रोज़ 14 किलोमीटर का सफ़र तय करता है.

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7) महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में 2015 से 2018 के बीच फ़सल बर्बाद होने की वजह से 12,006 किसानों ने आत्महत्या कर ली.

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देशभर में भूमिगत जल की मात्रा बहुत कम हो गई है. नदी-तालाब सूख रहे हैं. ऐसे में जो कुछ भी हमारे पास है, उसे बचाकर चलना समझदारी ही नहीं, समय की मांग है.