आज के दौर में इंसान न सिर्फ़ जानवरों का बल्कि इंसान का भी सबसे बड़ा दुश्मन बनता जा रहा है. आज अधिकतर लोग डिप्रेशन के शिकार हैं और दिन ब दिन हिंसक भी होते जा रहे हैं. ऐसे में हम अपना गुस्सा चाहे वो इंसान हो या जानवर किसी पर भी उतार देते हैं, लेकिन ये भी सच है कि इस दुनिया में हर इंसान एक जैसा नहीं है.

आज हम आपको एक ऐसे शख़्स के बारे में बताने जा रहे हैं जो मात्र 7 साल की उम्र से ही बेजुबां जानवरों को नई ज़िंदगी देने का नेक काम कर रहे हैं. इनका नाम है बिनोद 'दुलू' बोरा. 30 साल के बिनोद असम के नौगांव ज़िले के चपनल्ला गांव के रहने वाले हैं.

आज बिनोद नौगांव में वन्य जीव विशेषज्ञ और बचावकर्ता के नाम से प्रसिद्ध हैं. सिर्फ़ बिनोद ही नहीं उनकी पत्नी भी इस नेक काम में उनके साथ टीम की तरह कार्य करती हैं. पिछले कुछ सालों में इन दोनों ने मिलकर नौगांव, कारबी और आंगलोंग इलाक़े से कई सांपों, तेंदुओं एवं हाथियों की जान बचाई है.

बिनोद पिछले तीन दशकों में 2500 जानवरों को रेस्क्यू कर चुके हैं. इस दौरान वो 3 हाथी, 2 तेंदुओं के शावकों, 3 भालुओं के शावकों, 6 लोरिज़, 600 से अधिक सांप, 10 चीनी पैंगोलिन, 20 से ज़्यादा हिरन, 14 किंग कोबरा, 100 से अधिक कछुए, घोड़े, बंदर, मोंगोज़, सियार, गिलहरी और सैकड़ों वन्य जीव एवं पक्षियों को जीवनदान दे चुके हैं.

इन वन्य जीव जंतुओं को नया जीवन देने के लिए बिनोद बोरा तरह-तरह कार्य करते हैं. कुछ समय पहले उन्होंने असम के कारबी हिल श्रेत्र में 25 हज़ार केले के वृक्ष लगाकर हाथियों के लिए एक गलियारा बनाया, ताकि हाथी खाने की तलाश में रिहायशी इलाक़ों में न आयें और शिकारियों से भी बचे रहें.

दरअसल, बिनोद ने जीव-जंतुओं को बचाने की ये कला डिस्कवरी चैनल से सीखी है. उन्होंने सांपों को पकड़ने की कला भी डिस्कवरी चैनल से ही सीखी. जिस कारण वो अब तक करीबन 400 से अधिक सांपों को पकड़ चुके हैं. बिनोद कोबरा, पाइथन और एशिया के सबसे ज़हरीले सांप क्रेट्स को भी पकड़कर उन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुंचा चुके हैं.

'द बेटर इंडिया' से बातचीत के दौरान बिनोद ने कहा कि, 'जब मैं मात्र 14 साल का था उस वक़्त मैंने अपना पहला रेस्क्यू किया था. इस दौरान मैंने गांव के साप्ताहिक बाज़ार में मांस के लिए बेचे जा रहे जंगली पक्षियों, कछुओं और छोटे स्तनधारी जानवरों को देखा. इसलिए मैंने उन्हें ख़रीदकर एक नई ज़िंदगी देने का निर्णय लिया. मैं अपने बड़े भाइयों से पैसे लेकर उन जानवरों को क़ैद से आज़ाद कराने में लग गया.

इसके करीब पांच साल बाद बिनोद ने साल 1994 में नौगांव के 'ग्रीन गार्ड नेचर ऑर्गनाइजेशन' के साथ काम करना शुरू किया. जो वन्यजीव संरक्षण के लिए ज़मीनी स्तर पर कार्य कर रहा है. यहीं से बिनोद का ये सफ़र शुरू हुआ.

जीव जंतुओं की मदद के लिए बिनोद ने एक 24X7 मोटरसाइकिल हेल्पलाइन सेवा भी शुरू की है. बिनोद जीव-जंतुओं के संरक्षण को लेकर गांव वालों के साथ-साथ स्कूल और कॉलेजों में भी कई तरह के कार्यक्रम चलाते हैं.

सिर्फ़ जीव-जंतुओं को बचाना ही नहीं, बिनोद ने कुछ साल पहले 35 आदिवासी शिकारियों को बाण व जाल छोड़कर खेती करने के लिए भी प्रेरित किया था.

बिनोद के इन्हीं कार्यों के चलते साल 2014 में उन्हें 'एशियन सेंचुरी' की तरफ़ से 'वाइल्डलाइफ़ सर्विस अवार्ड' से सम्मानित किया गया था.