ज़िंदगी महज़ किसी एक शख़्स की सांसों के बीच नहीं भटकती है. ये तो दिल से जुड़े रिश्तों के दरिमयां धड़कती मिलती है. रिश्ते, जो हमने चुने, बनाए और जिए होते हैं. किसी एक शख़्स का गुज़र जाना न जाने कितनी ज़िंदगियों को ख़त्म कर जाता है. वो ज़िंदिगियां, जिनका जन्म एक उम्र के दौरान चाहे-अनचाहे हो ही जाता है. फिर बस एक पल में बरसों की हक़ीक़त कभी न भूल पाने वाली यादों का शिकार हो जाती है.

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सचन दीप सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है. कोरोना महामारी के कारण सचिन के ससुर की मौत हो गई, वो 64 साल के थे. वो दुखी हैं, लेकिन साथ में बेचैन भी. बेचैनी इस बात की है कि जो कुछ उन पर बीता है, कहीं वो किसी दूसरे के साथ न हो जाए. उन्होंने एक फ़ेसबुक पोस्ट के ज़रिए अपनी आपबीती बताई है ताकि लोग और सचेत हों और साथ ही इस देश के सिस्टम को ख़ुद को सुधारने का एक मौका मिले.

11-12 मई को मेरे ससुर को बुख़ार आया, क़रीब 98-99 के आसपास था, जो कि नॉर्मल था. 13-14 मई को हमें तब थोड़ी चिंता होना शुरू हुई जब हल्की गले में ख़राश के साथ बुख़ार 100 के पार चला गया. 15-16 मई को गले में ख़राश के साथ ही बुख़ार 101 के पार हो गया. 17-18 मई को हमने टेस्ट करवाने का तय किया.

हालांकि, किसी ने हमें बताया था कि बुखार अगर 5 दिन तक 100 पर बना रहे, तब ही हमें टेस्ट कराना चाहिए. हम संकोच कर रहे थे, लेकिन ससुर जी के ज़ोर देने पर हमने 18 मई तक इंतज़ार किया. इस दौरान बुख़ार कम नहीं हुआ. वो दिल्ली में थे और हम चंडीगढ़ में, ऐसे में हमने कई लैब्स (इसमें LaL/SRL जैसे बड़े नाम शामिल हैं) को घर पर आकर (हम नहीं चाहते थे कि कोरोना पॉज़िटिव होने की स्थिति में दूसरों को इस बारे में पता चले) टेस्ट करने के लिए कहा. कोई भी लैब घर आने को तैयार नहीं हुई. यहीं से ग़लतियों की शुरुआत होती है.

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पहली ग़लती-

फिर बाद में हमें आरोग्य सेतु एप से एक लैब ‘सिटी एक्सरे एंड स्कैन’ का नंबर मिला, जो घर आकर टेस्ट करने के लिए तैयार हुए.

दूसरी गलती-

18-19 मई को उनका टेस्ट हुआ और रिपोर्ट निगेटिव आई, ये हमारी लिए बड़ी राहत थी. लेकिन बुख़ार फिर भी कम नहीं हुआ था. यहां तक कि क्रोसिन खाने के बाद भी बुख़ार कम नहीं हुआ.

तीसरी ग़लती-

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20 मई को हमने एक डॉक्टर से राय ली तो उन्होंने कुछ और टेस्ट कराने के लिए कहा ताकि बुख़ार का कारण पता चल सके. रात में ससुर जी को सांस लेने में परेशानी हो रही थी और भारी-भारी सा लग रहा था, लेकिन उन्होंने इस बारे में किसी को नहीं बताया.

चौथी ग़लती-

21 मई को बुख़ार और सांस लेने में दिक्कत बनी रही. उस समय उन्होंने हमें बताया और उन्हें हॉस्पिटल में शिफ़्ट किया गया. हॉस्पिटल उन्हें लेने में संकोच कर रहे थे, क्योंकि उनमें कोरोना के लक्षण नज़र आ रहे थे. चुंकि हमारे पास निगेटिव रिपोर्ट थी, तो उन्हें एडमिट किया गया और टेस्ट शुरू हुए (दोबारा कोविड टेस्ट भी हुआ). उनकी शुगर काफ़ी बढ़ गई थी.

22 मई को उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया. इस बार उनकी कोविड रिपोर्ट पॉज़िटिव आई थी.

पांचवी ग़लती-

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22 मई को रिपोर्ट पॉज़िटिव आने के बाद हॉस्पिटल ने हमें उन्हें किसी दूसरे कोविड हॉस्पिटल में एडमिट करने के लिए कहा और इसके लिए उन्होंने हमें ही व्यवस्था करने को कहा. चुनौती यहीं ख़त्म नहीं हुई, हमें अभी एक एंबुलेंस के साथ वेंटिलेटर का इंतज़ाम करना था, जो वहां नहीं था. हमने क़रीब सभी हॉस्पटिलस में कोशिश की, जिसमें सरकारी अस्पताल LNJP भी शामिल है, और हमें बस एक ही जवाब मिला कि उनके पास वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं है.

22 मई को क़रीब 9:45 पर हम उन्हें जब ICU में देखने गए तो पता चला कि वो अब नहीं रहे. ये हम सबके लिए बड़ा सदमा था. 23 मई को हम उन्हें आख़िरी बार देख तक नहीं पाए. ऐसे वक़्त में मेरी सास समेत हम सब क्वारंटीन थे.

24 मई को केंद्र सरकार बता रही थी कि उसने कितने अच्छे तरीके से इस महामारी को मैनेज किया है. अरविंद केजरीवाल ने अपने प्रेस कॉन्फ़्रेस में कहा कि दिल्ली कोरोन वायरस से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है और उसके पास 250 वेंटिलेटर हैं, साथ ही कोई भी हॉस्पटिल कोविड मरीज़ को इन्कार नहीं कर सकता है. मुझे 250 वेंटेलेटर्स का तो नहीं पता लेकिन उस रात हमें एक भी नहीं मिल पाया था.

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कहते हैं कि मुसीबत इंसान को बहुत कुछ सिखाती है. ये हमें सुधार करने का एक मौक़ा देती है. यही वजह है कि सचन ने आगे कहा कि वो यहां सिर्फ़ आलोचना नहीं करेंगे, बल्क़ि संभावित समाधान भी देंगे. वो समाधान जो एक सबक होंगे ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी आपदा से निपटने में मदद मिल सके.

पहला सबक़-

-कोरोना टेस्ट की रिपोर्ट निगेटिव आई थी. रिपोर्ट ग़लत थी. अगर सही होती तो हम तीन दिन पहले ही उन्हें शिफ़्ट कर चुके होते. (समाधान- ऐसी लैब्स को हटाएं जहां से गलत निगेटिव रिपोर्ट आ रही हैं, और इसके कारणों का पता लगाने की कोशिश कीजिए).

दूसरा सबक़-

-कोई भी कोविड इंफ़्रास्ट्रक्टर से परिचित नहीं है और कोई केंद्रीय कोर्टल नही है जहां से कोई भी (असपताल या रोगी) जांचकर सकता है कि बेड या वेंटिलेटर उपलब्ध है कि नहीं. (समाधान- ये बड़ा ही आसान है कि कोई एक ऐसा सॉफ़्टवेयर बनाया जाए, जिसमें सभी हॉस्पिटल जुड़े हों. लेकिन ये उस देश में नहीं है, जिनके पास TCS, Noida और Infosys जैसे आईटी दिग्गज हैं).

तीसरा सबक़-

-ये कोई नहीं जानता है कि उसे टेस्ट कब करवाना है और हॉस्पिटल कब जाना है, कोविड अस्पताला तब तक मरीज़ को नहीं लेते जब तक उसकी रिपोर्ट पॉज़िटिव न हो (बहुत कम लैब कोविड टेस्ट कर रही हैं). लोगों को नहीं पता कि कौन सी लैब हैं, जो घर पर आकर सैंपल एकत्र कर रही हैं. इस पर ही समस्या तब और बढ़ जाती है, जब नॉन-कोविड हॉस्पटिल ऐसे मरीज़ों को लेने से मना कर देते हैं, जिनमें कोरोन के लक्षण नज़र आ रहे हों. (समाधान- ऐसे स्थिति में लोगों को क्या करना चाहिए इसके बारे में जागरूक नहीं किया गया है, आखिर क्यों पब्लिक बुलेटिन और बड़े पैमाने पर एड कैंपन नहीं चलाई गई).

सचन ने कहा कि कुल मिलाकर यहां सब गड़बड़ है. उन्होंने ये सिर्फ़ इसिलए लिखा है ताकि किसी और के साथ कभी ऐसा न हो. उनका मक़सद सरकार की आलोचना करना नहीं है. वो बस ये चाहते कि सरकार इसे पढ़े और जो ग़लतियों को सुधारे. जो बताया जा रहा है, धरातल पर सच्चाई उससे बिल्कुल ही अलग है. अंत में, जो लोग महामारी को लेकर ये कह रहे हैं कि ‘कुछ नहीं है, कुछ नहीं होता है वगैरह’ वो लोग मूर्ख हैं और ख़तरनाक भी.