बात तब की है जब मैं कक्षा छः या सात में पढ़ती थी. छुट्टी का दिन था.

मैं बहुत समय से मम्मी को मॉल जाने के लिए कह रही थी. उस दिन मम्मी मान गई और हम लोग हमेशा की तरह घर के पास वाले एक मॉल में गए थे.

मम्मी को बिग बाज़ार से घर का राशन भी लेना था. हमने आराम से अपने लिए शॉपिंग की और घर का राशन ख़रीदा.

बिग बाज़ार में एक पेस्ट्री और खाने का काउंटर होता है जहां हम खा-पी सकते हैं.

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क्योंकि संडे का दिन था और बिलिंग वाली लाइन में बहुत भीड़ लगी हुई थी. तो मैं मम्मी से 50 रुपये का नोट लेकर उस काउंटर पर एक पेस्ट्री लेने चली गई.

मैंने एक चॉकलेट पेस्ट्री ली और ग़लती से बिना रुपये दिए पेस्ट्री खाते-खाते मम्मी के पास आ गई. जैसे ही मैं मम्मी के पास आई मुझे याद आया कि मैं उनको रुपये देना भूल गई हूं.

मैं मम्मी के पास गई और अपनी सूझ-बूझ के हिसाब से बोली, 'मम्मी पता है हमारे 50 रुपये बच गए अब मैं इससे कुछ और भी ख़रीद सकती हूं'.

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इस पर मम्मी ने मुझे समझाया कि ये ग़लत है. वो रुपये उनको अपनी कमाई से देने पड़ेंगे. उन्होंने मुझे समझाया कि भूल गई देना तो क्या हुआ अब जाकर दे दो. ऐसा नहीं करना चाहिए.

मम्मी की ये बात सुनकर मैं भी तुरंत वापस उस काउंटर पर रुपये देने गई.

जब मैं वापस गई तो शायद वो भी उस एक पेस्ट्री का ही हिसाब देख रहे थे. मुझे वहां देख कर उन्होंने भी तुरंत राहत की सांस ली. उन्होंने कहा, 'मैं अभी यही देख रहा था कि इस पेस्ट्री के रुपये तो मैंने लिए नहीं और आप भी चली गईं. शुक्र है आप वापस आ गईं.'

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उन्होंने ख़ुश होकर आगे बोला, 'आपके जैसे कस्टमर बहुत कम होते हैं मैम.'

ये सुनकर मुझे बहुत बुरा लग रहा था और अपने ऊपर शर्म भी आ रही थी. मैंने भी उनसे कह दिया, 'मैं वापस नहीं आ रही थी रुपये देने. मेरी मम्मी ने मुझे समझाया तो मैं आ गई.'

इस पर वो हंस पड़े और मुझे समझाया कि आपने सही करा मैम वरना ये रुपये मेरी जेब से जाते. उन्होंने मुझे फिर से थैंक यू बोला और मैं वहां से अपने साथ जीवन भर की एक सीख लेकर वापस लौट रही थी. ईमानदार होने की.