पिछले कई दशकों से सफ़लता के पैमाने को आपकी जेब में रखे कैश के साथ आंका जाता है. इस भौतिकवादी दौर में जो आर्थिक रूप से उन्नत है, उसी को सफ़ल मान लिया गया है. लेकिन दुनिया में कुछ ऐसे भी विरले लोग हैं, जिनके लिए सफ़लता केवल दौलत या शोहरत नहीं, बल्कि समाज का उत्थान होता है. जो मानवता के भले के लिए शानो-शौकत भरी ज़िंदगी से मुंह मोड़ने से भी गुरेज़ नहीं करते.

रविंद्र कोहले भी एक ऐसे ही शख़्स हैं, जिन्होंने अकेले दम पर महाराष्ट्र के मेलघट जिले की कायापलट कर दी.

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वे न केवल मेलघट में बीमार लोगों का इलाज करते हैं, बल्कि यहां पर रहने वाले लोगों को सामाजिक और आर्थिक रूप से उन्नत बना रहे हैं. 25 सितंबर, 1960 को महाराष्ट्र में पैदा हुए रविंद्र कोहले ने 1985 में मेडिकल की पढ़ाई पूरी की थी. रविंद्र के पिता को ये अंदाज़ा भी नहीं था कि उनका बेटा शानो-शौकत भरी डॉक्टरी लाइफ़ छोड़ कर महाराष्ट्र के आदिवासी जंगलों में संघर्ष का जीवन बिताने वाला है.

डॉ. कोहले महात्मा गांधी के ज़िंदगी से बेहद प्रेरित थे. डेविड वार्नर की किताब ‘Where There is no Doctor’ ने उनके लिए एक डॉक्टर की सफ़लता के मायनों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया.

अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. कोहले महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों का जायज़ा लेने पहुंचे. घूमते हुए वे मेलघाट जिले के बेरागढ़ गांव पहुंचे. ये गांव इतना पिछड़ा था कि यहां महज़ पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा के लिए 40 कि.मी. दूर चलना पड़ता था. यह जगह बेहद पिछड़ी हुई थी और यहां मेडिकल सुविधाएं न के बराबर थीं. अंधविश्वास, गरीबी, कुपोषण और कई बीमारियों ने इस गांव को जकड़ा हुआ था. डॉ. कोहले ने इस जगह की बेहतरी के लिए काम करना शुरु किया.

इस क्षेत्र में एक साल काम करने के बाद डॉ. कोहले ने मेलघाट के कुपोषण के हालातों पर एक थीसिस लिखी, जिसे बीबीसी रेडियो ने कवर किया. डॉ. कोहले अपने मरीज़ों से केवल एक रुपया चार्ज करते हैं. मेलघाट जैसे पिछड़े क्षेत्र में मॉर्डन उपकरणों की कमी थी, जिसकी वजह से यहां की महिलाओं को डिलीवरी के समय बेहद परेशानी आती थी. वे पारंपरिक तरीके से इसे सीखने के लिए 6 महीने के लिए मुंबई चले गए थे.

डॉ. कोहले ने शादी भी बेहद सामान्य तरीके से की. उन्होंने एक सिंपल रेजिस्ट्रेशन कराया था. महज़ 5 रुपयों में उनकी शादी हो गई थी. उनकी शादी नागपुर में रहने वाली डॉ. स्मिता से हुई. वे न केवल डॉ. कोहले के साथ इस मिशन में जुट गईं, बल्कि उन्होंने यहां मौजूद कई अंधविश्वासी प्रथाओं को खत्म करने में मदद की. अपनी डिलिवरी में परेशानी होने के बावजूद उन्होंने यहां रहने वाले लोगों की तरह ही अपने बेटे को जन्म दिया था.

डॉ. कोहले का बेटा न केवल एक सफ़ल किसान है, बल्कि वह अपने पिता को मेडिकल और हेल्थकेयर गतिविधियों के लिए फंड भी मुहैया कराता है. गौरतलब है कि डॉ. कोहले ने कभी कोई सरकारी मदद या किसी एनजीओ की मदद नहीं ली है.

इस क्षेत्र में कुपोषण एक गंभीर समस्या थी. इस वजह से शिशु मृत्यु दर यहां 1000 में से 200 थी. निमोनिया और डायरिया जैसी बीमारियां काफ़ी आम थीं. डॉ. कोहले के प्रयासों से आज ये संख्या घट कर 60 से भी कम रह गई है.

कोहले जानते थे कि इस क्षेत्र से कुपोषण को हटाने के लिए गरीबी हटानी ज़रूरी है. उन्होंने यहां की कुछ ज़मीन को किराए पर लिया और उस पर Scientific खेती करनी शुरू की. वे लोगों को Mixed Crop Farming के फ़ायदों से अवगत कराने लगे. उन्होंने लोगों को विश्वास दिलाया कि अपनी ज़रूरतों के अलावा आर्थिक उन्नति के लिए भी खेती का सहारा लिया जा सकता है. ये डॉ. कोहले की मेहनत का ही परिणाम है कि उनके प्रयासों के बाद से इस जगह न तो किसी किसान ने आत्महत्या की है और न ही कोई किसान नक्सल गतिविधियों में पाया गया है.

कोहले परिवार मेलघाट के किसी सामान्य परिवार की तरह ही रहता है. उनके हालातों को देखते हुए एक मंत्री डॉ. कोहले के लिए घर भी बनवाना चाहता था, लेकिन कोहले ने इसकी जगह मंत्री से रिक्वेस्ट की कि गांव की सड़कों को बेहतर बना दिया जाए. आज इस क्षेत्र में 70 प्रतिशत गांव सड़क से जुड़े हुए हैं.

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बिजली अब भी इस क्षेत्र की अहम समस्या बनी हुई है. डॉ. कोहले मेलघाट के सभी गांवों में बिजली की सुविधा मुहैया कराना चाहते हैं. उनका सपना मेलघाट में एक एक्ज़ाम सेंटर खोलने का भी है, जहां आदिवासी युवाओं को पढ़ाया जा सके और गांव के बच्चों को मुख्यधारा में लाया जा सके.

डॉ कोहले का युवाओं को संदेश साफ़ है. वे कहते हैं कि युवाओं को समाज के लिए काम करना चाहिए. दुनिया में दूसरे लोगों की खुशियों के लिए काम करने से बड़ी संतुष्टि किसी चीज़ में नहीं है.