बचपन के दिन भी क्या दिन थे. 'फ्रेंडशिप डे' करीब आते ही हम लोग अपने बेस्ट फ़्रेंड के लिए सरप्राइज़ गिफ़्ट के जुगाड़ में लग जाते थे. महीनों पहले से ही हम पॉकेट मनी में मिले पैंसों में से कुछ न कुछ बचा लिया करते थे.

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मुझे आज भी याद मैं 9वीं में पढता था. स्कूल खुले महीना भर ही हुआ था, इसलिए मम्मी ने स्कूल की फ़ीस के पैसे मुझे ही दे दिए थे. फिर अगस्त का महीना शुरू होते ही 'फ़्रेंडशिप डे' की सुगबुगाहट भी शुरू हो गयी. स्कूल में मेरा एक बेस्ट फ़्रेंड हुआ करता था. हम दोनों एक साथ स्कूल, ट्यूशन और घूमने-फिरने जाया करते थे. फ़्रेंडशिप डे पर उस दोस्त को सरप्राईज़ गिफ़्ट देने के चक्कर में मैंने स्कूल की फ़ीस से ही गिफ़्ट ख़रीद लिया. फिर उसी फ़्रेंड से पैसे उधार लेकर स्कूल की फ़ीस भरी. वो आज भी मेरा बेस्ट फ़्रेंड है.

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'फ़्रेंडशिप डे' के इस ख़ास मौके पर 'Scoopwhoop हिंदी' के कुछ साथियों ने भी अपने ऐसे ही अनुभव हमारे साथ शेयर किये हैं, जब उन्होंने या उनके दोस्तों ने अपने दोस्तों के ख़ातिर कुछ ऐसा किया जिसे याद करके आज भी उनकी आंखें चमक उठती हैं-

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1- रवि गुप्ता

मेरा एडमिशन AMU के MBA में हो गया था, लेकिन जिन दोस्तों ने मेरे साथ एंट्रेंस एग्ज़ाम दिया था, वो सब फ़ेल हो गए. फिर मैंने सोचा कि मैं क्या ही करूंगा यहां एडमिशन लेकर कोई दोस्त तो मेरा पास हुआ नहीं है. इसलिए मैंने AMU को टाटा कर दिया.

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2- किरण प्रीत कौर

कॉलेज में सेमेस्टर से पहले इंटरनल होते हैं जो करना ज़रूरी होता है पर वो 2 बार होते हैं. इसलिए मैंने सोचा कि मैं इस बार इंटरनल नहीं दूंगी जो होगा अगली बार देख लेंगे. एग्ज़ाम से पहली वाली रात में काफी देर तक जगी रही जब नींद आने लगी तो फ़ोन चार्ज में लगाकर सो गयी. इंटरनल वाले दिन मेरी दो दोस्त सुबह 7 बजे से मुझे कॉल करने में लगी हुईं थी, जब मैंने कॉल नहीं उठाया तो वो दोनों 9 बजे मेरे PG में आ गए, उन्हें लगा मुझे कुछ हो गया है इसलिए फ़ोन नहीं उठा रही है. जब मैंने दरवाज़ा खोला तो एक दोस्त ने मुझे ज़ोर का लाफ़ा मारा. उस दिन उन दोनों ने मेरी ख़ातिर अपना पेपर छोड़ दिया.

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3- धीरेन्द्र कुमार

इंजीनियरिंग में एडमिशन के समय मुझे कॉउंसलिंग और एडमिशन प्रोसेस की ज़्यादा समझ नहीं थी. मैं पहली बार इन सब कामों के लिए बिहार से बनारस जा रहा था. जब मैंने अपने एक दोस्त से मदद मांगी तो वो मेरे साथ न सिर्फ़ BHU आया बल्कि साथ में जुलाई की गर्मी में कई कॉलेज के चक्कर भी काटे. जब काम निपट गया तो वापस लौटते ही मेरे दोस्त की तबियत ख़राब हो गई तो फिर उसे एम्बुलेंस से हॉस्पिटल ले जाया गया.

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4- माहीपाल बिष्ट

मेरा पुणे के एक बड़े कॉलेज में MBA में एडमिशन हो गया था. ग्रैजुएशन के बाद MBA में भी मुझे वही डेबिट-क्रेडिट पढ़ना पड़ रहा था. इस दौरान मेरा वहां बिलकुल भी मन नहीं लग रहा था, क्योंकि मेरा बेस्ट फ़्रेंड दिल्ली से जर्नलिज्म कर रहा था. मैं भी जर्नलिज्म ही करना चाहता था इसलिए मैं एक दिन मौक़ा पाकर दिल्ली वापस लौट आया.

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6- शोभा शामी

हम दोस्त बने अपने कॉलेज की वजह से. दिल्ली में बढ़िया कॉलेज से जर्नलिज़्म कर रहे थे. हमने साथ पढ़ाई की, बंक मारे, शहर घूमे, अपनी लाइफ़ की सबसे नाज़ुक बातों से लेकर, पागलपन भरे किस्से बांटे. काम करने के सपने देखे. सबकुछ सुंदर था और फिर कॉलेज के फ़ाइनल एग्जाम भी आ गए. मेरी दोस्त कम अटेंडेंस की वजह से डीबार हो गई थी. वो पहला एग्जाम नहीं दे पाई. अगले दिन हम सोचते रहे कि अब क्या करें. वो घर पर बता भी नहीं सकती थी कि डीबार है और इस चक्कर में परेशान भी हो रही थी. अपनी अफ़लातूनी मस्ती में हम दोनों अगले दिन दिल्ली छोड़ कहीं घूमने चले गए. उसके बाद क्या-क्या हुआ वो एक लंबी कहानी है. लेकिन बाद में हम दोनों ने साथ में सप्लीमेंट्री का एग्जाम दिया था. उस दिन के बाद हम दोनों अलग ही तरह के दोस्त हो गए,आज भी हैं.

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हम स्कूल के दोस्तों के लिए कुछ भी कर गुज़रते हैं ना. कई बार उसमें लॉजिक भी नहीं होता. और फिर ठीक ही है क्योंकि दोस्ती के आगे दुनियादारी कहां ही टिकती है. दोस्ती तो बस दिल से निभती है. सच कहूं तो दोस्त के लिए कुछ भी कर गुजरने वाला स्कूल-कॉलेज का वो जज़्बा अब कहां देखने को मिलता है.