भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में कई क्रांतिकारियों ने हिस्सा लिया था. भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, चंद्रशेखर आज़ाद, विपिन चंद्र पाल, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान जैसे कई क्रांतिकारियों ने अपनी जान पर खेलकर भारत को गुलामी की ज़ंजीरों से मुक्त कराया था. इस दौरान कई ऐसे अन्य क्रांतिकारी भी रहे जो अपनी जान की परवाह किए बगैर आज़ादी की जंग में कूद पड़े थे, लेकिन समय के साथ लोगों द्वारा इन्हें भुला दिया गया.

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आज़ादी की लड़ाई में महिलाओं का भी विशेष योगदान रहा. रानी लक्ष्मीबाई, सरोजनी नायडू, बेगम हज़रत महल, अजीजनबाई आदि जैसी वीरांगनाओं में एक दुर्गा देवी भी थीं, जिन्हें लोग 'दुर्गा भाभी' कहते थे. वो एक निडर महिला थीं, जो बंदूक उठाने से भी नहीं घबराई और स्वतंत्रता सेनानियों की मदद करने में पीछे नहीं रहीं.

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कौन थीं दुर्गा भाभी?

इलाहबाद में जन्मीं दुर्गावती देवी का बचपन बिन मां के साए में गुज़रा, वो सिर्फ़ तीसरी कक्षा तक पढ़ाई कर सकीं. जब वो मात्र 12 साल की थीं तब उनका विवाह क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा से कर दिया गया.

सांडर्स गोलीकांड में भगत सिंह को बचाया

दुर्गा भाभी वही वीरांगना थीं जो ब्रिटिश पुलिस अफ़सर जॉन सांडर्स को गोली मारने के बाद भगत सिंह को लाहौर से अंग्रेज़ों की नाक के नीचे से निकालकर कोलकाता ले गयी थीं. इस दौरान पुलिस से बचने के लिए दुर्गा भाभी ने ही भगत सिंह का रंग रूप बदलकर और ख़ुद को उनकी पत्नी बता कर उन्हें कोलकाता ले गई थीं. इस दौरान भगत सिंह दुर्गा देवी के घर पर ही रुके थे.

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दुर्गा देवी के पति भगवती चरण वोहरा भी एक क्रांतिकारी थे. शादी के बाद दुर्गा देवी पति के कामों में सहयोग करने लगीं. इस दौरान घर में जो भी स्वतंत्रता सेनानी आते वो उनका ख़ूब आदर-सत्कार और सेवा करतीं. इस वजह से सभी क्रांतिकारी उन्हें दुर्गा भाभी बुलाते थे.

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28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर दुर्गा भाभी के पति व क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा अपने साथियों के साथ बम बनाने के बाद परीक्षण कर रहे थे. इस दौरान बम फटने से उनकी मौत हो गई. पति की मृत्यु के बाद भी दुर्गा देवी सक्रिय रहीं. साल 1937 में दुर्गा भाभी दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष नियुक्त की गईं. इस पद पर आकर उन्होंने कांग्रेस के कार्यक्रमों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की.

क्रांतिकारियों का आश्रयस्थल

क्रांतिकारी दुर्गा भाभी का घर क्रांतिकारियों के लिए आश्रयस्थल बन गया था. जो भी क्रांतिकारी अंग्रेजों के ख़िलाफ़ कोई योनजा बनाता, तो ठिकाना दुर्गा भाभी का घर ही होता था. वो क्रांतिकारियों के लिए चंदा इकट्ठा करतीं और पर्चे बांटती थीं. पति की मौत के बाद दुर्गा भाभी के अंदर आज़ादी की ऐसी मशाल जल रही थी कि वो निडरता से किसी भी काम को अंजाम देने के लिए भी तैयार थीं.

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बताया तो ये भी जाता है कि चंद्रशेखर आज़ाद के पास आखिरी वक़्त में जो माउज़र थी, वो भी दुर्गा भाभी ने ही उनको दिया था.

भगत सिंह को सजा देने वाले पर किया हमला

दुर्गा भाभी ने 9 अक्टूबर, 1930 को भगत सिंह व उनके साथियों को फांसी की सज़ा देने वाले गवर्नर हेली पर बम फेंक भी दिया. इस हमले में हैली व उसके कई सहयोगी घायल हो गए. इस घटना के बाद दुर्गा भाभी को मुंबई से गिरफ़्तार कर लिया गया और उन्हें 3 साल की सज़ा सुनाई गई. मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने ही गोली मारी थी, जिसके बाद उन्हें और उनके साथी यशपाल को गिरफ़्तार कर लिया गया था.

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साल 1935 में जब वो जेल से रिहा हुईं तो अंग्रेज़ों ने उनको परेशान करना शुरू कर दिया. इससे परेशान होकर वो गाज़ियाबाद आ गईं और 'प्यारे लाल कन्या विद्यालय' में अध्यापिका की नौकरी करने लगीं. इसके बाद साल 1940 में उन्होंने लखनऊ में 'मांटेसरी स्कूल' की स्थापना की और आजीवन उसमें पढ़ाती रही और गुमनाम हो गयी.

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साल 1956 में नेहरू ने उनको मदद का प्रस्ताव दिया तो उन्होंने इससे इंकार कर दिया. 14 अक्टूबर 1999 में वो इस दुनिया से गुमनाम ही विदा हो गईं. आज आज़ादी के 70 साल के बाद भी इस विरांगना को इतिहास के पन्नों में जगह नहीं मिली.