काफ़ी समय पहले की बात है. मैं, मम्मी और पापा घर पर बैठे शादियों की बात कर रहे थे. दरअसल, बात मेरे मामा की शादी की हो रही थी. उनके लिए कई रिश्ते आ रहे थे.

बातें ऐसे ही चल रही थीं तभी मैंने मम्मी-पापा से पूछ लिया कि उनकी पहली मुलाक़ात कैसी थी. और शादी से पहले उनकी कोई मुलाक़ाते हुई या नहीं. इस पर दोनों हंसे और थोड़ा शर्माए.

इस पर मम्मी बोली कि तुम्हे पता नहीं है तुम्हारे पापा बड़े ही रोमांटिक हैं.

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मम्मी ने बताया कि जब पापा उन्हें पहली बार मिलने आए थे तब वो पूरे वक़्त बेहद ही शांत थे. वो बस 'हम्म-हम्म' बोलकर सारे प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे.

मम्मी-पापा का मज़ाक बनाते हुए बोलीं, 'मुझे तो लगा ये गूंगे हैं...इनसे शादी क्या ही होगी'

इस पर पापा बोले, 'ये हमेशा से ही इतनी बोलती है. मैं कहता हूं न बात करने के मामले में तुम बिलकुल अपनी मां पर गई हो.' इस बात पर झट से मां बोलती हैं कि हां और इनसे उस दिन एक भी शब्द नहीं निकल रहा था.

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ये बात सुनकर मैं एक दम शॉक रह गई. मुझे ये बात आज से पहले कभी नहीं पता थी. और शायद इसलिए भी शॉक थी क्योंकि हम पुराने वक़्त की ऐसी प्यार भरी कहानियां सुनना कहीं न कहीं पसंद भी करते हैं. और क्यूँकि आमतौर पर हमारे माँ बाप अपने प्रेम और शादियों के बारे में खुलकर नहीं बात करते इसलिए ऐसे बात मुझे चौंका गयी.

ख़ैर, मम्मी ने बताया कि कुछ दिनों बाद जब उनके कॉलेज की छुट्टी हुई तब उन्होंने देखा की पापा उनका गेट पर इंतज़ार कर रहे थे. शुरू में वो उन्हें वहां देख बेहद डर गई थी कि कहीं कोई जानने वाला उन्हें साथ देख न ले.

'मैंने डर और घबराहट के चलते इनकी तरफ़ नहीं देखा और अपना चुप-चाप रिक्शा पकड़ने की ओर चल दी. मगर दिल का एक हिस्सा चाहता था कि रुक कर बात भी करूं.', मां ने बोला.

पापा ने बोला, 'मैं बड़ी हिम्मत करके इससे मिलने आया था. ऐसे तो जाने नहीं वाला था.'

मैंने बोला ये बात, डेयरिंग पापा !

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फिर मां ने बताया कि कैसे पापा ने उन्हें हाथ में डरते-डरते चिठ्ठी पकड़ाई यानी लव लेटर.

बस फिर क्या था दोनों की प्रेम कहानी चल पड़ी. दोनों एक-दूसरे से लेटर्स के ज़रिए बातें किया करते थे.

दोनों के पास आज भी एक-दूसरे की चिठ्ठियां हैं.