'ब्लैक होल ऑफ़ कलकत्ता' क्या है, शायद कम ही लोगों को इसके बारे में जानकारी होगी, लेकिन आज हम आपको इतिहास की एक वीभत्स घटना के बारे में बताने जा रहे हैं.

अगर आप कोलकाता गए हों, तो आपने 'फ़ोर्ट विलियम' का नाम ज़रूर सुना होगा. ये फ़ोर्ट वर्तमान में थल सेना के पूर्वी कमान का मुख्यालय है. ये कोलकाता शहर के सबसे संपन्न इलाके में स्थित है. 'फ़ोर्ट विलियम' के सामने ही रेस कोर्स और ऐतिहासिक विक्टोरिया मैदान मौजूद है.

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दरअसल, 'फ़ोर्ट विलियम' के एक छोटे से कमरे में इतिहास का एक ख़ौफ़नाक राज़ दफ़न है. बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के सिपाहियों ने सन 1756 में 146 अंग्रेज़ सैनिकों को बंधक बनाकर इस किले की काल कोठरी में भेड़ बकरियों की तरह ठूंस दिया था. इस छोटी सी काल कोठरी में क्षमता से अधिक लोग भर जाने से घुटन के चलते 123 सैनिकों की मौत हो गयी थी. आज इसी कमरे को 'ब्लैक होल' के नाम से जाना जाता है.

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'ईस्ट इंडिया कंपनी' का आगमन

17वीं शताब्दी की शुरुआत में 'ईस्ट इंडिया कंपनी' भारत आई थी. इस दौरान उसने भारत के कुछ शहरों में व्यापार करना शुरू कर दिया था. उसी दौरान जॉब चार्नक नामक एक अंग्रेज़ इस कंपनी का हिस्सा बना. अपने काम के चलते वो प्रमोशन पाकर सन 1685 में बंगाल में 'ईस्ट इंडिया कंपनी' का मुख्य एजेंट बन गया.

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ये वो दौर था जब कोलकाता अस्तित्व में भी नहीं था. इस दौरान बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला व ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच कस्टम ड्यूटी को लेकर रस्साकशी चल रही थी. सन 1685 से 1687 के बीच जॉब चार्नक की ज़िम्मेदारी में 'ईस्ट इंडिया कंपनी' का सामान बंगाल में उतरना था. नवाब को इसकी जानकारी हुई, तो उसने इसे रोकने के लिए जुगत लगानी शुरू कर दी.

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इस दौरान जॉब चार्नक को अंदाज़ा था कि नवाब सिराजुद्दौला उसके रास्ते में अवरोध पैदा कर सकता है. इसलिए उसने सामान को बचाने के लिए 'ईस्ट इंडिया कंपनी' के कुछ सैनिकों को हुगली नदी के किनारे बसे गांव सुतानुटी जाने का आदेश दिया.

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इसी दौरान अंग्रेज़ों ने मुगल बादशाह औरंगजेब के साथ एक अनुबंध कर लिया, जिसके तहत जॉब चार्नक को सुतानुटी से होकर व्यापार करने की छूट मिल गई. उस दौर में सुतानुटी गांव के पास दो अन्य गांव कलिकाता व गोंविदपुर हुआ करते थे. बाद में ये तीनों गांव मिलकर कलकत्ता शहर के नाम से मशहूर हुए.

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दरअसल, सुतानुटी गांव हुगली नदी के किनारे बसा हुआ था, इसलिए भी 'ईस्ट इंडिया कंपनी' को ये इलाका व्यापार के लिहाज से बहुत मुफ़ीद लगा. कुछ समय बाद 'ईस्ट इंडिया कंपनी' ने इन तीनों गांवों को ख़रीद कर धीरे-धीरे यहां व्यापार का विस्तार करना शुरू कर दिया. इस दौरान यहां कंपनी का व्यापार बढ़िया चलने लगा और कई फ़ैक्ट्रियां भी लग गयीं.

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ऐसे में 'ईस्ट इंडिया कंपनी' को इन फ़ैक्ट्रियां को सुरक्षित रखने के लिए एक किले की ज़रूरत महसूस हुई. 17वीं सदी के आख़िरी दशक से 'ईस्ट इंडिया कंपनी' ने 'फ़ोर्ट विलियम' का निर्माण शुरू किया जो 10 साल में बनकर तैयार हो गया. इस किले में 14/18 फ़ीट का एक खास कमरा भी बनाया गया, जिसका नाम रखा गया 'ब्लैक होल'!

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इस ख़ास कमरे का नाम 'ब्लैक होल' इसलिए भी रखा गया क्योंकि इस कमरे में दो बेहद छोटी रोशनदान बनाई गई थीं. अंग्रेज़ों ने इस कमरे का निर्माण छोटे-मोटे अपराध करने वाले अपराधियों को सजा देने के लिए किया था. बाद में यही 'ब्लैक होल' अंग्रेज़ों के लिए कब्रगाह बन गया.

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सिराजुद्दौला ने की फ़ोर्ट पर चढ़ाई

ईस्ट इंडिया कंपनी भी इस बात को जानती थी नवाब सिराजुद्दौला के रहते उनका काम इतना आसान नहीं है, इसलिए उसने 'फ़ोर्ट विलियम' का निर्माण करने के बाद अपनी सैन्य शक्ति में इजाफ़ा करना शुरू कर दिया. जब इसकी जानकारी सिराजुद्दौला को हुई तो उसे लगा शायद अंग्रेज़ उन पर हमले की तैयारी कर रहे हैं. इस पर उन्होंने तुरंत अंग्रेज़ों को संदेश भेजा कि वो सैन्य शक्ति न बढ़ाए, लेकिन अंग्रेज़ों ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. इससे नाराज़ होकर सिराजुद्दौला हाथी, ऊंट व हज़ारों सैनिकों के साथ किले की ओर रवाना हो गए.

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जब 'ब्लैक होल' ही बन गया अंग्रेज़ों के लिए कब्रगाह

सिराजुद्दौला 5 जून 1756 को मुर्शिदाबाद से रवाना होकर 19 जून को 'फ़ोर्ट विलियम' पहुंच गया. चूंकि उस वक्त तक अंग्रेज़ों के पास मज़बूत सैन्य बल नहीं था इसलिए उससे मुक़ाबला नहीं कर सके. इस दौरान अधिकतर अंग्रेज़ सिराजुद्दौला के आने से पहले ही जलमार्ग के सहारे भाग गए. जबकि कमांडर जॉन जेड हॉलवेल के नेतृत्व में मात्र 200 अंग्रेज़ सैनिक किले की कमान संभाले हुए थे.

इस दौरान सिराजुद्दौला के सैनिकों ने वहां भारी तोड़फोड़ मचाई. इसके बाद उन्होंने 146 अंग्रेज़ सैनिकों को क़ैद कर उसी 14/18 फ़ीट के कमरे में बंद कर दिया. जून का गर्म महीना था इसलिए तीन दिन बाद ही 123 अंग्रेज़ सैनिकों ने दम घुटने से जान दे दी.