कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन में लाखों मज़दूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था. इसलिए वो पैदल ही अपने घर की ओर निकल पड़े थे. इन मज़दूरों का कष्ट एक एनआरआई यानी अप्रवासी भारतीय से देखा नहीं गया. उसने उनकी मदद के लिए एक कैंपेन की शुरुआत की. इस कैंपेन का नाम रखा गया 'रोटी-सब्ज़ी'. इसके तहत वो लॉकडाउन से लेकर अब तक हज़ारों लोगों के घर राशन पहुंचाने का काम कर रहे हैं.

ये नेक काम अमेरिका की सिलीकॉन वैली में रहने वाले आलोक राठौड़ कर रहे हैं. वो लॉकडाउन से पहले मुंबई के गारेगांव में अपने माता-पिता के साथ कुछ वक़्त बिताने आए थे. लेकिन लॉकडाउन हो जाने के बाद उन्हें मजबूरन यहीं रहना पड़ा.

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वो यहां रहकर ही अपना काम रहे थे. उन्होंने नोटिस किया कि बहुत से प्रवासी मज़दूर काम धंधा न होने के चलते पैदल ही घर जा रहे हैं. यहां तक कि उनके घर आने वाला सब्ज़ीवाला भी घर जाने वाला था. तब उन्होंने इनकी मदद के लिए कुछ करने की ठानी. इस तरह शुरुआत हुई रोटी-सब्ज़ी अभियान की.

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पहले वो ख़ुद और अमेरिका में रह रह अपने दोस्तों की मदद से इसे चला रहे थे. अमेरिका से उन्होंने इस अभियान के लिए क़रीब 35 लाख रुपये डोनेशन के रूप में एकत्र किए थे. इसके बाद उन्होंने ज़रूरतमंदों को तलाश कर उन तक राशन और पानी पहुंचाया. यही नहीं उन्होंने आस-पास के लोगों की मदद से महिलाओं के लिए ज़रूरी सामान को भी पहुंचाया. इस कार्य को वो अपने दोस्त लक्ष्मण और परिवार की मदद से कर रहे हैं. वो बीते कुछ महीनों से 1500 परिवार का ख़्याल रख रहे हैं.

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आलोक के दोस्त लक्ष्मण के पिता सूर्या ने इस बारे में बात करते हुए कहा- 'लॉकडाउन के समय प्रवासी मज़दूरों की स्थिति काफ़ी भयावह थी. केरल सरकार ने तो उनके लिए काफ़ी कुछ किया लेकिन महाराष्ट्र में ऐसा कुछ नहीं हो रहा था. इसलिए आलोक ने आगे बढ़कर उनकी मदद करने की ठानी. हालांकि, अब महाराष्ट्र सरकार मज़दूरों की मदद के लिए कई योजना लेकर आई है. लेकिन अभी भी आलोक इस काम को कर रहे हैं.'

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आलोक अमेरिका में अपनी पत्नी और बेटी के साथ पिछले 15 साल से रह रहे हैं. वो जल्द ही अमेरिका वापस जाने वाले हैं. उन्होंने इस बारे में बात करते हुए कहा- 'मैं चाहता था कि प्रवासी मज़दूर संसाधनों के अभाव में भीख न मांगे. इसलिए मैंने इस अभियान की शुरुआत की थी. मैं अब अमेरिका जाकर भी इसे जारी रखूंगा. अब मैं इसमें स्किल डवलेपमेंट को भी जोड़ूंगा. इससे ग़रीब परिवार के बच्चे भी अपने पैरों पर खड़े हो सकेंगे. ये सब एक चैरिटेबल ट्रस्ट की मदद से किया जाएगा.'

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