आज़ादी के इस दौर में…आज भी बंदिशें कम नहीं.

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इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाई थी भारत की आज़ादी की लड़ाई. 200 सालों की गुलामी के बाद देश को अंग्रेज़ों से आज़ादी मिलेगी. 15 अगस्त भारतीय इतिहास की एक सुनहरी तारीख है. क्योंकि साल 1947 में इसी दिन भारत ने गुलामी से आज़ादी पाई थी और इसी दिन एक बार फिर तिरंगा लाल किले पर लहराया था. कोई खुश था, क्योंकि अब अपने देश की आज़ाद हवा में हर कोई सांस ले रहा था. हर किसी को खुल कर जीने की आज़ादी थी. इस दिन को हम सब स्वतंत्रा दिवस के रूप में मानते हैं. और देश के लिए आज़ादी के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगाने वाले वीर जवानों और और शहीदों को नमन करते हैं. आज हम आज़ादी की 70वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि आज भी हम कहने को तो आज़ाद हैं ,लेकिन असल मायनों में आज़ादी अभी तक नहीं मिल पायी है.

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हर साल हम इस दिन को बड़े गर्व के साथ मनाते हैं. लेकिन क्या सच में हम इस दिन आज़ादी को महसूस करते हैं? क्या सड़कों पर लगे बैरिगेट्स और सुरक्षाकर्मी, हमें आज़ाद होने जैसा महसूस नहीं होने देते.

हम किसी भी शहर में हों, जैसे-जैसे 15 अगस्त नज़दिक आ रहा होता है. अचानक सड़कों पर बस स्टैंड, मेट्रो और रेलवे स्टेशन में पुलिस की चौकसी बढ़ जाती है. लम्बी कतारों में खड़े हो कर जांच में घटों बर्बाद करवाना. धीरे-धीरे इन्ही कतारों को भीड़ की शक़्ल ले लेना और फिर शुरू होती है सफ़र की जंग.

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इतना ही नहीं, कई महत्वपूर्ण सड़कों को बंद कर देना, सुरक्षा कारणों से किसी भी मेट्रो स्टेशन से सवारी की इंट्री बैन हो जाना. 15 अगस्त से पहले ऐसी न जाने कितनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है आप और हम जैसे आम लोगों को और इसके बाद कहा जाता है कि हम आज़ादी का जश्न मना रहे हैं.

बंदूक और बैरिगेट्स के बीच बंधा 15 अगस्त कैसे आज़ाद होने की निशानी है. हम सुरक्षा को गलत नहीं मान रहे, लेकिन हालात जैसे हैं उनमें आज़ादी की हवा कुछ ज़्यादा ही प्रदूषित लगती है.

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आम दिनों में सड़कों पर पुलिस दिखे न दिखे, लेकिन 15 अगस्त और उससे पहले वाले हफ़्ते सड़कों पर लगता है जैसे कर्फ़्यू लग गया है. हर तरफ़ कड़ी चौकसी. हमें समस्या इस बात की है कि अगर हमारे पास इतनी पुलिस फ़ोर्स है, तो रोज़ सुरक्षा की ज़रूरत नहीं क्या हमारे शहर को. अगर कम है, तो इस दौरान जहां से पुलिस हटाई जाती है, वहां किसी अप्रिय घटना का अंदेशा नहीं होता?

क्या सिर्फ़ मंत्री और ऊंचे पद वालों को ही आतंकवाद से ख़तरा है, जबकि इतिहास में हुई किसी भी घटना को देखा जाए, तो समझ आता है कि इन आतंकवादी हमलों में आम लोग ही मारे जाते हैं.

आखिर हम 15 अगस्त को कैसे आज़ादी के दिवस में मना सकते हैं, जब तब आतंकवाद के डर में बंदूकों की निगरानी के दौरान झंड़ा फ़हरता रहेगा. आये दिन पड़ोसी देश की ओर से घुसपैठ, गोला बारी होना कैसे आज़ादी का अहसास कराएगा?

हम अंग्रेज़ों से तो आज़ाद हो चुके हैं, लेकिन अपने ही देश में हमें खुली हवा में कब चैन की सांस लेने को मिलेगी. आज़ादी का जश्न तो मनाएंगे, लेकिन असली आज़ादी हमें कब मिलेगी?