"अरे ओ दादा, कहां चल दिए?" दीना ने मेवालाल को भरी दोपहरी में जाते देख अचानक से आवाज़ दे दी.   

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"अरे तुम यहां बैठे क्या कर रहे. मालूम नहीं हुआ कि आज चौपाल लगी है. चौपाल?" दीना ने बड़ी हैरानी जताते हुए कहा. “हां चौपाल. 10 गांव के लोग शामिल हो रहे. पिछले साल सूखे से हुए नुक़सान का ब्योरा देना है."  

"अच्छा, अच्छा. दादा फिर हम भी चलते हैं. देखें तो आख़िर अबकी क्या हाथ लगता है. पिछले तीन साल से चौपाल ही देखी है. पच्चीसों बार जनपद मुख्यालय भी हो आए, लेकिन आज तक एक टका हाथ नहीं आया."  

चौपाल में पहुंचकर दीना बिल्क़ुल खोया लग रहा था. हर तरफ़ निराश चेहरे. सब अपना-अपना दुख बताते हुए और हर किसी के मुंह पर बस एक ही बात कि इस बार धान पर ऊपर वाला मेहरबान हो जाए. बस इस बार जमकर बारिश हो जाए. दीना इन सभी को देखकर हैरान था.   

"बारिश? ये सब अभी भी उस मनहूस की आस लगाए हैं. अरे तीन साल हो गए हैं. अब तो मिट्टी भी धूल बन चुकी है." दीना ने मेवालाल को देखते हुए बोला.   

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"अरे मनहूस काहे दीना? मनहूस तो ये सूखा है, बारिश तो खुशियां लाएगी. मौसम वालों ने भविष्यवाणी की है कि इस बार बारिश अच्छी होगी."  

"हां, हां, मौसम वाले... बड़े आए." दीना ने मुंह घुमाकर मेवालाल की बात को अनसुना कर दिया.  

शाम के 5 बज चुके थे, चौपाल से निपट कर दीना घर पहुंच गया. "अम्मा से कहो पानी दें." दीना ने मधु से कहा.   

"अम्मा चल नहीं पा रहीं. जोड़ फिर से जकड़ गए हैं". मधु ने पानी का गिलास आगे बढ़ाते हुए जवाब दिया.  

"हम्म. जोड़!! जब देखो जकड़ जाते. इन औरतों को बस काम न करने का बहाना चाहिए. सारा दिन चले हम और ससुरे जोड़ इनके जकड़ जाते हैं. अब यहां क्यों खड़ी हो. अंदर जाकर तेल मल अम्मा के पैरों में." दीना ने तिलमिलाते हुए कहा. दरअसल दीना ऐसा था नहीं लेकिन इस मुश्किल दौर ने उसे चिढ़चिढ़ा बना दिया था. दीना आगे के दिनों की चिंता करता हुआ लेट गया और फिर से उसे नींद आ गई.   

"दीदी बाबू काहे ख़िसियाए हैं?" गोलू ने बड़ी मासूमियत के साथ मधु से पूछा.  

"बाबू इस समय चिंता में है. बारिश नहीं हो रही ना इसलिए." मधु ने कोशिश की कि वो गोलू को समझा दे लेकिन बच्चे इतनी जल्दी कहां समझते हैं.  

"बारिश से बाबू का क्या लेना देना? अच्छा है नहीं हो रही ना, नहीं तो घर में पानी टपकने लगता है. याद है पिछले साल सांप भी तो घुस आया था घर में. ऊपर से कितना कीचड़ रहता है. हमको नहीं पसंद ये बारिश." गोलू बारिश के लिए अपनी कुढ़न बाहर निकालता रहा.   

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"ऐसा नहीं कहते भाई. बारिश से ही तो हमारी फ़सलें बढ़ती हैं और इन फ़सलों से हमारा खाना पीना, तुम्हारे स्कूल की कॉपी किताबें सब ख़रीद पाते हैं. बारिश ना हुई तो तुम्हारा स्कूल जाना भी बंद हो जाएगा.  

"स्कूल जाना बंद? नहीं नहीं हमको तो बहुत पढ़ना है अभी, बड़ा अफ़सर बनना है. दीदी अब कैसे होगा."   

"होगा ना मेरे भाई ज़रूर होगा. हमारे बाबू ख़ुद जाकर बदल के पेट में भाला भोंक आएंगे और बादल के पेट से बारिश गिरने लगेगी." राधा ने गोलू को बहलाने के लिए ये बात कही लेकिन गोलू ने उसे सच मान लिया. अब वो अपने दोस्तों को कहता फिरता कि उसके बाबू बादलों के पेट में भाला भोंकने जाएंगे और फिर खूब बारिश होगी. बच्चे उस पर हंसते मगर उसे फर्क़ कहां पड़ता.  

 इधर दीना का बड़ा बेटा दिन रात खेत में लगा रहता. उसे पूरी उम्मीद थी कि इस बार बारिश ज़रूर होगी. यही सोच कर तो उसने सेठ का कर्ज़ लौटाने का वादा किया था जो उसने पिछले साल बारिश की उम्मीद में उठाया था. एक भी किश्त नहीं भरी थी. उधर सेठ की तरफ़ से अब धमकियां आने लगी थीं. जिस ज़मीन के सहारे दीना का परिवार चलता है उसका बड़ा हिस्सा इस कर्ज़ को चुकाने में निकल जाता.   

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दीना ने बहुत मना किया था मगर उसका बेटा नहीं माना. उसे अपने खेतों से प्यार था तभी तो बचपन में ही पढ़ाई छोड़ कर लग गया था खेती करने. इन्हीं बंज़र होते खेतों को फिर से हरा भरा करने की धुन में उसने दीना के नाम पर सेठ से कर्ज़ ले लिया था. दीना ने मना किया तो कहने लगा उसे उसका हिस्सा दे दो. अब एक पिता कैसे अपने रहते अपनी ज़मीनें बेटे को बांट दे. उसे पता था कि उसकी बेटी की शादी, गोलू की पढ़ाई, उसका घर सब इन्हीं खेतों पर निर्भर है. सो उसने कर्ज के लिए हां कर दी. लेकिन हाथ कुछ ना आया. तीसरे साल भी बारिश ना हुई. हां,मगर उसके बेटे को उम्मीद थी कि इस साल जम कर बारिश होगी.  

दूसरी तरफ़ दीना हारने लगा था. उसे अब सबसे चिढ़ होने लगी थी. घंटों आसमान को देखते हुए कुछ कुछ बड़बड़ाता रहता था. आज का दिन बहुत भारी था. ये गर्मी जिस्म की चमड़ी और खेत की मिट्टी दोनों को जला रही थी और बारिश का दूर दूर तक कोई अता पता नहीं था. इसी बीच एक और मनहूस खबर आ गई. दीना के बेटे ने डरते हुए बताया कि सेठ की धमकी आई है. अगर 30 दिन में कर्ज़ ना चुकाया तो वो खेत हथिया लेंगे. बेटा सोच रहा था कि बाबू चिल्लाएंगे ग़ुस्सा करेंगे लेकिन इसके उलट दीना एकदम शांत था.  

उसकी ये मुर्दे जैसी शांति सबको खटक रही थी लेकिन बोल कोई नहीं रहा था. कुछ देर बाद दीना घर से खेतों की तरफ चला गया. दिन दोपहर से शाम की तरफ जैसे जैसे बढ़ रहा था वैसे वैसे आसमान गुलाबी होता जा रहा था. हर किसी की निगाहें आसमान की तरफ़ ही थीं आज. शाम होते होते आसमान ने ज़मीन को अपनी बूंदों द्वार चूमना शुरू कर दिया था. हर किसी के चेहरे खिल उठे. दीना का बेटा मारे खुशी के उछल पड़ा. बहन और अम्मा को पकड़ पकड़ कर कहने लगा कि देखा मैंने कहा था ना बारिश होगी. सब खुश थे कि तभी सबको ख़याल आया कि दीना अभी तक घर नहीं लौटा. उसका बेटा उसे बुलाने खेत की तरफ़ बढ़ा.   

अपनी खुशी ज़ाहिर करने वो जैसे ही खेत पहुंचा वैसे ही उसके पैरों तले ज़मीन ख़िसक गई. दीना उसी पेड़ की टहनी से लटक रहा था जिसके नीचे वो खाट रख के सोया करता था. उसने अपने खेतों में उछतली बूंदों को भी नहीं देखा उससे पहले ही वो सबसे रूठ कर दूर चला गया. देखते ही देखते ये ख़बर गांव भर में फैल गई. उसकी बीवी उसकी बेटी और बेटा उससे लिपट लिपट कर रो रहे थे.  

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इधर दीना का छोटा बेटा अपने दोस्तों को गर्व से ये बता रहा था कि देखा उसके बाबू ने बादलों में छेद कर दिया और बारिश हो गई. अब उसके बाबू हाथ में भाला ले कर हमेशा ऊपर बैठे रहेंगे और जब भी बारिश नहीं होगी तब तब वो भाले से बादलों में छेद कर दिया करेंगे.