हम इंसान हमेशा प्यार को पाना चाहते हैं, उसे महसूस करना चाहते हैं. मगर जब वो प्यार हमें मिलता है तब हमें अधिकतर यही लगता है कि हम इसके हक़दार नहीं हैं. या कोई हमसे बिना शिकायत के इतना प्यार कर रहा है तो मतलब कुछ गड़बड़ है. 

मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है. मेरे पहले रिश्ते को ख़त्म हुए काफ़ी समय हो गया है. प्यार में पड़ना या किसी रिश्ते में बंधना मेरे प्लान का हिस्सा बिलकुल नहीं था. 

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रिश्ता ख़त्म होने के बाद मैंने ख़ुद को बहुत संभाला. दोबारा से ख़ुद से प्यार करना सीखा. धीरे-धीरे जीवन की गाड़ी पटरी पर आने लगी. मैंने ख़ुद में अपनी ख़ुशी ढूंढ ली थी. जीवन से बेहद ख़ुश थी या ख़ुश से भी ज़्यादा. मुझे अपने से जुड़ी हर चीज़ प्यारी लगने लगी थी. दोबारा से प्यार में पड़ना रिश्ते में बंधना मेरे प्लान का हिस्सा ही नहीं था.       

मुझे डर भी था कि यदि मैं किसी रिश्ते में फिर से इन्वेस्ट करती हूं तो मेरी ये सारी ख़ुशी ख़त्म हो जाएगी. इतने सालों में अपनी ज़िंदगी की जिन चीज़ों से मैंने दोबारा प्यार करना सीखा वो सब कम हो जाएगा. हां, कभी-कभी अकेला महसूस ज़रुर होता था लेकिन मैंने इसे भी अपनाया.   

मगर वो क्या है जीवन जैसा हम प्लान करते हैं वैसा कभी नहीं जाता. हम कुछ और सोच रहे होते हैं और लाइफ़ अपनी एक अलग कहानी के साथ आपके सामने आ जाती है. जब मुझे अपने जीवन में प्यार नहीं चाहिए था या कोई रिश्ता नहीं बनाना था तब मैं एक ऐसे इंसान से मिली जिसने मेरे मन में कई सवाल पैदा कर दिए. 

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मैं ख़ुद से सवाल करने लगी कि क्या वाक़ई में मुझे सिंगल रहना चाहिए. कोई साथ में सुख-दुःख बांटने वाला हो तो जीवन और आसान हो जाएगा. इन सब सवालों का जवाब ये मिला कि मुझे पता ही नहीं चला कि कब मैं उससे प्यार करने लगी. 

मुझे ये तो पता था कि ये रिश्ता आसान नहीं होने वाला है, मुझे कई चैलेंजेज़ का सामना करना पड़ेगा क्योंकि मैं काफ़ी समय से अकेले रह रही थी. मगर जब भी उसकी तरफ़ देखती तो दिल से हमेशा ये आवाज़ निकलती कि अंत में सब सही ही होगा. 

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मगर उसके साथ ही मुझे इस बात का भी ध्यान रखना था कि एक बार फिर से मैं ख़ुद को खो नहीं सकती हूं. अपने पिछले रिश्ते से मैंने सीखा था कि अपने पार्टनर के साथ सब शेयर करते हुए भी रिश्तों में सीमाएं होना कितना ज़रूरी होता है. 

मैं वाक़ई चाहती थी के मेरा ये रिश्ता चले. 

हमारा रिश्ता एक दम सही चल रहा था. वो मुझसे बेहद प्यार करता है. मगर धीरे-धीरे मैं परेशान होने लगी. जैसे ही मुझे इस बात का पूरा एहसास हो गया कि हां मैं इसके लिए बेहद सीरियस हूं, न जाने कैसे मेरे मन में इसको खोने का डर सताने लगा. मुझे पता था कि जितना ज़्यादा मैं इससे प्यार करूंगी उतना ही ज़्यादा मुझे उसे खोने का भी डर होगा.   

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ये डर मुझ पर इस कदर हावी होने लगा कि मैं पहले से ही सोचने लगी कि अंत में, मैं इसे खो दूंगी. इस डर के चलते मैं ज़्यादा सोचने लगी और कभी-कभी छोटी-छोटी बातों पर भी ओवररिएक्ट करने लगी. जिसने बेशक़ हमारे रिश्ते पर असर डालना शुरू किया.   

मुझे नहीं पता था कि किसी रिश्ते में बस होना क्या होता है. मुझे नहीं पता था कि कैसे कल की चिंता करे बगैर जो रिश्ता अभी है उसे कैसे इन्जॉय करूं.   

उसने मेरी इन चीज़ों को नोटिस किया और मुझे उससे ख़ुल कर बात करने के लिए कहा. असहजता से ही सही मगर मैंने धीरे-धीरे उससे अपने इस डर के बारे में बात करना शुरू किया. मुझे ध्यान नहीं कि मैंने इतना ख़ुल कर कभी किसी से बात की हो. मगर जो मैं नहीं समझ पा रही थी वो ये कि मेरे इस डर के पीछे मेरे बीते रिश्ते का असर था न कि मेरे अभी के रिश्ते का. 

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धीरे- धीरे समय बीता और उसके साथ रहकर मैंने रिश्ते में वास्तव में रहना सीखा. मैंने सीखा कि कैसे कल की फ़िक्र किये बगैर रिश्ते में बस होना क्या होता है. न चिंता, न फ़िक्र! मैंने देखा कि किस तरह मुझमें बदलाव आया है. 

मैं इस रिश्ते में बेहद ख़ुश होने लगी. मेरे मन में एक सुकून सा था, ख़ुद के प्रति भी और इस रिश्ते को लेकर भी. 

मैंने सीखा कि रिश्ते को भरपूर तरीक़े से जीना क्या होता है. इस बात की चिंता किए बगैर कि आने वाले कल में इस रिश्ते का क्या होगा. आख़िर जिस कल को मैंने अभी तक देखा ही नहीं है उसके बारे में उदास या ज़्यादा सोचने से कुछ नहीं होना है. 

आख़िरकार मैं अपने रिश्ते में आज उस मोड़ पर हूं जहां मुझे हमेशा ख़ुद को चोट पहुंचने से बचाने की ज़रूरत नहीं है. मैं आज उससे ख़ुल कर प्यार करती हूं. दिन में जो भी हुआ होता है उसे शेयर करती हूं, उसकी बातें सुनती हूं. मैंने समझ लिया है कि ये कोई मंज़िल नहीं है जहां हमें पहुंचना है बल्कि उन पलों को ख़ुल कर जीना है जब आपका प्यार सबसे ताक़तवर और ख़ूबसूरत हो. अपने बीतें रिश्तों का बोझ ढोना बंद करें. आज को इन्जॉय करें.