ये कहानी है दो महान भरतनाट्यम डांसर्स की, जिसमें एक कन्नूर ज़िले के पयन्नुर के रहने वाले एक गरीब मलयाली पोडुवल परिवार में पैदा हुए थे और आठ भाई-बहनों में से एक थे. दूसरी एक मलयाली परिवार से थी जो मलेशिया में बस गई थी. वो दोनों अलग-अलग दुनिया से थे, लेकिन भरतनाट्यम उन्हें एक साथ लाया और उनका एक अटूट बंधन बन गया.

हम बात कर रहे हैं वीपी धनंजयन और शांता धनंजयन की, जिनको आज भारत में सबसे प्रसिद्ध 'नाट्य ’ जोड़ों में से एक के रूप में जाना जाता है. ये दोनों 5 दशकों से भी ज़्यादा समय से एक साथ नृत्य कर रहे हैं, इनका शानदार करियर इनके रिश्ते से भी ज़्यादा अटूट है , इनके अटूट बंधन को देखकर ये कहना ग़लत नहीं होगा कि अगर आपका जीवनसाथी आपका हाथ थामकर, कदम से कदम मिलाकर आपके पूरे करियर में आपका साथ दे तो ज़िंदगी बहुत आसान और ख़ुशनुमा हो जाती है.

हालंकि उनका 5 दशकों का ये सफ़र इतना आसान भी नहीं था. हर कपल के लिए प्रेरणास्रोत बनने वाले इस जोड़े की कहानी से आज आपको रू-ब-रू कराते हैं.

The Better India के अनुसार, वीपी धनंजयन के पिता एक स्कूल टीचर थे, और शौकिया नाटकों का मंचन किया करते थे. वीपी धनंजयन अपने पिता को एक गांव से दूसरे गांव की यात्रा करते देखते हुए बड़े हुए. और कहीं न कहीं उनके अंदर भी अपने पिता को देखकर एक कलाकार जन्म ले रहा था. इसी दौरान उनकी मुलाक़ात गुरु चंदू पणिक्कर से हुई, जिनको कलाक्षेत्र के सह-संस्थापक, रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने एक पुरुष नर्तक को खोजने का काम सौंपा गया था. गुरु चंदू पणिक्कर को वीपी धनंजयन में वो नर्तक दिखाई दिया और उन्होंने 1953 में 14 साल के धनंजयन को नृत्य अकादमी में स्कॉलरशिप दिलवाई.

यहीं पर उनकी मुलाकात शांता से हुई थी. लेकिन तब उनको कहां पता था कि आगे चलकर यही महिला उनके जीवन में ख़ास भूमिका निभाएगी. शांता धनंजयन की परवरिश मलेशिया में हुई थी, जहां वो नृत्य और गायन करते हुए बड़ी हुईं थीं. अपनी बच्ची की कला के प्रति रूचि को देखते और पहचानते हुए उनके माता-पिता ने 1952 में आठ साल की उम्र में शांता का दाख़िला कलाक्षेत्र में करा दिया, जहां उन्होंने भरतनाट्यम, कथकली और कर्नाटक संगीत का अध्ययन किया.

शांता से अपनी पहली मुलाक़ात को याद करते हुए वीपी धनंजयन कहते हैं,

'मैं शांता से पहली बार थियोसोफ़िकल गार्डन में मिला था. वो पहली लड़की थी जिसे मैं कलाक्षेत्र में मिला था, और उसे मेरी देखभाल करने का काम सौंपा गया था, क्योंकि मुझे तमिल नहीं आती थी. मैंने उसे उसकी आदतों और उसके मेहनती स्वभाव के लिए पसंद किया.'
धनंजयन कहते हैं, 'हमारी पहली परफॉर्मेंस रुक्मिणी देवी का सीता स्वयंवरम नाट्य नाटकम थी, जो हमने 1956 में कोयंबटूर के एक स्कूल के सभागार में प्रस्तुत की थी.' वहीं शांता धनंजयन बताती हैं कि, 'रिहर्सल के दौरान हमें अलग-अलग बैठने की अनुमति थी, लेकिन मंच पर हमें एक साथ एक छोटे से स्टूल पर ही बैठना पड़ता था, और जिसमें मुझे थोड़ा संकोच होता था. मगर बाद में, हमें इसकी आदत हो गई.'

इन दोनों ने 1962 में कलाक्षेत्र से स्नातक किया. जहां वीपी धनंजयन ने भरतनाट्यम और कथकली में डिग्री प्राप्त की, वहीं शांता धनंजयन ने भरतनाट्यम में डिग्री हासिल की और दोनों ने इनमें विशिष्टता भी हासिल की.

जब वीपी धनंजयन 18 वर्ष के थे, तब उन्होंने शांता को उनके प्रति अपनी भावनाओं के बारे में बताया, लेकिन वो 1962 में मलेशिया चली गईं और वहां जाकर नाट्य सिखाने लगीं. शांता की तरफ़ से कोई जवाब न मिलने के कारण वो असमंजस में पड़ गए. शुरुआत में उनको लगा कि उनकी आर्थिक स्थिति उनके प्यार में रोड़ा बन रही है. वहीं जब शांता के लिए शादी के प्रस्ताव आने लगे तो वो उनको ठुकराने लगी. तब शांता के पेरेंट्स को एहसास हुआ कि धनंजयन के लिए उनका प्यार सच्चा है. और इसके बाद दोनों के पेरेंट्स ने इनको आशीर्वाद दिया और 1966 में केरल के गुरुवायूर मंदिर में दोनों की शादी हो गई.

उन दोनों ने 1960 के आखिर में कलाक्षेत्र छोड़ दिया था और दोनों अपने करियर में आगे बढ़ना चाहते थे जो आगे चलकर उनके लिए नाम और शोहरत लेकर आये. नृत्य क्षेत्र में सफ़लता हासिल करना इनके लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी. अर्थशास्त्र में डिग्री हासिल करने वाले धनंजयन को एक क्लर्क की नौकरी करनी पड़ी, ताकि वो अपनी पत्नी और केरल में रह रहे परिवार दोनों को केरल में एक घर दिला सके. इसके लिए उन्होंने खूब मेहनत की, नौकरी के बाद शाम को वो धार वापस आकर फूस की छत वाले एक कमरे में बच्चों को डांस सिखाते थे.

यहीं से हुई उनकी संस्था भारत कलांजलि की शुरुआत, जिसे अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरतनाट्यम के लिए एक प्रमुख संस्थान के रूप में मान्यता प्राप्त है.

इसके साथ ही वीपी धनंजयन ने कहा,

उस दौरान, मेरे लिए सबसे ज़्यादा चिंता का विषय शांता को ख़ुश रखना था, ताकि पैसे की कमी के कारण कभी भी उसे कोई नुकसान न उठाना पड़े. मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति से वाकिफ़ होने के बावजूद वो मेरे साथ जीवन पथ पर चलने को तैयार हुई. वो अपनी ऐशो-आराम की ज़िन्दगी और पेरेंट्स को छोड़कर मेरे साथ रहने आई. प्रभावशाली या अमीर लोगों के समर्थन के बिना हमारी संस्था का निर्माण एक बहुत बड़ी चुनौती थी, और हमने कड़ी मेहनत और दृढ़ता के साथ अपनी इस संस्था को यहां तक पहुंचाया है.

उन्होंने अपनी कला को केवल 'नाट्य' के रूप में संदर्भित किया, उनका ये भी कहना है कि नृत्य कुछ भी हो सकता है, हमारे लिए इसका मतलब सिर्फ़ भारत की संस्कृति को अपनी कला के ज़रिये दुनिया में फैलाना ही था और है.

50 सालों के अपने डांसिंग करियर में इन दोनों ने एक साथ कई स्टेज शोज़ और कई परफॉर्मेंसेस दी हैं. इस दोनों ने 1980 में खजुराहो डांस फ़ेस्टिवल में, 1981 में जर्मन राष्ट्रपति के भी इन दोनों ने विशेष परफॉर्मेन्स दी थी. 1988 मेरिन राष्ट्रपति भवन में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया. धनंजयन ने कई अंतर्राष्ट्रीय कलाकारों के साथ भी काम किया. सितारवादक पंडित रविशंकर, न्यूयॉर्क के डांसर जैक्स डी अंबोइज़, द ओहिओ वैलेट कंपनी के साथ काम किया. इन दोनों को अवॉर्ड्स से ज़्यादा दर्शकों की प्रशंसा मिली है.

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इस कपल का मानना है कि ये नृत्य, या नाट्य, एक पेशा और कला है जिसके बिना वो जीवन की कल्पना नहीं कर सकते. जब हम बच्चे थे तब से हम नाट्य में सांस ले रहे हैं. हमारा जीवन केवल नाट्य के आसपास रहा है, और हमेशा रहेगा.'

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साल 2017 में वोडाफ़ोन के एक विज्ञापन में भी ये जोड़ा नज़र आया था. धनंजयन ने बताया कि उनका बेटा एक फ़ोटोग्राफ़र है और किसी ने उससे पूछा था कि क्या उसके पेरेंट्स इस कैम्पेन का हिस्सा बनेंगे. पिछले साल मार्च में उन्हें इस विज्ञापन का ऑफ़र मिला और उन्होंने हां कर दिया.

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इसकी शूटिंग गोवा में हुई. वो बताते हैं कि इस दौरान हमने काफ़ी कुछ नया किया, जैसे शांता ने पैरासेलिंग की और मैंने स्कूटर चलाया. हम दोनों के लिए ये बहुत अच्छा और नया अनुभव था. इसके बाद ये इस विज्ञापन की पूरी सीरीज़ में दिखाई दिए.