भारत की आज़ादी के लिए सैकड़ों क्रांतिकारियों व सैनिकों ने अपने प्राण हंसते-हंसते न्यौछावर कर दिए थे. भारत में हमेशा से ही देश के लिए मर मिटने वाले शहीदों की जय जयकार होती है, उनके बलिदान को मान सम्मान दिया जाता है

भारतीय सेना के अफ़सर मोहम्मद उस्मान भी एक ऐसे ही सैनिक थे, जिन्होंने अपने देश के लिए मोहम्मद अली जिन्ना के एक बड़े ऑफ़र तक को ठुकरा दिया था.

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15 जुलाई, 1912, उत्तर प्रदेश के मऊ ज़िले के एक छोटे से गांव बीबीपुर में हुआ था. उनके पिता मोहम्मद फ़ारुख़ पुलिस अफ़सर थे. जब मोहम्मद उस्मान पैदा हुए तो पिता मोहम्मद फ़ारुख़ ने तय कर लिया था कि बेटे को पढ़ा लिखा कर एक बड़ा अफ़सर बनाएंगे.

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यूपी के पुलिस अफ़सर मोहम्मद फ़ारुख़ ने सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन उनका बेटा भारतीय सेना में ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान बनकर देश के दुश्मनों से आख़िरी सांस तक लड़ेगा और देश के लिए अपना ज़िंदगी क़ुर्बान कर देगा.

आइए जानते हैं क्या कहानी इस वीर अफ़सर की, जिसने सन 1948 में कश्मीर घाटी को पाकिस्तानी लड़ाकों के चंगुल से छुड़ाया था?

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रॉयल मिलिट्री एकेडमी में चयन

मोहम्मद उस्मान सन 1932 में महज़ 20 साल की उम्र में 'रॉयल मिलिट्री एकेडमी' में भर्ती हो गए. तब पूरे भारत में केवल 10 लड़कों को ही इस मिलिट्री संस्थान में दाख़िला मिला था. उस वक़्त भारत की अपनी कोई मिलिट्री एकेडमी नहीं थी, इसलिए सेना में जाने वाले युवाओं को ब्रिटिश सरकार इंग्लैंड में 'रॉयल मिलिट्री एकेडमी' भेजकर ट्रेनिंग करवाती थी.

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इसके बाद मोहम्मद उस्मान अपने पिता फ़ारुख़ के ख़्वाहिशों से उलट ब्रिटिश आर्मी में अफ़सर बनने के लिए रवाना हो जाते हैं. इस दौरान वो 3 साल तक कड़ी ट्रेनिंग से होकर गुज़रते हैं. इंग्लैंड की 'रॉयल मिलिट्री अकैडमी' में प्रशिक्षण लेने के बाद उस्मान को 'बलूच रेजिमेंट' में सैन्य अफ़सर के तौर पर पहली तैनाती मिलती है. हालांकि 1 साल उस्मान रॉयल मिलिट्री फ़ोर्स में भी अपनी सेवाएं देते हैं, जिसके बाद वो भारत लौट आते हैं.

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इस बीच 'सेकंड वर्ल्ड वॉर' के दौरान मोहम्मद उस्मान को अफ़गानिस्तान और बर्मा में भी तैनात किया गया. शायद, उस्मान अपने जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई के लिए तैयार हो रहे थे, जो उन्हें बंटवारे के बाद पाकिस्तानी फ़ौज से लड़नी थी. बंटवारे से पहले साल 1945 से लेकर साल 1946 तक मोहम्म्द उस्मान ने '10 बलूच रेजिमेंट' की 14वीं बटालियन का नेतृत्व किया. इस दौरान वो मेजर पद पर तैनात रहे.

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बलूच रेजीमेंट में तैनाती के दौरान वो युद्ध की हर बारिकियों को सीख रहे थे कि उन्हें पता था कि भारत-पाक बंटवारे की सरगर्मीयां तेज़ हो गई हैं. किसी भी समय में देश के बंटवारे का ऐलान हो सकता है और सेना को हर मोर्च पर तैयार रहना होगा. आख़िरकार साल 1947 में भारत-पाक बंटवारा हो जाता है.

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जब मोहम्मद उस्मान ने जिन्ना के बड़े प्रस्ताव को ठुकराया

इस दौरान भारत-पाक बंटवारे के बाद हर चीज़ का बंटवारा हो रहा था. ज़मीन के टुकड़े के साथ ही विभागों और सेना की कुछ रेजिमेंट का भी बंटवारा किया गया. बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा बनाया गया. इसलिए बलूच रेजिमेंट बंटवारे के बाद पाकिस्तानी सेना का हिस्सा बन गई. बंटवारे के बाद मोहम्मद उस्मान भी परेशान थे, परेशानी का कारण कोई जंग नहीं, बल्कि उनका मुसलमान होना था.

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मोहम्मद उस्मान के साथ एक बड़ी परेशानी ये भी थी कि उस दौर में सेना में बेहद कम मुसलमान सैनिक थे. इस दौरान मोहम्मद अली जिन्ना मुसलमान होने की तर्ज़ पर ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को भी पाकिस्तान ले जाना चाहते थे. जिन्ना जानते थे कि उस्मान एक क़ाबिल और दिलेर अफ़सर हैं, जो पाकिस्तानी सेना के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे.

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मोहम्मद अली जिन्ना के लाख कोशिशों के बावजूद मोहम्मद उस्मान ने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया. उसके बाद उस्मान को तोड़ने के लिए पाकिस्तानियों की ओर से काफी प्रलोभन दिए गए. यहां तक कि मोहम्मद अली जिन्ना ने मोहम्मद उस्मान को पाकिस्तानी सेना का 'चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़' बनाने तक का लालच तक दिया था, लेकिन जिन्ना का ये लालच भी उस्मान को डिगा नहीं पाया. मोहम्मद उस्मान ने भारतीय सेना में ही रहने का फैसला किया. इसके बाद उन्हें 'डोगरा रेजिमेंट' में शिफ्ट कर दिया गया.

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वीरता और शौर्य ने बनाया 'नौशेरा का शेर'

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान कश्मीर में अपनी बटालियन का नेतृत्व कर रहे थे. इस दौरान दुश्मन गुफ़ाओं में छुपकर भारतीय सेना पर हमला कर रहे थे. इस बीच उस्मान ने कश्मीर के झंगड़ क्षेत्र को पाकिस्तानियों के कब्ज़े से आज़ाद कराने की कसम खाई थी, जिसे उन्होंने करके दिखाए. झंगड़ हासिल करने के बाद ब्रिगेडियर उस्मान ने नौशेरा को भी फ़तह कर लिया था. जिसके बाद उन्हें 'नौशेरा का शेर' कहा जाने लगा.

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इस दौरान ब्रिगेडियर उस्मान की क़ाबिलियत और कुशल रणनीति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके नेतृत्व में भारतीय सेना को बेहद कम नुक़सान हुआ. इस युद्ध में पाकिस्तानी सेना के 900 सैनिक मारे गए, जबकि भारतीय सेना के केवल 33 सैनिक शहीद हुए. मोहम्मद उस्मान की बहादुरी से पाकिस्तान इतना बौख़ला गया था कि उसने उस्मान के सिर पर 50 हज़ार रुपए का ईनाम भी रख दिया.

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इसके बाद मोहम्मद उस्मान को युद्ध में वीरता और शौर्य का प्रदर्शन करने के लिए सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया गया.