पांच महीने पहले ज़िंदगी कुछ और थी. बेफ़िक्री से चलना, आज़ादी से कहीं भी जाना और कुछ भी खाना. मगर ये सिलसिला इन पांच महीनों में थम-सा गया है. अब चलती हूं तो पीछे से आवाज़ आती है… संभल के. कुछ खाती हूं तो सब यही कहते हैं वो ही खाओ जो तुम दोनों के लिए बेहतर हो और कहीं जाने पर अब समय का पहरा हो गया है. मतलब शाम को नहीं जाना, तिराहे पर नहीं जाना, कहीं जाना है तो माचिस या चाकू लेकर जाना. हालांकि ये चीज़ें शुरुआत में बहुत परेशान करती थीं, मैं तो हमेशा से बाहर निकलती हूं अब क्यों ये सब सुनूं. कुछ नहीं होता, जो होगा देख लेंगे. 

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शायद मेरी तरह और भी कई लड़कियां होंगी जो प्रेगनेंसी के शुरुआती दौर में इन बातों से इरीटेट होती होंगी. मैं मानती हूं ये बच्चे और मां के भले के लिए होता है, लेकिन जब अचानक से पहरे बैठने लग जाएं तो तकलीफ़ होती है, जो मुझे भी हुई. मन में ख़्याल भी आया कि ग़लत डिसीजन तो नहीं ले लिया. 

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इन्हीं सब उधेड़बुन में और क्या करूं, क्या नहीं में समय हवा की तरह निकल गया और पहले महीने से जो समस्याएं शुरू हुईं, वो धीरे-धीरे हर एक सोनोग्राफ़ी के बाद कम सी लगने लगीं. जब मैं अपने बच्चे को अपने शरीर के अंदर बनते देखती और उसकी धड़कन को सुनती, तो वो एहसास मेरे लिए बयां कर पाना मुमकिन नहीं है. शायद किसी भी मां के लिए नहीं होगा. इस एहसास को बस महसूस कर सकती हूं जो इस दौरान कर रही हूं.

हर महीने मुझमें कुछ न कुछ बदलाव हो रहे हैं. मगर पांचवें महीने में जो हुआ उसने तो मेरी आंखों में आंसू ला दिए. हालांकि, मैंने सुना था कि बच्चा किक मारता है और हलचल करता है, लेकिन मैंने सोचा नहीं था कि ऐसा कैसे होता होगा. मैं बैठी हुई थी अचानक से मेरे पेट में एक धक्का से लगा. मुझे कुछ पल के लिए तो नहीं समझ आया. फिर मैंने घर में बताया तो पता चला कि ये मेरे बच्चे के होने का एहसास है. वो अब बढ़ रहा है. 

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जैसे-जैसे उसकी किक्स बढ़ रही हैं, मैं उसे समझने लगी हूं. ज़्यादा किक तब होती हैं, जब वो भूखा होता है. कभी बस मुझे परेशान करने के लिए किक का सिलसिला चलता है. सांसें तब थम जाती हैं जब कोई हलचल नहीं होती है. अब तो वो मेरी बातों को भी समझने लगा है. भूख लगने पर अगर मैं उसे रुकने को बोलूं तो वो रुक जाता है. 

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मेरी प्रेगनेंसी का छठा महीना चल रहा है और इन 6 महीनों में मैंने ख़ुद के अंदर जो बदलाव देखे, वो तो कभी सोचे भी नहीं थे. घर में सबसे छोटी हूं तो थोड़ी ज़िद्दी और बिगड़ी हुई हूं. इसलिए कभी सोचा नहीं था कि एक जान को अपने शरीर में रख सकती हूं, उसके बारे में सोच सकती हूं. आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो मुझे लगता है ये मैं नहीं कोई और है, ये वो मां है जो शायद परफ़ेक्ट नहीं होगी, लेकिन अपने बच्चे के लिए एक ‘मां’ ज़रूर होगी.

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6 महीने के इस सफ़र ने 

ज़िंदगी को इस मोड़ पर ला दिया 
मुझे बेफ़िक्र लड़की से, मां बना दिया

मेरी तरह आपकी प्रेगनेंसी के दौरान की कोई याद या कोई एहसास हो तो हमसे शेयर ज़रूर करें.