रिश़्तों की गरमाहट कुछ अलग ही एहसास लिए होती है. रिश्ता. एक पीढ़ी का दूसरी पीढ़ी से. ये जुड़ता भावनाओं से है, यादों से, क़िस्सों से, कहानियों से. कभी-कभी मीठी शरारतों से तो कभी बिना बात की मुस्कुराहटों से. वो छोटी हथेली जब पिता की उंगली पकड़ मुट्ठी बन जाती है, मानो पूरा संसार समेट लेती हो. आज एक ऐसे ही रिश्ते की दास्तां आप तक पहुंचाना चाहता हूं.

@Shayonnita15 ट्विटर हैंडल से एक क़िस्सा शेयर किया गया. बात कुछ यूं शुरू होती है कि-

हम एयरपोर्ट के पास से गुज़र रहे थे, तभी मेरे कैब ड्राइवर ने रेडियो बंद कर दिया. उसने मुझसे कुछ पल का समय मांगा और लाउडस्पीकर पर एक फ़ोन रिसीव किया.

एक नन्ही से आवाज़ उस तरफ़ से आई, ‘पापा आप कहां हो? कब आओगे?’

मेरे ड्राइवर ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘मैं 12 बजे तक आ जाऊंगा.’ उस नन्हीं सी आवाज़ ने धीरे से पूछा, ‘क्या आज आपको कोई अच्छा मिला.’ इस पर कैब ड्राइवर ने कहा, ‘हां बाबा! मैं इस बारे में तुम्हें सब बताऊंगा.’ फ़ोन रखने से पहले उसने कहा, ‘जल्दी आइये’

मैंने पूछा, ‘बेटा था’. उसने कहा, ‘नहीं, बेटी. अभी चार साल की है.’ चार साल की बेटी अभी इतनी रात तक जागी है.? मैंने सवाल किया. इस पर ड्राइवर ने कहा, जब तक मैं घर नहीं आ जाता, तब तक वो नहीं सोती. ये बात उसने थोड़ा चिढ़ते हुए कहने की कोशिश की लेकिन मैं उसकी आवाज़ में गरमाहट सुन सकती थी. नन्ही से बच्ची की इतनी परवाह से उसे अलग ही खुशी होती है.

मैंने हंसते हुए कहा कि, ‘उसे कहानियां सुनाते हो?’

हां. ‘हर रोज़ एक कहानी. मैं अपनी कैब में जिन लोगों से मिलता हूं, उनकी कहानियां सुनाता हूं. उसे लगता है कि मेरी कार जादुई है.’ ये बताते हुए कैब ड्राइवर के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई. आगे उसने कहा कि ‘डायनासोर, जानवरों, उसके कार्टून्स- मैं इस कार में सबसे मिलता हूं! कभी-कभी इन सब कहानियों को बनाते समय मैं सोचता हूं कि अब आगे कौन सी कहानी बनाऊंगा. फिर उसकी मां मेरी मदद करती है!’

मेरे गाल हंसते-हंसते खिंच गए थे. मुझे याद है अपने पिता और उनकी Hodulkutkut की कहानियां- वो आदमी जो अपने हाथ के बल चलता था, अपना पैजामा अपने सिर पर पहनता था. जब मैं छोटी थी तब ये सब सुनकर खूब हंसती थी.

मैंने पूछा, ‘आपको ज़रूर उसकी बहुत याद होती होगी?’ उन्होंने सिर हिलाते हुए जवाब दिया, ‘हां. मुझे याद आती है.’ तभी रेडियो पर एक हिंदी गाना बजा और उसने कार की खामोशी को भर दिया.

हालांकि, बात यहां ख़त्म नहीं हुई, ड्राइवर ने कहा, ‘वो देर तक जागती है, फिर सुबह स्कूल जाने में देर होती है. लेकिन हम क्या कर सकते हैं.’

मैंने पूछा कि ‘क्या तुम ये काम छोड़कर कुछ और नहीं कर सकते? जिसमें टाइमिंग ठीक हो?’

उसने कहा, ‘नहीं. इससे अच्छे पैसे कमा लेता हूं. और अगर आज थोड़ा कम समय उसे देने से कल वो बड़ी होकर आपकी सीट पर बैठती है तो फिर ये ठीक ही है मैडम.’

मेरा दिल धड़का. रेडियो पर मच्छरों और किसी परिवार के बारे में कोई विज्ञापन आने लगा.

मैंने कहा, ‘ऐसा हो सकता है सर, ऐसा हो सकता है.’