मैं दुकान में शॉपिंग के लिए जाती हूं. अंदर एक बेहद ही ख़ूबसूरत सा और ट्रेंडी पैंट देखती हूं, जिसे मैं बिना सोचे-समझे ख़रीद लेती हूं.

कई दिनों बाद जब बाहर दोस्तों के साथ घूमने के लिए उस पैंट को निकालती और पहनती हूं तब मुझे एहसास होता है कि इसमें मैं कितना असहज महसूस कर रही हूं. ख़ैर, क्योंकि पैंट ट्रेंड में था तो मैं उसे जैसे-तैसे पहन कर चली गई. वापिस आती हूं, उसे उतारती हूं और कभी दोबारा न पहनने की कसम खाती हूं.

और ये एक बार का नहीं है, ऐसा मेरे साथ हमेशा होता है कि मैं फ़ैशन और ट्रेंड की आड़ में आ कर हमेशा कपड़े ख़रीद लेती हूं और एक बार पहन कर ही वो अलमारी में हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं.

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कई बार ऐसा भी होता है कि मेरे छोटे कद की वज़ह से कुछ कपड़ों का मेरे शरीर के अनुसार साइज़ ही नहीं होता है. क्योंकि वो बने ही लम्बी लड़कियों के लिए होते हैं. या फिर फ़ैशन ट्रेंड के अनुसार वो छोटे कद की लड़कियों पर अच्छा ही नहीं लगता है.

इस फ़ैशन के चक्कर में मैंने न जाने कितने पापड़ बेले हैं. ड्रेस मुझ पर सही तरीक़े से फ़िट हो सके इसके लिए मैंने ओवरईटिंग तक की है.

मगर धीरे-धीरे ही सही मुझे समझ आने लगा कि ये फ़ैशन मुझसे नहीं हो पाएगा. शायद इस फ़ैशन जगत की गंभीरता को भी समझने लगी कि किस तरह ये हमारी इनसिक्योरिटीज़ से खेलता है. रैंप या मैग्ज़ीन पर आने वाली मॉडल्स को कैसे हम आदर्श मान कर उन्हीं की तरह बनना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें हम परफ़ेक्ट होने का उदहारण मानते हैं.

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मगर वास्तव में परफ़ेक्ट दिखने जैसा कुछ नहीं होता है. परफ़ेक्ट वही है, जब आप अपने पसंद के कपड़ो में सहज और ख़ूबसूरत मेहसूस करने लगें. जब आपकी कपड़ों से जंग ख़त्म होने लगे.

अब मैं फ़ैशन के पीछे नहीं भागती बल्कि कम्फ़र्ट के पीछे पड़ी रहती हूं. वो पहनती हूं जो मेरा मन करे भले ही कपड़ा छोटे कद वालों के लिए हो या लम्बे कद वालों के लिए. सानू, कोई फ़र्क़ नहीं पेंदा!