आजकल बच्चे 2 से 3 साल की ही उम्र में स्कूल भेज दिए जा रहे हैं. जब वे स्कूल का मतलब भी नहीं समझ रहे होते, तभी उनके कन्धों पर बैग का वजन लाद दिया जाता है. वे अपनी मासूमियत और बचपन को स्कूल के टेस्ट्स, एग्ज़ाम्स में भूलते चले जाते हैं और फिर अगले 14-15 सालों तक यही चलता है. एक छोटा-सा बच्चा बड़ा हो जाता और ज़िन्दगी के संघर्ष में जूझते हुए ये भूल जाता है कि उसने तो बचपन को जिया ही नहीं. ऐसे में हमारे देश के एजुकेशन सिस्टम को फिनलैंड के सिस्टम से बहुत कुछ सीखने की ज़रुरत है. वहां के बच्चे बचपन को भरपूर जीते हैं. वे अपना स्कूल का समय पेड़ों पर चढ़ते, दोस्तों संग मस्ती करते और मैदानों में खेलते हुए बिताते हैं. आइए जानते हैं कि वहां के एजुकेशन सिस्टम से हम क्या सीख सकते हैं.

1. यूरोपीय देश फिनलैंड के बच्चे सात साल की उम्र तक स्कूल नहीं जाते हैं.

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2. शुरू के 6 सालों तक बच्चों की काबिलियत या क्षमता को निर्धारित करने के लिए कोई भी ग्रेडिंग सिस्टम नहीं है.

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3. उन्होंने स्कूली शिक्षा के दौरान सिर्फ एक ही एग्ज़ाम लेने का नियम बना रखा है.

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4. और वो तब होता है, जब स्टूडेंट्स 16 साल के जाते हैं.

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5. प्राथमिक विद्यालय के बच्चे हफ्ते में सिर्फ़ 20 घंटे की क्लास अटेंड करते हैं. यानि हर दिन चार घंटे.

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6. हर क्लास के बाद छात्रों को 15 मिनट का ब्रेक मिलता है.

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7. स्टूडेंट्स को 75 मिनट का ऐसा भी ब्रेक दिया जाता है, जिसमें वे खाना खाने के अलावा कुछ भी कर सकते हैं, जो उन्हें करना पसंद हो.

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8. फिनलैंड की स्कूल प्रणाली 100 प्रतिशत राज्य वित्त पोषित है.

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9. यहां तक कि टीचर्स के लिए भी ये काफी अच्छा होता है कि उन्हें हर दिन सिर्फ़ चार घंटे ही टीचिंग करनी होती है.

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10. इन शिक्षकों को अच्छी-खासी सैलरी दी जाती है और वे डॉक्टर्स या इंजीनियर्स से कमतर नहीं समझे जाते हैं.

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तो इंडिया क्या ऐसे ज़बरदस्त एजुकेशन सिस्टम को अपनाने के लिए तैयार है?