जंग मैदान पर होती है लेकिन उसकी तैयारी का ख़ाका दुश्मन के दिमाग़ में होता है. कौन, कब, कहां और कैसे करेगा, अगर इस सवाल का जवाब मिल जाए तो फिर जंग के नतीजे पर बात करना ही बेमानी है. जासूसी की दुनिया इस सवाल के इर्द-गिर्द ही रची-बसी है. अपने देश का नाम हमेशा ऊंचा रखने के लिए कुछ लोग ज़िंदगीभर की ग़ुमनामी मंज़ूर कर लेते हैं. एली कोहेन भी ऐसे ही लोगों में से एक था, लेकिन सबसे अलग और कुछ ख़ास. एक ऐसा जासूस जिसने इज़रायल को 5 देशों के ख़िलाफ़ महज़ 6 दिन में जीत दिलवाई. एक ऐसा जासूस जो सीरिया का उप रक्षा मंत्री तक बनने वाला था, लेकिन फिर...  

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मिस्र में जन्मा बच्चा कैसे बना इज़रायल का सबसे बड़ा जासूस?  

साल 1924. मिस्र के एलेग्ज़ेंड्रिया में एक सीरियाई-यहूदी परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ. उसका नाम एलीआहू बेन शॉल कोहेन रखा गया. पिता यहूदी थे और मां सीरियाई. उसके पिता कभी सीरिया में रहा करते थे, लेकिन साल 1914 में मिस्त्र आ गए थे. फिर जब इज़ारायल बना तो दुनियाभर के यहूदियों ने इस नए बने मुल्क़ की तरफ़ रुख़ किया. एली के पिता भी पत्नी और तीन भाइयों के साथ इज़रायल आ गए. लेकिन एली मिस्त्र में रहे और अपनी इलेक्ट्रॉनिक्स की पढ़ाई पूरी करने लगे.   

एली को अंग्रेज़ी के साथ ही अरबी और फ़्रांसीसी भाषा की भी अच्छी जानकारी थी. यही वजह रही कि इज़राइली ख़ुफ़िया विभाग को उनमें कुछ ज़्यादा ही दिलचस्पी थी. एली इज़रायल आए भी. साल 1955 में वो जासूसी का छोटा सा कोर्स करने के लिए इज़रायल पहुंचे पर अगले साल मिस्र लौट आए. हालांकि, दो साल बाद वो वापस तब इज़रायल गए जब स्वेज़ संकट के बाद दूसरे लोगों के साथ एली को भी मिस्र से बेदख़ल कर दिया गया.  

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यहां उन्होंने एक इराक़ी-यहूदी लड़की नादिया मजाल्द से शादी कर ली और फिर ट्रांसलेटर और एकाउंटेंट के रूप में काम करने लगे, जब तक 1960 में उन्होंने ख़ुफ़िया विभाग ज्वॉइन नहीं कर लिया.  

एली कोहेन बना कामिल अमीन थाबेत  

साल 1960 से एली ने जासूसी की दुनिया में क़दम रख दिया. एक साल बाद ही उन्हें सीरिया में जासूसी करने के लिए ट्रेन करना शुरू कर दिया गया. एली को एक कारोबारी बनाकर अर्जेंटीना भेजा गया, जहां से उन्हें बाद में सीरिया पहुंचाया गया.  

दरअसल, अर्जेंटीना में एली सीरियाई मूल के कारोबारी कामिल अमीन थाबेत बनकर रहे. उन्होंने वहीं सीरियाई समुदाय के लोगों से संबंध बनाए और ख़ुद के सीरिया में वापस बसने की इच्छा भी ज़ाहिर की. 1962 में एली उर्फ़ कामिल को सीरिया की राजधानी दमिश्क में बसने का मौका मिल गया.   

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राजधानी जो कि सत्ता का केंद्र थी, अब वहां एली भी मौजूद थे. धीरे-धीरे एली कोहेन के संबंध सत्ता में पैठ रखने वाले लोगों से बनने लगे. पैसों का इस्तेमाल कर वो बड़े लोगों की नज़र में आना शुरू हो गए. जिसके बाद उन्होंने सेना में अधिकारियों से संबंध बढ़ाए. यहां तक कि उनकी दोस्ती जनरल के भतीजे से हो गई. उसी की मदद से बॉर्डर तक पहुंचे, साथ ही ऐसी जगहों तक उनकी पहुंच हो गई, जहां से सीरिया इज़रायल के ख़िलाफ़ साज़िश रचता था.  

यूकेलिप्टस के पेड़ों का चक़्क़र  

सीरिया में राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी बनीं कि एली की पहुंच सीरिया के सैन्य ठिकानों तक हो गई. इसके पीछे बड़ी वजह थी कि उस वक़्त सत्ता में जो लोग थे, वो अर्जेंटीना के ज़माने से एली के दोस्त थे. ऐसा कहा जाता है कि राष्ट्रपति अल-हफ़ीज़ ने तो उन्हें सीरिया का उप रक्षा मंत्री बनाने का भी सोच लिया था.   

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चार साल तक वो इज़रायल की मोसाद को हर जानकारी देते रहे. इस दौरान एली न सिर्फ़ ख़ुफ़िया सैन्य ब्रीफ़िंग में मौजूद रहे बल्क़ि गोलान हाइट्स में सीरियाई सैन्य ठिकानों का दौरा तक कर आए. गोलान हाइट्स में सीरिया और इज़रायल के बीच काफ़ी तनाव था. इस इलाके में यूकेलिप्टस के पेड़ लगाने का आइडिया एली ने ही सीरिया को दिया था. उन्होंने कहा था कि इन पेड़ों से सीरियाई सैनिक धूप से बचे रहेंगे. लेकिन 1967 की मिडल ईस्ट वॉर में इन पेड़ों की वजह से ही इज़रायल को सीरियाई सैनिकों की लोकेशन का पता चल गया. इस युद्ध में इज़रायल ने मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, ईराक और लेबनान जैसे देशों को बुरी तरह हरा दिया.   

जब पकड़े गए एली कोहेन  

एली कोहेन लगातार रेडियो ट्रांसमिशन का इस्तेमाल करते थे. इज़रायल में उनके हैंडलर्स ने उन्हें हिदायत दी थी कि एक दिन में दो बार से ज़्यादा इसका इस्तेमाल न करें. लेकिन एली इसे लेकर काफ़ी लापरवाह हो गए. यही लापरवाही बाद में उनकी मौत की वजह भी बनी.  

दरअसल, सीरिया को लगातार इज़रायल से मिल रही मात के चलते एली पर पहले से ही कुछ लोगों को शक होने लगा था. सीरिया के जनरल चीफ़ ऑफ स्टाफ़ को एली के रेडियो ट्रांसमिशन से बात करने की भनक लग गई थी. काउंटर-इंटेलीजेंस अफ़सरों ने एली पर नज़र रखनी शुरू कर दी थी. फिर एक दिन एली को रंगे हाथों पकड़ लिया गया.   

एली पर मुकदमा चला और 1966 में दमिश्क के एक चौराहे पर उन्हें फांसी पर लटका दिया गया. उनके गले में एक बैनर डाला गया था, जिसपर लिखा था 'सीरिया में मौजूद अरबी लोगों की ओर से.’  

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इज़रायल के हाथ लगी सिर्फ़ घड़ी  

इजरायल ने एली कोहेन की फ़ासी की सज़ा माफ़ कराने के लिए काफ़ी कोशिशें कीं, लेकिन होनी को टाला नहीं जा सका. बाद में इज़रायल ने एली का शव वापस लाने की कई कोशिशें की, लेकिन सीरिया ने शव नहीं लौटाया. हालांकि, एली की मौत के 53 साल बाद 2018 में ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद के एक ख़ास ऑपरेशन में उनकी घड़ी को बरामद किया गया, जो उन्होंने सीरिया में पहनी थी.   

एली कोहेन जासूसी की दुनिया का कितना बड़ा नाम है, उसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि नेटफ़्लिक्स पर साल 2019 में ‘द स्पाई’ नाम से छह एपिसोड की सीरीज़ बन चुकी है. जिसमें एली कोहेन की जासूसी की दुनिया का पूरा सफ़र दिखाया गया है.