इश्क़ यानी कि बनारस...


इस शहर में कुछ ऐसा है ही नहीं, जो किसी को पसंद न आए. अतरंगी इस शहर के व्यवहार और त्यौहार भी सतरंगी है. 'हर हर महादेव' के स्वर से गूंजती और पान की ख़ुशबू से सराबोर यहां की गलियां किसी को भी पराया महसूस होने नहीं देती.

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आपकी और हमारी सोच से कहीं ऊंची हैं यहां की महिमा. एक बार जो यहां आता है उसका कुछ हिस्सा हमेशा के लिए यहीं का होकर रह जाता है.


चाहे दिवाली हो या दशहरा, इस शहर में हर त्यौहार ही अपने-आप में ख़ास बन जाता है.

बरसाने की, नन्द गांव की, मथुरा की होली दुनियाभर में मशहूर है, पर रंगों का त्यौहार होली भी बनारस में आकर अलग रूप ले लेता है.

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राख से होली

फाल्गुन एकादशी के दूसरे दिन, काशी के मणिकर्निका घाट पर चिता की राख से होली खेली जाती है. शिवभक्त, डमरू स्वर के बीच एक-दूसरे को राख लगाते हैं.

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सदियों पुरानी प्रथा

शिवभक्तों का मानना है कि महादेव श्मशान की चिता के भस्म से ही होली खेलते हैं. इस होली को 'मसान की होली' के नाम से भी जाना जाता है. शिवभक्तों को ऐसा लगता है, मानो वो महादेव के साथ ही होली खेल रहे हों. इस होली में साधु-संतों से लेकर आम लोग भी हिस्सा लेते हैं.

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बाबा मसान नाथ की आरती से होती है शुरुआत

इस लेख के मुताबिक, मसान की होली की शुरुआत बाबा मसान नाथ के श्रृंगार और आरती से होती है.


मणिकर्निका घाट पर बाबा मसान नाथ की विधिवत आरती की जाती है. डमरूओं के स्वर के बीच, आरती के बाद साधु-संत, आम लोग भस्म से होली खेलते हैं. होली खेलने के बाद मणिकर्निका घाट पर स्नान करते हैं.

महाशिवरात्रि से ही हो जाती है शुरुआत

एक अन्य लेख के अनुसार, मणिकर्णिका घाट पर चिता की राख से होली खेलने की तैयारियां महाशिवरात्री से ही शुरू हो जाती हैं. चिता की राख को छानकर इकट्ठा किया जाता है.

जो मज़ा काशी में है, वो कहीं और कहां?