बहुत लोगों से सुना है, 'जो कभी हॉस्टल में नहीं रहा, उसने लाइफ़ में बहुत कुछ मिस किया है.' पानी जैसी दाल, नहाने के लिए लाइन और महा-अजीब वॉर्डन (ख़ासकर गर्ल्स हॉस्टल) के अलावा भी बहुत कुछ होता है हॉस्टल में.


घर के ऐश-ओ-आराम के बाद अगर हॉस्टल में संघर्ष कर लिया तो समझ लो जीवन सफ़ल हो गया.

Source: Daily Excelsior

हॉस्टल में कोई इंसान लाइफ़ के बहुत सारे स्किल्स सीखता है. जैसे-


1. नहाते हुए पानी चले जाने पर, शरीर पर लगे साबुन को गीले तौलिये से पोंछना और फ़्रेश फ़ील करना.
2. बेसिन में बाल धोना
3. पॉटी प्रेशर रोकना़
4. चावल दही खाकर जीना
5. पनीर की सब्ज़ी में से पनीर और आलू के पराठों में आलू ढूंढना
6. भूख हड़तला करना.... वगैरह वगैरह

और सबसे अहम सीख है 'एकता'... एकजुट होकर कोई भी काम करना, स्ट्राइक से लेकर त्यौहार मनाने तक.

Source: Pro Kerala

अक़्सर त्यौहारों और लंबी छुट्टियों में हॉस्टल खाली हो जाते हैं, पर कुछ लोग किन्हीं कारणों से वहीं रहने पर मजबूर हो जाते हैं. 350 बच्चों के हॉस्टल में 50 बच्चे, भूतहा फ़ीलीिग के साथ रहते हैं.


त्यौहार अगर घर में मनाते हैं तो हॉस्टल में भी तो मनाएंगे न, वो भी तो घर ही बन जाता है. मेरे भी हॉस्टल में मिल-जुलकर दिवाली मनाते थे.

Source: Times of India

हॉस्टल की दिवाली


आपसी सहमति से 4-5 लड़कियां इवेंट मैनेजर बनाई जाती थीं. सभी लड़कियां एक तय राशि जमा करतीं और फिर शुरू होती ख़रीददारी. बाक़ायदा दिये, सरसों का तेल, मोमबत्ती, रंगोली के लिए रंग, फूल, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति ख़रीदी जाती.

दियों को पानी में डुबाकर रखा जाता, सूखाया जाता. कुछ गुणवान लड़कियां हॉस्टल के एन्ट्री, मेस के सामने, कॉमन हॉल के गेट पर रंगोली बनातीं.

शाम में सभी इंडियन अटायर में इकट्ठा होते और लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती, प्रसाद बांटा जाता. हॉस्टल के हर एक कोने में दिये और मोमबत्ती जलाई जाती.

Source: Vidya Jyoti Hostel

मेस वालों का ख़ास डिनर


साल के कुछ एक दिन मेस वाले छात्राओं पर मेहरबान होते. त्यौहार पर विशेष मेन्यू तैयार किया जाता. सालभर भले पनीर की सब्ज़ी में पनीर न मिले पर त्यौहार पर मजाल है पनीर न मिले. मेस वाले बिठाकर खिलाते थे. एक और पूड़ी और वाली ज़िद्द भी कर देते थे. मतलब त्यौहार पर घर के खाने की याद न आये इसका पूरा इंतज़ाम करते थे.

बॉनफ़ायर और उसके आस-पास बैठकर गप्पें


यूं तो हॉस्टल में रात-रातभर गप्पें चलती हैं. पर दिवाली वाली रात को बॉनफ़ायर टाइप किया जाता. स्पीकर पर गाने बजाकर डांस और तारों के नीचे गॉसिप की अलग ही फ़ील थी.

हॉस्टल वाली दिवाली में भी बहुत फ़ील थी. घर की याद तो आती थी पर हर कोई इसी कोशिश में रहता था कि घर की याद कम से कम आए.