'हम को क़ाबू में रखने के लिए, पुरुष हमें मुंह ढकने के लिए कहते हैं. एक आदमी को एक दिन के लिए अपना चेहरा ढंकने के लिए कहें, वो तो ऐसा नहीं कर पाएगा.'

ये शब्द हैं घूंघट प्रथा से लड़ रहीं हरियाणा की महिलाओं के.

रीति रिवाज़ और परम्पराओं के नाम पर सदियों से महिलाओं के व्यक्तित्व को कुचला जा रहा है. ऐसी तमाम प्रथाओं में से एक 'घूंघट' प्रथा का भी इसमें बहुत बड़ा हिस्सा रहा है.

शर्म, सम्मान, परंपरा, संस्कृति और पुरूषों के लिए सम्मान के प्रतीक के नाम पर महिलाओं को चौबीसों घंटे अपने चेहरे को ढक कर रखने के लिए कहा जाता है.

मगर हरियाणा की महिलाओं ने इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ लड़ने की ठान ली है. हाल ही में BBC द्वारा बनाए गए एक वीडियो में, हरियाणा की इन महिलाओं ने महिलाएं पुरूषों द्वारा औरतों पर हो रहे उत्पीड़न को ख़त्म करने की ये सराहनीय मुहिम शुरू की है.

घूंघट प्रथा को ख़त्म करने का अभियान मंजू यादव ने शुरू किया है. मंजू एक स्कूल में टीचर हैं. उनका मानना है कि घूंघट पहनने से वो पुरुषों के क़ाबू में रहती हैं.

मंजू के इस अभियान में उनका साथ देने के लिए 47 गांवों के लोगों का समर्थन प्राप्त है.

ज़िला कमिश्नर चंदर शेखर ने भी ग्रामीणों को इस अभियान में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया है.

हरियाणा के धौज गांव की नेता, नज़मा ख़ान कहती हैं कि वो पहली महिला नहीं हैं जिन्होंने घूंघट प्रथा को ख़त्म करने के लिए क़दम उठाया है. नज़मा इस बात पर यक़ीन करती हैं कि देश तभी तरक्की करेगा जब गांव तरक्की करेगा.

महिलाओं के इस अभियान में कुछ पुरुष भी ख़ुल कर समर्थन कर रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ़ बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो इस अभियान का भरपूर विरोध भी कर रहे हैं. मंजू यादव के गांव से ही एक इंसान का मानना है कि पुरूषों के लिए सम्मान जताने के लिए बेहद ज़रूरी है कि सभी औरतें घूंघट में रहें क्योंकि घूंघट नहीं तो संस्कृति नहीं.

मगर ऐसी दकियानूसी सोच को तोड़ते हुए महिलाओं ने अपना चेहरा न ढकने की क़सम खाई है.

ये महिलाएं ख़ुल कर बिना डरे या दवाब में आए न केवल ख़ुद का बल्कि अन्य महिलाओं के जीवन में भी बदलाव ला रही हैं.