'हुतु-तुत्सी खूनी संघर्ष' के बारे में अगर नहीं जानते हैं तो बता दें कि ये इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार में से एक था. ये इतिहास का एक ऐसा ख़ूनी संघर्ष था जिसमें सिर्फ़ 100 दिन में 8 लाख लोगों का क़त्लेआम कर दिया गया.

साल 1972 बुरुंडी में तुत्सी सेना ने करीब 80 हज़ार से अधिक हुतु समुदाय के लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. इसके ठीक 22 साल बाद सन 1994 में हुतुवों ने बदले की भावना से महज 100 दिनों में ही 8 लाख से अधिक तुत्सी समुदाय के लोगों का क़त्लेआम कर दिया था.

क्या थी इस हिंसा की वजह?

6 अप्रैल, 1994 को अफ़्रीकी देश रवांडा के राष्ट्रपति जुवेनाल हाबयारीमाना व पड़ोसी देश बुरंडी के राष्ट्रपति सिपरियन न्तारियामी को लेकर जा रहे एक विमान को आतंकियों ने मार गिराया. हमले में मारे गए दोनों देशों के राष्ट्रपति हुतु समुदाय से थे.

कौन था हमले का ज़िम्मेदार?

दरअसल, इस घटना के लिए हुतु चरमपंथियों ने रवांडा पैट्रिओटिक फ़्रंट (आरपीएफ़) को जिम्मेदार ठहराया, जो निर्वासन में रह रहे विद्रोही तुत्सी लोगों का गुट हुआ करता था. जबकि आरपीएफ़ का कहना था कि विमान को हुतु समुदाय के लोगों ने ही मार गिराया था ताकि हिंसा फैलाई जा सके. बस यहीं से तुत्सियों के क़त्लेआम का ख़ूनी खेल शुरू हुआ.

हुतुवों का ख़ूनी तांडव

अपने समुदाय के दो राष्ट्रपतियों को खोने के गम में परेशान चरमपंथी हुतुवों ने सौ दिन के भीतर रवांडा में 8 लाख तुत्सी और उदारवादी हुतुओं को मौत के घाट उतार दिया. इस दौरान चरमपंथी हुतुवों का नेतृत्व रवांडा की सेना और इंटरनाहामवे नाम की एक मिलिशिया कर रही थी.

हिंसा फैलाने के लिए रेडियो का इस्तेमाल

इस दौरान चरमपंथी हुतुवों ने तुत्सियों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने के लिए रेडियो का इस्तेमाल किया. तुत्सियों के भागने के सारे रास्ते बंद कर दिए गए. रेडियो के ज़रिये हुतुवों को सूचना दी गई कि तुत्सियों की पहचान करो और काट डालो. इसके बाद हुतुवों ने घर-घर जाकर पुरुष, महिला, बच्चे और बुज़ुर्गों किसी को नहीं बख़्शा.

तुत्सी पत्नियों को भी मार डाला

दरअसल, हुतु चरमपंथियों ने तुत्सियों को मारने के लिए स्थानीय लोगों को लिस्ट दी हुई थी कि किसे मारना है. इस दौरान हिंसा का आलम ये था कि हुतु पतियों ने अपनी तुत्सी पत्नियों को भी जान से मार डाला. उन्हें डर था कि ऐसा नहीं करेंगे तो चरमपंथी उनकी भी जान ले लेंगे.

हर दिन 10 हज़ार मौतें

नरसंहार के दौरान हर दिन औसतन दस हज़ार लोग मारे जाते थे. तुत्सियों की 70 फ़ीसदी आबादी को कत्ल कर दिया गया. लेकिन इस दौरान हुतुओं की 10 प्रतिशत आबादी भी चरमपंथियों का शिकार बनी.

एड्स मरीजों से कराया बलात्कार

इस दौरान हुतु चरमपंथियों ने अस्पतालों से एड्स के मरीजों को छोड़ दिया, ताकि वो तुत्सी महिलाओं का बलात्कार कर उन्हें एड्स की बीमारी दे सकें. इसी का नतीजा था कि जो लोग बच गए, वो ज़िंदगी भर एड्स से जूझते रहे. इस हिंसा में लगभग ढाई लाख महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, जिनसे बाद में हज़ारों अनचाहे बच्चे पैदा हुए.

युंगाडा की मदद से तुत्सी सत्ता में आये

जब 90 प्रतिशत तुत्सी समुदाय के लोग मारे गए तो तुत्सियों के लिए लड़ने वाली आरपीएफ़ को युंगाडा का समर्थन मिला. युंगाडा के सहयोग आरपीएफ़ रवांडा के ज़्यादातर हिस्सों पर कब्जा कर चुकी थी. जुलाई 1994 में हिंसा पर विराम लगने के साथ ही सत्ता एक बार फिर से तुत्सियों के हाथ में आई.

हुतु भागने लगे पड़ोसी मुल्क़

अब हुतुओं को बदले की कार्रवाई का डर था, इसलिए वो पड़ोसी डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो, तंजानिया और बुरुंडी भाग गए. लेकिन हुतुओं का डर सही निकला. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आरपीएफ़ के सत्ता में आने के साथ ही हज़ारों हुतुवों का कत्लेआम कर दिया गया था. हालांकि, आरपीएफ़ हमेशा इस तरह के आरोपों से इनकार करती है.

क्या तुत्सियों को इंसाफ़ मिल पाया?

तुत्सियों को इंसाफ़ दिलाने के लिए 'संयुक्त राष्ट्' ने इस नरसंहार के ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए नवंबर 1994 में तंजानिया में 'अंतरराष्ट्रीय रवांडा आपराधिक ट्राइब्यूनल' का गठन किया. लंबी क़ानूनी प्रक्रिया के बाद 90 हुतुओं के ख़िलाफ़ आरोप तय किए गए. रवांडा की पूर्व सरकार के दर्जनों अधिकारियों को दोषी करार दिया गया.