दोहे किसी व्यक्ति को अंधरे में मशाल दिखाने का काम करते हैं. बात जब दोहे की हो, तो कबीरदासजी का नाम स्वत: ही जु़बान पर आ जाता है. चलिए आज आपको कबीरदास जी के कुछ ऐसे दोहे और उनके अर्थ बताते हैं, जो आज भी उतने ही कारगर हैं, जितने पहले थे.

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धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय.

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय.

अर्थ- किसी भी काम का रिज़ल्ट आने में समय लगता है. इसलिए जल्दी या हड़बड़ाहट करने से कुछ हासिल नहीं होगा.

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय.

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय.

अर्थ- किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि प्रेम का सही अर्थ समझने और उसे बांटने से लोग विद्वान कहलाते हैं.

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साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय.

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय.

अर्थ- आज के समय में दुनिया को सूप जैसे लोगों की ज़रूरत है, जो अन्न को रख कर कूड़ा-कचरा बाहर फेंक देता है. ऐसे लोग जो बुराई को दूर करते हैं और अच्छाई को रख लेते हैं.

तिनका कबहुं ना निन्दिये, जो पावन तर होय.

कबहुं उड़ी आंखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय.

अर्थ- किसी को भी छोटा या कमजोर समझने की भूल कर उसकी निंदा नहीं करनी चाहिए. कभी-कभी छोटा सा तिनका भी आंख से आंसू निकाल दर्द देने का काम कर जाता है.

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दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त.

अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत.

अर्थ- दूसरों की कमियों पर सब हंस लेते हैं, लेकिन अपनी कमियों पर कोई ध्यान ही नहीं देता, जिनका कोई अंत ही नहीं है. इसलिए दूसरों की कमियां गिनने से अच्छा है कि अपनी ख़ामियों को दूर किया जाए.

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई.

बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई.

अर्थ- किसी भी चीज़ का असल महत्व उसका जानकार ही जानता है. जैसे समुद्र में बिखरे मोतियों को बगुला हाथ तक नहीं लगाता और हंस उन्हें चुन-चुनकर खाता है.

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अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप.

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप.

अर्थ- अति किसी चीज़ की अच्छी नहीं होती. ज़्यादा पाने की भूख की तरह. जैसे ना ज़्यादा धूप अच्छी होती है, ना ज़्यादा बारिश. ना ज़्यादा बोलना, ना ज़्यादा चुप रहना.

निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय.

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय.

अर्थ- जो लोग हमारी भलाई के लिए हमारी कमियों के बारे में बताते हैं, उनका साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए. ये हमारे सभी दोषों को दूर करने में मदद करते हैं.

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जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई.

जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई.

अर्थ- जब तक किसी के गुणों को परखने वाला सही आदमी नहीं मिल जाता, तब तक उसे कोई कुछ नहीं समझता. लेकिन एक बार जब किसी के गुण की पहचान हो जाती है, तो उसके गुण की वैल्यू बढ़ जाती है.

जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग.

तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग.

अर्थ- जिस तरह तिल में तेल और चकमक में आग दिखाई नहीं देती, उसी प्रकार ईश्वर भी आपके मन के भीतर है, जो दिखाई नहीं देता. बाहर तलाशने से आपको निराशा ही हाथ लगेगी.

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चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए.

वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाए.

अर्थ- चिंता नाम के चोर को कोई पकड़ नहीं पाता. इसकी दवा किसी के पास नहीं है, इसलिए चिंता नहीं करनी चाहिए.

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह.

जिसको कुछ नहीं चाहिए वो शहनशाह.

अर्थ- इस धरती पर सभी कष्टों की जड़ लोभ है, जिसने लोभ-लालच करना छोड़ दिया वही असली शहंशाह है. सुखी है.

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लिखे सालों पहले गए हैं लेकिन इनकी ज़रूरत अभी सबसे ज़्यादा है.