हम अपने बारे में जो भी राय या विचार रखते हैं, वो इस पर बहुत निर्भर करता है कि हमारे आसपास के लोग-रिश्ते हमें ख़ुद के बारे में कैसा महसूस कराते हैं. हमारे बारे में सकारात्मक बातें करने वाले लोग हमें ऊर्जा और प्रोत्साहन से भर देते हैं, वहीं हमें लगातार जज करने वाले या हमारे बारे में नकारात्मक बातें करने वाले लोग हमारा ख़ुद से आत्मविश्वास डिगा देते हैं.

मैं बहुत सालों पहले एक रिश्ते में थी, जिसमें मेरा पार्टनर हमेशा मेरी तुलना दूसरों से किया करता था. मेरा कद छोटा है, 5 फुट से भी कम. वो हमेशा मुझे मेरे कद को लेकर टोकता था. "तुम ये वाली हील्स पहनोगी तो और ज़्यादा अच्छी लगोगी. तुम वो ड्रेस पहनोगी तो लोगों को लगेगा की तुम्हारा कद बड़ा है." हमेशा यही होता था कि वो मुझे किसी न किसी तरह से मुझे मेरे कद के लिए बुरा महसूस करवाता ही था.

self acceptance
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उसकी ये सारी बातें मेरे ऊपर गहरा प्रभाव डालती थी. मैं शीशे के सामने खड़े हो कर अक्सर सोचा करती थी कि क्योंकि मेरा कद छोटा है तो इसलिए मुझे या मेरे आस-पास रह रहे लोगों को शर्म आना लाज़मी है. मैं कहीं भी बहार निकलने से पहले 10 बार अपने आप को देखती थी कि उसको बोलने का मौका न मिले. मगर हमेशा वो मेरे क़द को लेकर मुझे टोक ही देता था. बात सिर्फ़ मेरे क़द की ही नहीं थी, बात मेरे कपड़े पहनने के तरीक़े से लेकर मेरे अन्य लोगों से बात करने तक हर जगह थी.

इन सब बातों की वजह से मेरा ख़ुद पर विश्वास बहुत काम होता चला गया. मेरे मन में ये बात बैठ गई थी कि लोग अगर आपस में बात कर रहे हैं तो ज़रूर मेरे बारे में ही कर रहे होंगें कि मैं कितनी छोटी हूं, मैंने कैसे कपड़े पहने हैं.

self esteem
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मुझे ये भी लगता है कि अक्सर लोगों को ये महसूस भी नहीं होता है कि वो जिस तरह की बातें कर रहे हैं, उससे दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा. या कई बार लोगों को पता ही नहीं होता कि ऐसा करना ग़लत है.

जब मेरा ब्रेकअप हुआ तो मुझे काफ़ी लम्बा वक़्त लग गया ख़ुद को अपनाने में, दोबारा से ख़ुद को समझने में.

एक लम्बे अरसे बाद मैं एक बार फिर एक रिश्ते में आई.

इस रिश्ते की सबसे ख़ास बात ये है कि मेरे पार्टनर ने मुझे वैसा ही अपनाया जैसी मैं हूं. वो मेरे से कभी मेरे क़द को लेकर कुछ नहीं कहता है. वो हमेशा यही कहता है कि मैं कितनी क्यूट हूं, मेरा क़द उसे बेहद पसंद है. वो अपने दोस्तों और परिवार में बड़े ही गर्व के साथ मेरी बात करता है. स्वाभाविक है कि इससे मैं अच्छा महसूस करती हूं और ख़ुद को आत्मविश्वास से लबरेज़ पाती हूं.

acceptance
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हालांकि, ऐसे कई दिन होते हैं जब मैं ख़ुद भी अपने क़द को लेकर थोड़ी उदास या मायूस सी हो जाती हूं. तब वो मुझे हमेशा समझता है कि तुम जैसी हो वैसी बहुत अच्छी हो. अपने आप को अपनाना सीखो. अपने आप को इसलिए किसी से कम मत समझो क्योंकि तुम्हारा क़द छोटा है. और सच बोलूं तो जब वो ये सारी बातें बोलता है तो मुझमे एक अलग तरह का विश्वास ख़ुद के प्रति आता है. ख़ुद से प्यार करना थोड़ा और आसान हो जाता है.

मैंने महसूस किया है कि कैसे वो हमेशा मुझमे कुछ अच्छा ढूंढने की कोशिश करता है. मेरी हंसी से लेकर मेरे कपड़ो तक उसने मुझे ख़ुल कर अपनाया है.

मैं देखती हूं कि कैसे इस रिश्ते में, मेरा ख़ुद के प्रति विश्वास बढ़ा है. अब कोई मेरी तारीफ़ करता है तो मैं उसे ख़ुल कर अपनाती हूं क्योंकि मुझे लगता है कि हां मैं इस प्यार की हक़दार हूं.

बेशक मेरे पहले रिश्ते के बाद मैंने ख़ुद को अपनाया है, ख़ुद की पसंद बनने पर निरंतर काम किया है मगर इसके साथ ये और सहज तरीक़े से होता है. जहां पहले में हर वक़्त ख़ुद के प्रति सजग रहती थी कि मैं अच्छी लग रही हूं, ढंग से कपड़े पहने है या नहीं वो सब अब कुछ नहीं है. मैं बिना शीशे में देखे अब कई बार बाहर निकल जाती हूं और फिर भी ख़ूबसूरत महसूस करती हूं.