जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटा ली गई है. भारत सरकार के इस एतिहासिक फ़ैसले के बाद अब ये एक केंद्र शासित राज्य बन गया है. आपने जम्मू-कश्मीर के 1947 से लेकर अब तक के इतिहास के बारे में पढ़ा या सुना होगा. पर उससे पहले का इतिहास बहुत कम लोग ही जानते हैं. आइए आज आपको जम्मू-कश्मीर के उस इतिहास के बारे में भी बता देते हैं.

राजा हरि सिंह से 250 साल पहले जम्मू कश्मीर एक स्वतंत्र मुस्लिम राजशाही था. 1326 और 1585 के बीच जब मुग़ल बादशाहों ने इस पर कई बार हमला किया. तब कश्मीर की संस्कृति और समाज में बहुत से बदलाव देखने को मिले थे. 19वीं सदी में कश्मीर सिख साम्राज्य का हिस्सा बन गया और अंतत: जम्मू के डोगरा राजाओं के अधीन हो गया.

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अब सवाल उठता है कि कश्मीर सल्तनत के राजा कौन थे? जवाब है मीर शाह.

वो कश्मीर के पहले मुस्लिम शासक थे. इतिहासकार जी. एस. सरदेसाई के अनुसार, तुर्की से ताल्लुक रखने वाले मीर शाहर राजा रणचंद्रण के दरबार में बाहरी मामलों के प्रमुख थे. उनपर काशगर के राजा आनंददेव ने हमला कर विजय पा ली. उसके बाद मीर शाह विद्रोही बन गए.

उनके नेतृत्व कश्मीर के लोगों ने आंददेव पर हमला किया और उनकी मृत्यू हो गई. इस तरह मीर शाह 1339 में अपना राजवंश स्थापित किया. उनके बारे में कहा जाता है कि वो एक उदार शासक थे. उन्होंने अपने शासन में कई करों को रद्द कर दिया था. 1349 में मीर शाह ने अपने दोनों बेटों जमशेद और शेर अली के हाथों में राज्य की बाग डोर सौंप दी.

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जमशेद और शहाबुद्दीन

जमशेद और शेर अली के बीच राजगद्दी के लिए झगड़ा हो गया, जिसमें जमशेद की जीत हुई. उन्हें अलाऊद्दीन की उपाधी दी गई. वर्ष 1363 में उनकी मृत्यू के बाद शेर अली को राजपाठ मिला. उन्हें शहाबुद्दीन की उपाधी दी गई. शहाबुद्दीन ने अपने राज्य के विस्तार के लिए दक्षिण के कई राज्यों पर हमला किया. वो सिंध के सम्मा राजवंश और कांगड़ा के राजा पर विजय पाने में कामयाब हुए.

1386 में उनकी मौत के बादे कुतुबद्दीन को राजा बनाया गया. इस तरह 1396 में सिंकदर के हाथ में कश्मीर सल्तनत की बागडोर आ गई.

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सिकंदर

सिकंदर के राज में बहुत से हिंदू मंदिरों और देवी-देवताओं की मूर्तियां को नष्ट किया गया. कहा तो ये भी जाता है कि उनके शासन में बहुत हिंदुयों का जबरन धर्म परिवर्तन करवा दिया गया. सरदेशाई के मुताबिक, सिकंदर एक ख़ूंखार शासक था. उसने 1398 में कश्मीर पर आक्रमण करने आए तैमूर का अधिपत्य स्वीकार कर उसे बचा लिया. 1416 में उनकी मृत्यू के बाद राजपाठ उनके बेटे अमीर ख़ान को मिल गया.

अमीर ख़ान के बाद 1422 में उनके छोटे भाई शदी ख़ान को राजा बना दिया गया. उन्हें जैन-उल-अबिद्दीन की उपाधी दी गई

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जैन-उल-अबिद्दीन

इन्होंने सिकंदर की कई रूढ़ीवादी नीतियों को बदल दिया और बौद्ध और हिंदू धर्म के लोगों को अपने धर्म को स्वतंत्रता से पालन करने की अनुमति दे दी. उन्होंने कई मंदिरों का पुनर्निर्माण भी करवाया. उन्होंने राज्य में कई झीलें और नहरें भी बनवाई. जैन-उल-अबिद्दीन को कविता और साहित्य के भी संरक्षक थे.

मुहम्मद और फ़तेह ख़ान

1472 में जैन-उल-अबिद्दीन की मृत्यू के बाद उनके उत्तराधिकारी हाजी ख़ान उर्फ़ हैदर ने एक साल तक शासन किया. हाजी ख़ान ने अपने बेटे हसन को राजा बना दिया, जिसने 13 साल तक कश्मीर पर राज किया. फिर उसने अपने नाबालिग बेटे मुहम्मद को राज पाठ सौंपा, जिसे साजिश रच फतेह ख़ान ने तख्तापलट कर दिया.

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फतेह ख़ान जैन-उल-अबिद्दीन का पोता था. उसने दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी से गठबंधन कर लिया. लेकिन 1533 में दक्षिण में एक युद्ध के दौरान उसकी मृत्यु हो गई. तब फिर से कश्मीर की सल्तनत मुहम्मद के हाथों में आ गई.

अगले 50 वर्षों तक कश्मीर पर अनिश्चितता का माहौल रहा और ये चाक वंश के अधीन हो गया. यहां से अंतत: ये मुग़ल सम्राट अकबर के अधीन आ गया.