देश की सुरक्षा में तैनात जवानों के लिए वतन ही उनका परिवार होता है. बाद में उनके लिए उनका अपना परिवार आता है.

अपने परिवार से पहले यहां तक की ख़ुद से पहले वतन से प्रेम करने वाले जवानों का ही नहीं उनके परिवार वालों का भी जीवन आसान नहीं होता है. ख़ासतौर पर त्यौहारों और जश्न के समय उनकी कमी सबसे ज़्यादा ख़लती है.

मैं तीन साल की थी तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मेरे पिता बाक़ी पिताओं की तरह नहीं हैं. मेरे पिता अधिकतर हमारे साथ नहीं होते थे, वो बाहर होते थे, जंग लड़ रहे होते थे. हम उन्हें साल में एक बार देखा करते थे. मुझे याद है मैं जब भी मां से पापा के बारे में बात करती थी तो मां परेशान हो जाती थी. उस समय हमारे पास फ़ोन या ई-मेल जैसी कोई सुविधा नहीं हुआ करती थी तो मां उन्हें हमेशा चिट्ठी लिखा करती थी.
जब वो दोनों मिलते थे या फिर चिठ्ठी के जरिए पापा मां को बताते थे की सरहद के उस पार कैसे हालात हैं. भारत-पाकिस्तान के बीच होती भयानक जंग का नतीज़ा ये होता था कि हर मिनट कोई न कोई जवान शहीद हो जाता था. ट्रक के नीचे लैंड माइन फटने से अपने साथी जवान को खोना, अपने स्टेशन के ठीक बाहर बॉम्ब फट जाना. ये कुछ ऐसी बातें हैं जो आम घरों में नहीं होती हैं.

एक जवान का परिवार हमेशा इस डर में जीता है कि कहीं सरहद पर जंग लड़ने गया व्यक्ति घर पर तिरंगे में न लिपटा हुआ आए.

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जितनी बार पापा जाते उतनी बार मां बस यही प्रार्थना करती कि वो पापा को तिरंगे में ना लिपटा देखें, जैसे गए हैं वैसे ही वापस आ जाएं. जब मेरा छोटा भाई पैदा हुआ था तब मेरे पापा जंग लड़ रहे थे. मां बहुत परेशान थी कि कहीं पापा अपने बच्चे को कभी भी नहीं देख पाएंगें."
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वहीं, जवानों की पत्नियां जैसा कोई बहादुर नहीं होता. वो हर पल परिवार को जोड़े रखती हैं. अपने बच्चों और परिवार के लिए मां और बाप दोनों बनती हैं.

चाहे जो हो हमारे घर में हमेशा ख़ुशी रहती है. मेरी सबसे प्यारी याद दिवाली की होती हैं. मैं और मेरा भाई हर दिवाली उदास रहते हैं क्योंकि हर कोई अपने परिवार वालों के साथ दिवाली मना रहा होता है. हर बच्चा अपने पापा के साथ पटाखे फोड़ रहा होता है लेकिन हम नहीं. ऐसे में हमें ख़ुश करने के लिए मां पूरा घर सजाती थी और हमारे लिए ये कहकर पटाखे लाती थी कि पापा ने भेजे हैं. वो इस बात का ध्यान रखती थी कि हम भरपूर त्यौहार का मजा लें. वो कहती थी कि पापा हमेशा हमारे बारे में ही सोचते रहते हैं.

जैसे-जैसे हरसिमरन और उसका भाई बड़े हो रहे थे, दोनों ही अपने माता-पिता के प्यार और त्याग को और अच्छे से समझ रहे थे. साथ ही उनके प्रति संवेदनशील भी बन रहे थे.

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एक समय मैंने भी आर्मी जॉइन करने का सोच लिया था. मैं इस पर काम भी कर रही हूं और आशा है ज़ल्द सफल भी हो जाउंगी. मैं परिवार की विरासत को आगे बढ़ाना चाहती हूं.

हरसिमरन को कॉलेज में अपना जीवन साथी मिल गया. वो भी एक आर्मी परिवार से है और आगे चल कर आर्मी में शामिल होना चाहता है.

'जो लोग अपने वतन के लिए लड़ना चाहते हैं भले ही उनके परिवार हों, लेकिन उनका पहला कर्तव्य हमेशा राष्ट्र ही रहेगा. ऐसे परिवार का हिस्सा होना मेरे लिए सम्मान की बात है. हजारों परिवारों द्वारा वर्षों का बलिदान दिया गया है, अपने बेटों और पतियों से दूर. हर बार हम उनके घर आने का इंतजार करते हैं, और जब वो आते हैं तो हम भगवान को शुक्रिया करते हैं. मगर हम ये भी जानते हैं कि अगर ऐसा कोई दिन होता है कि वे नहीं आते हैं तो वो इसलिए शहीद हो जाते हैं कि हर घर में उजाला हो, अनन्त आशा हो और बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव रहे.