भारत को आज़ादी दिलाने के लिए सैंकड़ों स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी ज़िन्दगी न्यौछावर कर दी.भारतीय सेना, भारतीय वायु सेना और भारतीय नौसेना हम सब की सुरक्षा सुनिश्चित करती है. हम चैन की नींद सो सकें, आराम से अपनी ज़िन्दगी गुज़ार सकें इसलिए हमारे जवान दिन-रात मौत का सामना करते हैं.

भारतीय सेना में आज तक सिर्फ़ दो ही जवानों को 5-स्टार रैंकिंग मिली है. एक, सैम मानेकशॉ और दूसरे कोडंडेरा मडप्पा करियप्पा(के. एम. करियप्पा).

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के. एम. करियप्पा आज़ाद भारत के पहले सेना प्रमुख थे. 15 जनवरी 1949 को उन्होंने जनरल रॉय फ़्रांसिस बुचर से ये पद ग्रहण किया था. जनरल करियप्पा का जन्म 28 जनवरी, 1899 को कर्नाटक में हुआ था. वे पढ़ाई में काफ़ी तेज़ थे और गणित और चित्रकला में विशेष रूचि रखते थे. 1917 में स्कूली शिक्षा पूरी करके उन्होंने मद्रास(अब चेन्नई) के प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया.

करियप्पा उर्फ़ 'कीपर' की ज़िन्दगी से जुड़े कुछ विशेष क़िस्से:

1. नाम से जुड़े हैं कई 'फ़र्स्ट'

जनरल करियप्पा अंग्रेज़ों के राज में ही सेना से जुड़े. वे King's Commissioned Indian Officers के पहले बैच के सदस्य थे. 1942 में किसी यूनिट को कमांड करने वाले वे पहले भारतीय बने. 1947 में उन्होंने Imperial Defense College में ट्रेनिंग ली और ऐसा करने वाले पहले भारतीय बने.

2. 1947 के युद्ध में निभाई अहम भूमिका

1947 में हुए पाकिस्तान से युद्ध में भी उन्होंने बेहद अहम भूमिका निभाई थी. युद्ध की रणनीति के हिसाब से उन्होंने ही सेना को विभाजित किया था. Western-Front में उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने ज़ोजिला, ड्रास और कारगिल से दुश्मनों को भगाया था. 15 जनवरी, 1949 को वे भारतीय सेना के पहले सेना प्रमुख बने.

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3. रिटायरमेंट के बाद भी काम जारी रखा

जनरल करियप्पा 1953 में सेना से रिटायर हुए. रिटायरमेंट के बाद भी उन्होंने काम जारी रखा और 1956 तक ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में बतौर हाई कमीश्नर काम किया.

4. अमेरिकी राष्ट्रपति और ब्रिटिश सरकार ने किया सम्मानित

अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी. एस. ट्रूमैन ने उन्हें 'Order Of The Chief Commander Of The Legion Of Merit' से सम्मानित किया था.

Source: Economic Times

5. ठुकरा दिया था बेटे की रिहाई का प्रस्ताव

1965 के युद्ध के दैरान जनरल करियप्पा के बेटे, फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट नंदा करियप्पा दुश्मनों की गिरफ़्त में थे. तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खां, विभाजन से पहले जनरल करियप्पा के अंडर काम कर चुके थे. अयूब खां ने जनरल करियप्पा के पास बेटे की रिहाई का संदेश भिजवाया. इसके जवाब में करियप्पा ने कहा,

'नंदू मेरा नहीं इस देश का बेटा है. उसके साथ वही बर्ताव किया जाए, जो दूसरे युद्धबंदियों के साथ किया जा रहा है. अगर आप उसे छोड़ना ही चाहते हैं, तो सभी युद्धबंदियों को छोड़िए'
बाद में पाकिस्तान ने नंदू करियप्पा को छोड़ दिया था.

6. नेहरू को दिया था सटीक जवाब

आज़ादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री, नेहरू की सैन्य अफ़सरों की सेना प्रमुख चुनने की मीटिंग हो रही थी. नेहरू का प्रस्ताव था कि किसी अंग्रेज़ को भारतीय सेना का प्रमुख बनना चाहिए क्योंकि भारतीयों को सेना का नेतृत्व करने का अनुभव नहीं था. सभी ने नेहरू की बात पर हामी भरा. शायद उनका विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं थी. तभी किसी ने कहा 'मैं कुछ कहना चाहता हूं', नेहरू ने इजाज़त दी. उस शख़्स ने कहा,

'हमारे पास तो देश का नेतृ्त्व करने का भी अनुभव नहीं है, तो क्यों न हम किसी अंग्रेज़ को भारत का प्रधानमंत्री बना दें.'
इस बात के बाद जनरल करियप्पा को भारतीय सेना का पहला सेना प्रमुख बना दिया गया.

Source: Dawn

जनरल करियप्पा की मृत्यु 15 मई, 1993 को 94 की उम्र में हुई. देश से बड़ा कुछ नहीं होता, जनरल करियप्पा की ज़िन्दगी इसका सुबूत हैं.