कहते हैं बचपन लौट कर नहीं आता… और ये बात सच भी है. जब हम बच्चे थे, तो बड़े होने की ज़िद थी और जब बड़े हो गए, तो बचपन में लौट जाने को जी करता है. क्यों है ना ये सच. बचपन मुट्ठी में बंद वो रेत है, जो कोशिश करने के बावजूद फिसल जाती है. वो मुठ्ठी से फिसलती हुई रेत है, चाहे मुठ्ठी कितनी ही न कस लो, रेत फिसलकर निकल ही जाती है. मैं तो अपने बचपन को बहुत ही मिस करती हूं, और शायद हर इंसान अपने बचपन को मिस करता ही है… क्योंकि बचपन होता ही इतना प्यारा और मासूम, ना पैसों की चिंता, ना खाने की… खेलना-कूदना, मां के आंचल में सोना. गर दिखाई किसी ने आंखें तो दुबक के मां के पल्लू में छिप जाना यही होता है बचपन. अगर मेरा बस चलता तो मैं तो सच्ची अपने बचपन में लौट जाती… इस बात पर जगजीत सिंह की एक ग़ज़ल याद आ गई:

“ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो

भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,

मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन

वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी”

ये लाइन्स हर किसी ने सुनी होंगी और सुनने के बाद दिल में केवल यही ख़्याल आया होगा कि काश एक बार वो बचपन फिर से जीने को मिल जाए. लेकिन प्रकृति का नियम है कि हम दोबारा अपने बचपन में नहीं जा सकते.

अगर बात करें 80 और 90 के दशक में पैदा हुए बच्चों की, तो शायद यही ऐसी जैनरेशन है, जिसमें वो दौर भी देखा जब टेक्नोलॉजी का इतना हो-हल्ला नहीं था यानि की टेक्नोलॉजी फ़्री बचपन, और वो दौर जब बचपन मानों टेक्नोलॉजी का मोहताज लगता है. ख़ैर हम गंभीर बातों को न करते हुए 80 और 90 के दशक के उस दौर की बात करते हैं, जब हम ऑडियो कैसेट्स देखे, तो ब्लैक एंड व्हाइट टीवी, या लकड़ी के बॉक्स वाला बड़ा सा रेडियो. ऐसी कई चीज़ें आज के दौर में कहीं ग़ुम हो चुकी हैं.

अगर आपका बचपन भी इस दौर में गुज़रा है, तो आप इन चीज़ों से रिलेट ज़रूर करेंगे.

1. ब्लैक एंड व्हाइट टीवी

शटर वाला ब्लैक एंड व्हाइट टीवी और उस टाइम के दूरदर्शन के सीरियल क्यों याद आ गई न उस दौर की…

2. बड़ा वाला रेडियो

लकड़ी के बॉक्स वाले बड़े से रेडियो में बिनाका गीत माला और समाचार सुनते हुए दादा-दादी को कई बार देखा. अब तो वो एक एंटीक की तरह घर में रखा है.

3. अलार्म घड़ी

सुबह-सुबह वो अलार्म घड़ी का बजना और आंखें बंद किये-किये हाथ मारकर उसको बंद करना, आज के मोबाइल वाले अलार्म में वो बात कहां है. 

4. लम्ब्रेटा स्कूटर

लम्ब्रेटा स्कूटर हो या एलएमएल वेस्पा, पापा के साथ उसमें आगे खड़े होकर घूमने जाना या स्कूल जाना एक अलग ही टशन था भाई!

5. लाइट जाने परकैरोसीन लैंप में पढ़ाई करना

मुझे अच्छे से याद है कि उस वक़्त आये दिन लाइट जाने की समस्या होती थी और इक्का-दुक्का लोगों के यहां जैनरेटर होता था, लेकिन अब लाइट जाने से पढ़ाई तो रुकती नहीं थी. तब लालटेन या कैरोसीन लैंप की रौशनी में ही होमवर्क करना पड़ता था.

6. वायर वाला टेलीफोन

वायर वाले फ़ोन की घंटी की वो आवाज़ आज भी कानों में गूंजती है.

7. ऑडियो कैसेट्स

लेटेस्ट फ़िल्मों के कैसेट्स खरीदना और फिर फ़ुल वॉल्यूम में उसपर गाना बजाना बड़ा ही मज़ेदार होता था. आज भी वो कैसट्स घर में रखे हैं.

8. कागज़ की नाव

बारिश होने के बाद छत पर भरे पानी या पार्क में इकट्ठे हुए पानी में अगर आपने कभी कागज़ की नाव बनाकर चलाई है, तो आप उस फ़ीलिंग को बख़ूबी जान पाएंगे.

9. वॉकमैन

अपने पसंदीदा गाने की कैसेट को वॉकमैन में लगाकर आराम से सुनना कौन भूल सकता है भला!

10. ज्‍योमेट्री बॉक्‍स

हर एग्ज़ाम से पहले नया ज्‍योमेट्री बॉक्स खरीदना तो जैसे ज़रूरी था.

11. रबर लगी पेन्सिल

पेन्सिल में लगी रबर भले ही यूज़ हो ना हो, लेकिन पेन्सिल हमेशा रबर लगी हुई ही खरीदी जाती थी.

12. इंकपॉट और इंकपेन

इंकपॉट और इंक का वो दौर सबसे अच्छा था. हालांकि, उस टाइम तक बॉलपेन की भी शुरुआत हो चुकी थी.

13. कॉमिक्स

गर्मियों की छुट्टियां आते ही किराए पर कॉमिक्स लाकर पढ़ने का अपना ही मज़ा होता था, और जल्दी से उसको ख़त्म करने की रेस का तो पूछो ही मत.

14. लूडो और सांप सीढ़ी जैसे कई गेम

जब कभी भी लोगों को मेट्रो में या ट्रेन में मोबाइल पर लूडो या सांप-सीढ़ी खेलते हुए देखती हूं, बचपन के दिन याद आ जाते हैं, जब पासे और गोटियों के साथ बोर्ड पर लूडो खेला करते थे.

15. ब्लैक एंड व्हाइट मोबाइल्स

तब मोबाइल का नया-नया ट्रेंड चला था और ब्लैक एंड व्हाइट स्क्रीन वाले मोबाइल होते थे. अगर आपने अपने बचपन में फ़ोन में मारियो और सांप वाला गेम खेला है, तो ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोन को कभी भूल नही सकते. बड़ा ही मज़ेदार लगता था वो.

ये हैं वो 15 यादगार चीज़ें जिनसे 80 और 90 के दशक के हर बच्चे की सुनहरी यादें जुड़ी होंगी, अगर मेरा बस चलता तो मैं तो सच्ची अपने बचपन में लौट जाती. क्यों आपकी क्या राय है इस बारे में, Comment करके बताइयेगा.