'अगर हम असलियत में शांति प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें अपने बच्चों को शिक्षित करना शुरू करना होगा.'


महात्मा गांधी जी का है ये कथन. निःसंदेह किसी भी देश के भविष्य के लिए शिक्षा बेहद ज़रूरी है. शायद इसलिये ही हमारे देश में इतने बड़े-बड़े स्कूल और विश्वविद्यालय खोले गये, अगल-अलग विषयों में इतनी कठिन परीक्षाएं ली जाती हैं. देश के भविष्य का सवाल जो है.

छात्र कॉलेज और स्कूलों में पढ़ाई करते ही अच्छे लगते हैं, अन्य बातों पर ध्यान देते अच्छे नहीं लगते. बीते कुछ वर्षों में नेता से लेकर आम जनता इस स्वर का ख़ासा समर्थन करती दिखी है.

जिन लोगों को लगता है कि छात्र पढ़ाई करते ही अच्छे लगते हैं, उनको ख़ास तौर पर पता होना चाहिए छात्रों की इन क्रान्तियों के बारे में जिनसे सरकारें या तो झुकीं या फिर छात्रों को दबाने के लिए हर हद पार कर गईं-

1. 1960, Greensboro Sit-ins

Source: Huffington Post

शायद ही किसी ने सोचा हो कि 4 छात्रों द्वारा शुरू किया गया ये आंदोलन अमेरिकी इतिहास को बदल देगा. 1 फरवरी, 1960 को North Carolina Agricultural and Technical State University के 4 छात्र Ezell Blair, Franklin McCain, Joseph McNeil और David Richmond उठे और Woolworth के जनरल स्टोर में घुसे और डाइनिंग एरिया में बैठ गये.


ये उस दौर की बात है जब अश्वेत लोगों को स्नैक बार में खड़े होकर खाना पड़ता था और लंच काउंटर सिर्फ़ श्वेत लोगों के लिए हुआ करता था. ये चारों काउंटर पर बैठ गये और खाने की चीज़ें ऑर्डर कीं, पर स्टाफ़ ने उन्हें खाने की चीज़ें देने से मना कर दिया. लंच काउंटर के मैनेजर ने पुलिस को बुलाया पर इन चारों के एक श्वेत दोस्त और बिज़नेसमैन जॉन ने पहले ही मीडिया को इत्तिला कर दिया था. पुलिस आई और उन्होंने बस ये कहा कि वो कुछ नहीं करेंगे क्योंकि वो चारों पैसे देने वाले कस्टमर हैं और उन्होंने कोई ग़ैरक़ानूनी काम नहीं किया है.

अगले दिन ये चारों 20 अन्य अश्वेत विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ पहुंचे और लंच काउंटर पर बैठ गए. यही चीज़ 3-4 फरवरी को हुई और विरोध प्रदर्शक सारी सीट्स पर बैठ गए और जगह न बचने पर स्टोर के बाहर बैठने लगे.

कुछ हफ़्तों के बाद और नेशनल मीडिया कवरेज की वजह से ये विरोध कई शहरों में फैल गया. जुलाई 1960 आते-आते Woolworth और कई और खाने-पीने की जगहों ने श्वेत और अश्वेत में अंतर करना छोड़ दिया.

2. 1968, कोलंबिया विश्वविद्यालय विरोध

Source: History

वियतनाम युद्ध चल रहा था. दुनियाभर के लोग बदलाव की मांग कर रहे थे. मार्च 1968 में 1000 छात्रों ने Howard University के छात्रों ने एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग पर कब्ज़ा कर लिया और कई छात्रों ने ख़ुद को डॉरमैट्री में बंद कर लिया. ये लोग सिलेबस में बदलाव की मांग कर रहे थे.


कुछ ऐसा ही किया अप्रैल, 1968 में कोलंबिया यूंविर्सिटी के छात्रों ने. छात्र हफ़्तेभर से ज़्यादा समय तक विश्वविद्यालय की कई बिल्डिंग्स पर कब्ज़ा किए रहे. 1000 पुलिस वाले घुसे और उन्हें निकाल बाहर किया.

छात्रों की 2 मांगें थीं-
1. Harlem में Morningside Park में यूनिवर्सिटी जिम बनवाना
2. वियतनाम युद्ध में इस्तेमाल किये जाने वाले हथियारों के Think Tank (IDA) और कोलंबिया विश्वविद्यालय के बीच कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म हो.

छात्रों का कहना था कि वो ऐसे विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ेंगे जो अश्वेतों के साथ भेद-भाव करे और वियतनाम के लोगों को मारने के लिए हथियार बनाए.

अप्रैल 23, 1968 कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सैंकड़ों छात्र विश्वविद्यालय के मैन एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग के सामने इकट्ठा हुए और अपनी बात यूनिवर्सिटी प्रेसिडेंट, ग्रैसन एल. किर्क के सामने रखने की कोशिश की. एडमिनिस्ट्रेशन ने बिल्डिंग को लॉक कर दिया. छात्र जिमेज़ियम बिल्डिंग की तरफ़ बढ़ने लगे और एक छात्र को गिरफ़्तार कर लिया. इसके बाद प्रदशर्कों ने डीन के दफ़्तर के सामने धरना प्रदर्शन किया, उन्हें बाहर नहीं जाने दिया और अपनी मांगें रखीं. अगले दिन डीन को छोड़ दिया गया पर प्रदर्शकों की संख्या और बढ़ी.

अप्रैल 30 को पुलिस ने ज़बरदस्ती प्रदर्शकारियों को सभी बिल्डिंग्स से हटाया जिसमें 700 से ज़्यादा छात्रों की गिरफ़्तारी हुई, 100 से ज़्यादा लोग घायल हुए. पूरे सेमेस्टर स्ट्राइक्स चलती रहीं, प्रदर्शनकारियों को बाहर करने के बावजूद विश्वविद्यालय ठप्प हो गया. आख़िरकार छात्रों के आगे विश्वविद्यालय को झुकना पड़ा और उपर्युक्त लिखीं उनकी 2 मांगें पूरी की गईं.

3. 1974, जेपी आंदोलन

Source: Statesman

गुजरात में नव निर्माण क्रांति चल रही थी और फरवरी 1974 में जेपी गुजरात गये और गुजराती छात्रों के उत्साह से बेहद प्रभावित हुए. उन्होंने बिहार में भी ऐसी ही क्रांति करने की कसम खाई. जेपी की आवाज़ पर अप्रैल 1974 में 10000 छात्रों ने भ्रष्ट बिहार राज्य सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हुए सरकार बदलने की मांग की. इंदिरा गांधी ने इस आंदोलन पर ये कहा कि जेपी जैसे लोग पैसेवालों के कृपापात्र हैं और दूसरों को दिशा दिखाने का हक़ नहीं है. इस बात ने आंदोलन को और हवा दी. जून 1974 में जेपी ने छात्रों से पढ़ाई का 1 साल छोड़ आंदोलन में शिरकत करने की पेशकश की. जेपी से प्रभावित होकर सैंकड़ों छात्रों ने पढ़ाई और आम जनों ने नौकरी छोड़ दी. दिसंबर आते-आते ये एक राज्य स्तरीय आंदोलन बन गया पर सरकार नहीं झुकी. जेपी देशभर में घूमे और कई पार्टियों को एकसाथ जोड़ा. इस आंदोलन ने देश की सत्ता पलट दी थी और इस आंदोलन के फलस्वरूप ही देश में पहली गठबंधन की सरकार बनी थी.

4. 1976, Soweto विद्रोह

Source: South African History

जून 16, 1976 को दक्षिण अफ़्रीका के Soweto में हज़ारों हाई स्कूल के छात्रों ने रंगभेद और Bantu Education Act के खिलाफ़ शांति से प्रदर्शन शुरू किया. ये एक्ट अश्वेत छात्रों के लिए शिक्षा के अवसरों को और शिक्षा की क्वालिटी को भी कम करता था.


छात्र, सॉकर स्टेडियम की तरफ़ बढ़ रहे थे, शांति से. पुलिस ने उन्हें आंसू गैस के गोलों को वॉर्निंग गनशॉट्स से रोकने की कोशिश की पर छात्र रुके नहीं. इसके बाद पुलिस ने ओपन फ़ायरिंग कर दी जिसमें 2 छात्र मारे गये और सैंकड़ों घायल हुए.

पुलिस की इस बेदर्दी ने Soweto के लोगों को एकजुट कर दिया. हालत इतनी ख़राब हो गई कि क़ानून व्यवस्था लाने के लिए पुलिस टैंक लेकर आई. ये विद्रोह पूरे दक्षिण अफ़्रीका में फैला और इससे रंगभेद के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन को हवा मिली.

5. 1989, वेल्वेट क्रांति

Source: Radio Liberty

17 नवंबर, 1989 में छात्रों से प्राग की सड़कें भर गईं. बर्लिन की दीवार को गिरे 8 दिन हो चुके थे और आज़ादी की वही लहर चेकोस्लोवाकिया की सड़कों पर पहुंच गई थी. पुलिस ने प्रदर्शकों को मारकर आज़ादी की चित्कार को दबाने की भरपूर चेष्टा की पर लोग ज़्यादती के आदी हो चुके थे.


20 नवंबर तक चेक्स, स्लोवाक्स को मिलाकर 5 लाख से ज़्यादा लोग प्राग की सड़कों पर जुटे और Wenceslas Square पर कब्ज़ा कर लिया. कम्युनिस्ट्स को झुकने पर मजबूर होना पड़ा. 1989 के अंत तक चेकोस्लोवाकिया ने अपना पहला राष्ट्रपति चुन लिया वो भी छात्रों के दम पर. उन दिनों की घटनाएं इतिहास में 'वेल्वेट क्रांति' के रूप में दर्ज हुईं.

6. 1989, Tiananmen Square विरोध

Source: BBC

1989 में The Tiananmen Square का विरोध चीन के छात्रों ने किया था. उनकी मांगें थीं, लोकतंत्र, बोलने की आज़ादी और आज़ाद प्रेस. Hu Yaobang के निधन के बाद लोकतंत्र का ध्वज लिये छात्रों ने बीजिंग के Tiananmen Square तक मार्च किया. Hu, कम्युनिस्ट नेता थे पर वो लोकतांत्रिक सरकार की मांग कर रहे थे. Hu की मृत्यु का शोक मनाते हुए छात्र आगे बढ़े. धीरे-धीरे छात्रों की संख्या बढ़ने लगी. 1989 के मई के बीचों-बीच आते-आते विरोध करने वाले छात्रों की संख्या कई हज़ार हो गई. छात्रों का ये भी आरोप था कि मौजूदा सरकार की शिक्षा व्यवस्था उनके सुदृढ़ भविष्य के लिए ठीक नहीं है.


चीन के कुछ नेताओं को छात्रों से सहानुभूति थी, वहीं कुछ नेता उन्हें ख़तरे के रूप में देख रहे थे. 13 मई को छात्र अनशन पर बैठ गए. ये क्रांति इतनी बढ़ गई कि सोवियत संघ के प्रधानमंत्री Mikhail Gorbachev के चीन दौरे पर भी इसका असर पड़ा. Tianmen Sqaure में होने वाले प्रधानमंत्री का स्वागत, एयरपोर्ट पर ही हुआ.

20 मई को मार्शल लॉ लगा दिया गया और 250,000 चीनी सिपाहियों की फ़ौज बीजिंग में घुसी. मई के अंत तक 10 लाख छात्र और आम लोग जमा हो गये थे. 4 जून को रात के 1 बजे, चीनी पुलिस और फ़ौजियों ने प्रदर्शकों पर लाइव राउंड फ़ायर कर दिया. रिपोर्ट्स की मानें तो इस नरसंहार में सैंकड़ों से हज़ारों प्रदर्शकों की मौत हुई थी और 10 हज़ार से ज़्यादा को हिरासत में लिया गया था.

7. 1990, ईरान

कुछ लोग इसे 'ईरान का Tiananmen Square' भी कहते हैं. हालांकि, ये चीन में हुए नरसंहार जैसा नहीं था. ईरान के तहरान में छात्रों का एक प्रदर्शन शुरू हुआ. छात्रों ने सरकार की रूढ़िवादी सोच और स्वतंत्र आवाज़ों को दबाने की कोशिशों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. छात्रों और पुलिस के बीच हुई कई भिड़ंत के बाद 8 जुलाई, 1999 को सादे कपड़ों में पुुलिस और पैरामिलिट्री फ़ोर्सेज़ छात्रों के डॉरमिट्री में घुसी और धावा बोल दिया. इन लोगों ने दरवाज़े-खिड़कियां तोड़ दीं, छात्रों के बिस्तरों में आग लगा दी. इस आधी रात के हमले में एक शख़्स की मृत्यु हुई और सैंकड़ों घायल हुए.


इस कायरतापूर्ण व्यवहार के बाद छात्रों का विद्रोह कैंपस की चारदिवारी से निकलकर सड़कों तक पहुंच गया. तहरान की आम जनता ने भी उनके कंधों से कंधा मिलाया. पुलिस ने प्रदर्शकों पर कोई दया नहीं दिखाई. तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद ख़तामी के कई समर्थक छात्रों की ओर हो गये. आख़िरकार राष्ट्रपति को छात्रों पर हुए हमले की निंदा करनी पड़ी.

बहुत से लोगों का मानना है कि इस घटना ने ईरान में छात्र क्रांति की लौ का काम किया.

8. 2013 से अब तक, ब्लैक लाइव्स मैटर

Source: Black Lives Matter

3 महिलाओं, Patrisse Cullors, Alicia Garza and Opal Tometi ने ये क्रांति शुरू की थी. ये क्रांति देशभर में तब फैली जब लोगों को ये पता चला कि पुलिस ने 18 साल के प्रदर्शक, Michael Brown की जान ले ली. इसके बाद सड़कों पर प्रदर्शन करने वाले ज़्यादातर लोग छात्र ही थे.


ये लोग पुलिस द्वारा निहत्थे अश्वेत लोगों के साथ किये जाने वाले Gun Violence का विरोध कर रहे थे. दुख की बात ये है कि इन लोगों को प्रदर्शक नहीं, बल्कि परेशान करने वाले और फ़ालतू लोगों की तरह देखा गया.

पुलिस की गोलियों से दुनियाभर में मासूमों की जान जाती है, कई घायल होते हैं पर पुलिस पर सवाल कम ही उठाये जाते हैं.

9. 2014, हॉन्ग कॉन्ग

Source: Sup China

हॉन्ग कॉन्ग की अम्ब्रैला क्रांति 22 सितंबर, 2014 को शुरू हुई. हज़ारों छात्रों ने पीले रिबन पहनकर कक्षाओं का बॉयकॉट कर हॉन्ग कॉन्ग की चाइनीज़ यूनिवर्सिटी के कैंपस में उतर आये और लोकतांत्रिक चुनाव की मांग करने लगे.


जैसे-जैसे क्रांति की आग फैलने लगी हज़ारों हॉन्ग कॉन्ग निवासियों ने छात्रों का समर्थन किया. अगले कई हफ़्तों तक, सड़कों पर मार्च निकाले गए, बैंक, बिज़नेस सब बंद रहे. प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने मिर्ची स्प्रे और आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया. प्रदर्शक डटे रहे और आत्मरक्षा में अपने छाते खोल लिये. और इस तरह अम्ब्रेला संघर्ष का एक शक्तिशाली चिन्ह बन गया.

हॉन्ग कॉन्ग में साल 2019 में भी फिर से ऐसा नज़ारा देखने को मिला. विश्वविद्यालय के छात्रों समेत स्कूल के भी कई छात्र, सड़कों पर उतर आये. ये आंदोलन था लोकतंत्र के लिए.