हम सबकी ज़िंदगी में ऐसे कई लम्हें आते हैं जब हमको लगता है कि अब सब कुछ बिखर गया, अब इससे ज़्यादा और कुछ भी बुरा नहीं हो सकता है. उस पल में हम जीने की सारी उम्मीद खो देते हैं. यही वो पल होते हैं जब हमें ख़ुद को ये याद दिलाने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है कि हम कितने ताक़तवर हैं.

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Source: crosswalk

दन्यानेश्वरी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. उसने बचपन से ही अपने परिवार में झगड़े देखे और अपने आस-पास के रिश्तों को बिगड़ते देखा.

मैं एक चॉल में पली-बड़ी हूं. बड़ी होने पर मैंने हमेशा अपने माता-पिता को झगड़ा करते ही देखा है. मेरे पिता के किसी दूसरी महिला के साथ संबंध थे जिसकी वज़ह से मेरी मां काफ़ी परेशान रहती थीं. दोनों के बीच लगातार होते झगड़ों ने इतना बुरा रूप ले लिया कि मेरे पिता ने घर में किसी भी तरह का सहयोग करने के लिए मना कर दिया. एक बार उन्होंने मेरी मां को बेल्ट से बहुत बुरी तरह से मारा भी था.

जब इंसान को चारों ओर से निराशा घेर लेती है तो उसे अपना जीवन ख़त्म करने के अलावा कुछ और नहीं दिखता. उसे अपना अस्तित्व इतना भारी लगने लगता है कि उसे मरना ज़्यादा आसान प्रतीत होता है.

हर दिन की लड़ाई से तंग आकर एक दिन मेरी मां मुझे लेकर डूबकर मरने के लिए समंदर पर ले गईं. उस पल में उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि मरना कोई हल नहीं है, उन्हें ख़ुद के लिए खड़ा होना होगा. कुछ दिनों बाद मेरे माता-पिता के बीच फिर से लड़ाई हुई. इस बार मां ने पिता के खिलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी. पुलिस ने थोड़ी बहुत पूछताछ के बाद उन्हें छोड़ दिया.

तमाम मुश्किलों के बाद दन्यानेश्वरी कॉलेज जाती है और उसे वहां अपने से 5 साल बड़े लड़के से प्यार हो जाता है लेकिन चीज़ें वैसी नहीं होती जैसी उसने सोची थी.

अचानक, एक दिन उसने मुझसे कहा कि अब वो मेरे साथ नहीं रहना चाहता है. मेरा दिल टूट गया था. उसी दिन, मेरे और मेरे पिता के बीच एक बहुत बड़ा झगड़ा भी हुआ था. मैं हर रोज़ की इन बातों से इतना तंग हो चुकी थी कि मैंने अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने का फ़ैसला कर लिया था. मैं पास की एक गली में गई और वहां खड़ी होकर पूरी एक बोतल फ़िनाइल की पी गई. अगली बात जो मुझे याद है वो ये कि मैं एक अस्पताल के बिस्तर से उठती हूं. मैं 4 दिन से ICU में थी. मेरे पिता मुझसे मिलने आए और उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मैं वास्तव में आत्महत्या करना चाहती तो 'मुझे अच्छे से रिसर्च करना चाहिए था'.

जल्द ही दन्यानेश्वरी अपने जीवन के इस भयानक सदमे से उभरती है पर उसे इस बात का एहसास होता है कि उसके दोस्त 'उसकी जैसी लड़की' के साथ नहीं रहना चाहते. आत्महत्या की ये घटना उसका जीवन के प्रति नज़रिया बदल देती है. दन्यानेश्वरी अब बदलना चाहती थी और उसने अपने आने वाले जीवन का बाहें खोल कर स्वागत किया.

मैंने पत्रकारिता में मास्टर किया और मुझे All India Radio में नौकरी मिल गई. अब कुछ साल हो गए हैं और मैं आज जीवन में एक बेहतर जगह पर हूं. मैंने अपना एक संगठन भी खोला है जहां कई अवसरों पर, मैं और कुछ अन्य लोग ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों को चाय बांटते हैं. बेशक़, अतीत के घाव आज भी ताज़ा हैं और मैं आज भी कभी-कभी उनके बारे में सोच कर परेशान हो जाती हूं.

अपने जीवन में इतना कुछ देख चुकी दन्यानेश्वरी को आख़िरकार जीवन का असली मूल्य पता चलता है.

तो जो बात मैं वास्तव में कहने की कोशिश कर रही हूं वो ये है कि, अगली बार आप किसी को जज करें या स्टीरियोटाइप करें उससे पहले इस बात का ध्यान ज़रूर रखें कि हर कोई, हर कहीं किसी न किसी चीज़ से गुज़र रहा होता है और आपकी तरफ़ से थोड़ी नरम दिली, थोड़ा अपनापन भी किसी को जीने की नई उम्मीद दे सकता है.

अगली बार किसी को जज करने से पहले एक बार ज़रूर सोचिएगा.