पुलवामा अटैक के बाद से देश में आक्रोश का माहौल है. हर भारतीय इस आतंकी हमले में CRPF के शहीद हुए 40 सिपाहियों के लिए न्याय मांग रहे हैं. इन जवानों में किसी की अगले महीने शादी होने वाली थी, तो किसी के घर में नन्हें मेहमान की किलकारियां गूंजी थीं, तो कोई शादी के 15 दिन बाद ही अपनी ड्यूटी पर वापस आ गया था, तो किसी के बूढ़े मां-बाप घर पर उसका इंतज़ार कर रहे थे, तो किसी के बच्चे पापा के घर आने का इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन अब इनका इंतज़ार कभी ख़त्म नहीं होगा.

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वहीं पुलवामा अटैक में बारूद भरी हुई कार जिस बस से टकराई थी, उस बस को ड्राइव कर रहे थे सीआरपीएफ़ हेड कॉन्स्टेबल जयमाल सिंह (44), हमले जयमाल भी शहीद हो गए. जयमाल तो देश के लिए कुर्बान हो गए, लेकिन अपने पीछे छोड़ गए अपने 5 साल के मासूम बेटे गुरप्रकाश सिंह को, जिसको ये पता है कि उसके पिता जम्मू में ‘ड्यूटी’ पर तैनात हैं.

पंजाब के मोगा के घलोटी खुर्द गांव में रहने वाले जयमाल सिंह की मौत की ख़बर मिलने के बाद से उनके घर में मातम का माहौल है. अपने घर में दादी और मां को रोता और बिलखता देखकर गुरप्रकाश सिंह हैरान और परेशान है क्योंकि उसको तो मालूम ही नहीं है कि आखिर ये सब हुआ क्या है और सब रो क्यों रहे हैं. वो बस जानता है कि उसके 'पापा जम्मू में ड्यूटी पर तैनात हैं और जल्द ही वापस आकर नए स्कूल में उसका एडमिशन कराएंगे.

Indianexpress की ख़बर के मुताबिक़, गुरप्रकाश ने कहा,

'पापा जम्मू में हैं… जल्द ही वापस आएंगे. वो सीआरपीएफ़ में हैं. वहां से हमारे लिए पैसे लाएंगे और नए स्कूल में उसका एडमिशन कराएंगे.'

शहीद जयमाल का सिर्फ़ एक ही सपना था कि उनके बेटे को अच्छी शिक्षा मिले और इसके लिए वो अपने परिवार के साथ फरवरी महीने के अंत तक चंडीगढ़ शिफ़्ट ने वाले थे. परिवार की आर्थिक स्थिति मज़बूत न होने के कारण जयपाल तो ख़ुद ज़्यादा पढ़ नहीं सके थे, लेकिन वो अपने बेटे को अच्छी शिक्षा देना चाहते थे और इसीलिए उन्होंने जालंधर में भी गुरप्रकाश का एडमिशन कॉन्वेंट स्कूल में कराया था.

घर की कमज़ोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए और अपने भाई-बहनों को पढ़ाने के लिए जयपाल सेना में भर्ती हुए थे. जयपाल की 42 वर्षीय पत्नी, सुखजीत कौर ने कहा,

इस महीने के अंत तक हम चंडीगढ़ शिफ़्ट होने वाले थे. वो चंडीगढ़ के अच्छे स्कूल में फ़र्स्ट क्लास में गुरप्रकाश का दाखिला करना चाहते थे. बहुत परेशानियों और मिसकैरिज के बाद शादी के 18 साल बीतने पर हमें एक बेटा हुआ था. वो दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार अपने बेटे से ही करते थे. मुझे नहीं पता कि गुरप्रकाश उनके बिना कैसे रहेगा?

इसके साथ ही सुखजीत ने बताया, कि उनके पति और गुरप्रकाश दिन में कम से कम 5-6 बार फ़ोन पर बात करते थे. कई बार वीडियो कॉल पर गुरप्रकाश पूरे दिन भर की बातें, अपने दोस्तों के बारे में हर बात उनको बताता था. जब दोनों साथ में होते थे ख़ूब सारी सेल्फ़ी खींचते रहते थे.

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हमले से कुछ समय पहले ही सुबह के करीब 8 बजे मेरे पति ने अपने मुझसे फ़ोन पर बात की थी. उन्होंने मुझे बताया था कि वो एक दूसरे ड्राइवर की जगह आज ड्यूटी कर रहे हैं, क्योंकि वो अपने बेटे की शादी के लिए छुट्टी पर अपने घर गया हुआ है. फिर उन्होंने मुझे दोबारा से फ़ोन करने के लिए बोल कर फ़ोन काट दिया था. पर उसके बाद कोई फ़ोन नहीं आया और न ही अब आएगा.

सुखजीत कहती हैं, 'इस घातक हमले की साजिश रचने वाले पाकिस्तान और बाहरी ताकतों को दोषी ठहराने से पहले मैं अपनी ही सरकार से सवाल करना चाहती हूं कि विस्फोटकों से भरी कार सीआरपीएफ़ के वाहनों के पास पहुंची कैसे, कैसे वो इस शाजिश में सफ़ल हो पाए? ये कुछ और नहीं, बल्कि हमारी अपनी सरकार की लापरवाही और विफ़लता की वजह से हुआ है. क्या उनके पास कोई जवाब है कि मेरा 5 साल का बेटा अपने पिता के बिना कैसे रहेगा? वो दोनों एक-दूसरे के जान थे.'

बेटे गुरप्रकाश की ज़िद करने पर ही मेरे पति ने Swift Dzire कार खरीदी थी, वो बेटे की हर ख़्वाहिश पूरी करना चाहते थे. गुरप्रकाश अपने पापा को कॉल करके हर बार यही कहता था कि ,

पापा जल्दी वापिस आ जाओ, त्वाहडे बिन जी नी लगदा...'

शहीद जयपाल की मां सुखविंदर कौर कहती हैं, मुझे सरकार से कुछ नहीं कहना या पूछना है. उन्होंने हमारे लिए देश के लिए अपनी जान कुर्बान की है. बलिदान दिया. मैं बस यही दुआ करूंगी कि अब कोई और मां अपने बेटे को नहीं खोयेगी.'

वहीं शहीद जयमाल की बहन ने बताया, 'सिर्फ मेरे भाई जयपाल ही थे, जिन्होंने मेरी पढ़ाई को जारी रखने के लिए माता-पिता जी से लड़ाई की थी, क्योंकि मेरे माता-पिता ने आठवीं क्लास के बाद मेरी पढ़ाई छुड़वा दी थी. हम एक गरीब परिवार से थे. उन्होंने हम लोगों को सपोर्ट करने और हमको भरपेट खाना खिलाने के लिए आर्मी ज्वाइन की थी.'

बलबीर सिंह, जयमाल के चाचा बताते हैं कि इस परिवार ने बहुत गरीबी देखी है, जयमाल के पिता जसवंत सिंह(60) गांव-गांव जाकर दूध बेचते थे. अब जसवंत सिंह एक पथिक (पुजारी) हैं, जो कभी-कभार कुछ हज़ार रुपये कमा लेते हैं. जसवंत सिंह के पास कभी भी खेती के लिए कोई ज़मीन नहीं थी, वो एक दूधवाले के रूप में काम करते थे. जब जयमाल बड़ा हुआ तो उसने ड्राइविंग सीखी, उसको लाइसेंस मिला. उसके बाद उसने आर्मी ज्वाइन की और रुपये कामना शुरू किया और अपने भाई नसीब सिंह को मलेशिया भेजा. जयमाल को क्रिकेट देखना और खेलना पसंद था.

जसवंत सिंह कहते हैं,

'मेरे बेटे की मौत का बदला लो. उन्होंने हमारे 40 आदमियों को मारा है. उनके 200 आदमियों को मारो तब उनको हमारा दर्द पता चलेगा. सरकार कब कोई ठोस कदम उठाएगी?'

जयमाल के परिवार की सरकार से गुज़ारिश है कि अब सरकार ही उनके बेटे गुरप्रकाश की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी ले. 'हम चाहते हैं कि सरकार आगे गुरप्रकाश की पूरी शिक्षा का खर्च वहन करे.' यही शहीद जयमाल चाहते थे और इसके लिए ही वो कड़ी मेहनत कर रहे थे. उनके बेटे को भी पता नहीं है कि क्या चल रहा है और उसके पिता अब कभी वापस नहीं आएंगे. वो अभी इतना छोटा है कि बड़े होते तक उसके अपने पिता के साथ बिताए पांच साल की यादें भी कम पड़ जाएंगी.

देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले शहीदों को हमारा शत-शत नमन!