22 फरवरी को देर रात बेंगलुरू के इंदिरानगर में स्थित 'कराची बेकरी' के सामने कुछ लोग इकट्ठा हो गए और इस बेकरी का नाम बदलने की मांग करने लगे. बेकरीवालों ने लोगों को शांत करने के लिए आधा नाम ढक दिया और तिरंगा लगाया.

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ये लोग शायद इस बात से अनजान थे कि ये बेकरी एक सिन्धी ने शुरू की थी, वो भी 1953 में.

घटना के एक दिन बाद बेकरी वालों ने फ़ेसबुक पर एक 'सफ़ाईनामा' भी जारी किया. बेचारे करते भी क्या? 'सच्चे देशभक्तों' ने धमकियां दे-देकर परेशान जो कर दिया था.

'कराची बेकरी' की बुराइयों की झड़ी लगी हुई थी. कई भारतीय नाम बदलने की मांग कर रहे थे. इन सबके बीच Kanchan Gupta ने ट्विटर पर ही एक साधारण प्रश्न किया,

'पाकिस्तान में भारतीय नाम वाले कितनी बेकरी, कैफ़े और हलवाइयों की दुकान चलती है?'

इस सवाल पर पाकिस्तानियों ने ट्वीट्स की झड़ी लगा दी:

साथ ही एक बंदे ने ट्वीट कर ये भी बताया कि इंदिरानगर के 'कराचि बेकरी' ने अपने नाम से कवर हटा दिया है.

जो लोग कराचि बेकरी की बुराई कर रहे हैं उन्हें वहां जाकर कुछ खाना चाहिए. पेट ख़ुश होगा तो दिमाग़ भी शांत हो जाएगा.