साल 2018 की बात है. यूरोपीय देश एस्टोनिया की मशहूर सिंगर Jana Kask भारत आई थीं. इस दौरान वो भारत में अपना एक म्यूज़िक वीडियो शूट करना चाहती थीं. कई जगहों को देखने के बाद Jana ने उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से क़रीब 100 किलोमीटर दूर बसे एक बेहद ख़ूबसूरत हिल स्टेशन 'चकराता' को चुना.

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इस दौरान Jana अपनी टीम के साथ 'चकराता' के कैंट इलाक़े में शूटिंग करने लगीं. जब 'लोकल इंटेलिजेंस यूनिट' को इसकी भनक लगी तो उन्होंने Jana व उनके साथियों को तुरंत हिरासत में ले लिया और उन्हें देश छोड़कर जाने का नोटिस थमा दिया.

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दरअसल, 'चकराता' एक प्रतिबंधित छावनी क्षेत्र है. केंद्रीय गृह मंत्रालय की अनुमति के बिना किसी भी विदेशी नागरिकों को यहां जाने की इजाज़त नहीं है. सिंगर Jana इस बात से अनजान थीं, इसलिए वो बिना किसी परमिशन के यहां दाखिल हो गई थीं और उन्हें इस तरह की कार्रवाई का सामना करना पड़ा.

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दरअसल, इसके पीछे की असल वजह भारतीय सेना की बेहद ख़ूफ़िया 'टूटू रेजिमेंट' थी. चकराता में ही इस रेजिमेंट का सेंटर है. शायद आप में से अधिकतर लोग ये नाम पहली बार सुन रहे होंगे. बता दें कि 'टूटू रेजिमेंट' भारतीय सैन्य ताक़त का वो हिस्सा है जिसके बारे में बहुत कम जानकारियां ही सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हैं. ये रेजीमेंट आज भी बेहद गोपनीय तरीक़े से काम करती है और इसके होने का कोई प्रूफ़ भी पब्लिक नहीं किया गया है.

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आख़िर क्या है 'टूटू रेजिमेंट' का इतिहास?

भारतीय सेना की 'टूटू रेजिमेंट' की स्थापना साल 1962 में हुई थी. ये वही समय था जब भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था. इस दौरान तत्कालीन आईबी चीफ़ भोला नाथ मलिक के सुझाव पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 'टूटू रेजिमेंट' बनाने का फ़ैसला किया था. ये रेजीमेंट सेना के बजाए भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी 'RAW' के ज़रिए सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करती है.

इस रेजिमेंट को बनाने का मक़सद ऐसे लड़ाकों को तैयार करना था, जो चीन की सीमा में घुसकर, लद्दाख की कठिन भौगोलिक स्थितियों में भी लड़ सके. इस काम के लिए तिब्बत से शरणार्थी बनकर आए युवाओं से बेहतर कौन हो सकता था. ये तिब्बती नौजवान उस क्षेत्र से परिचित थे, वहां के इलाकों से वाकिफ़ थे. इसलिए तिब्बती नौजवानों को भर्ती कर एक फौज तैयार की गई.

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भारतीय सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल सुजान सिंह को इस रेजीमेंट का पहला आईजी नियुक्त किया गया था. सुजान सिंह दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 22वीं 'माउंटेन रेजिमेंट' की कमान संभाल चुके थे. इसलिए इस नई रेजीमेंट को 'इस्टैब्लिशमेंट 22' या 'टूटू रेजिमेंट' भी कहा जाने लगा. पूर्व सेना प्रमुख रहे दलबीर सिंह सुहाग 'टूटू रेजिमेंट' की कमान संभाल चुके हैं.

साल 1962 भारत-चीन युद्ध के बाद भी 'टूटू रेजिमेंट' को भंग नहीं किया गया, बल्कि इसकी ट्रेनिंग इस सोच के साथ बरक़रार रखी गई कि भविष्य में अगर कभी चीन से युद्ध होता है तो ये रेजिमेंट हमारा सबसे कारगर हथियार साबित होगी.

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कैसे काम करती है ये रेजिमेंट?

'टूटू रेजिमेंट' आधिकारिक तौर पर भारतीय सेना का हिस्सा नहीं है. इसकी कमान डेप्युटेशन पर आए किसी सैन्य अधिकारी के हाथों में होती है. पूर्व सेना प्रमुख दलबीर सिंह सुहाग भी 'टूटू रेजीमेंट' की कमान सम्भाल चुके हैं. ये रेजिमेंट सेना के बजाय 'RAW' और 'कैबिनेट सचिव' के ज़रिए सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करती है.

'टूटू रेजिमेंट' में आज कितने जवान हैं, कितने अफ़सर हैं, इनकी बेसिक और एडवांस ट्रेनिंग कैसे होती है और ये कैसे काम करते हैं, ये आज भी एक रहस्य है. शुरुआती दौर में जहां 'टूटू रेजिमेंट' में केवल तिब्बती मूल के जवानों को भर्ती किया जाता था, वहीं अब इसमें गोरखा नौजवानों को भी शामिल किया जाता है. इस रेजीमेंट की रिक्रूटमेंट भी पब्लिक नहीं की जाती है.

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'टूटू रेजिमेंट' के जवानों की क्या ख़ास बात है?

'टूटू रेजिमेंट' के जवान विशेष तौर पर 'गुरिल्ला युद्ध' में ट्रेंड माने जाते हैं. इन्हें रॉक क्लाइंबिंग और पैरा जंपिंग की स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है और बेहद कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने के गुण सिखाए जाते हैं. ये मानसिक और शारीरिक रूप से 'पैरा कमांडोज़' से भी मजबूत होते हैं.

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इन महत्वपूर्ण युद्धों में दिखाया अदम्य साहस

'टूटू रेजिमेंट' के जवानों ने अपने अदम्य साहस का प्रमाण ने '1971 के युद्ध' में भी दिया था. इस दौरान इसके जवानों को स्पेशल ऑपरेशन 'ईगल' में शामिल किया गया था. इसके अलावा 1984 में 'ऑपरेशन ब्लूस्टार', 'ऑपरेशन मेघदूत' और साल 1999 में हुए 'करगिल युद्ध' के दौरान 'ऑपरेशन विजय' में भी 'टूटू रेजिमेंट' ने अहम भूमिका निभाई थी.

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शहादत के बदले नहीं मिलता सार्वजनिक सम्मान

इस रेजिमेंट के जवानों का सबसे बड़ा दर्द ये है कि, इन्हें क़ुर्बानियों के बदले कभी वो सार्वजनिक सम्मान नहीं मिल पाया जो देश के लिए शहीद होने वाले दूसरे जवानों को मिलता है. इसके पीछे वजह है कि 'टूटू रेजिमेंट' का बेहद गोपनीय तरीके से काम करना. इसकी गतिविधियों को कभी पब्लिक नहीं किया जाता. 1971 के युद्ध में शहीद हुए 'टूटू रजिमेंट' के जवानों को न तो कोई मेडल मिला, न ही कोई पहचान.

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बीते कुछ सालों में बस इतना सा फ़र्क़ ज़रूर आया है कि अब 'टूटू रेजिमेंट' के जवानों को भी भारतीय सेना के जवानों जितना ही वेतन मिलने लगा है. कुछ साल पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि, 'ये जवान न तो भारतीय सेना का हिस्सा हैं और न ही भारतीय नागरिक!' बावजूद इसके ये भारत की सीमाओं की रक्षा के लिए हमारे जवानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे हैं.