18 फरवरी, 1956. तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर ने लोकसभा में एक नया विधेयक पेश किया. ख़ास बात ये रही कि उनके पास पहले से कोई भी स्पीच तैयार नहीं थी, लेकिन उस दिन उन्होंने जो कहा, वो पूरे दिल से कहा.

‘ये मेरा सपना है कि स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए और हमारे देश में चिकित्सा शिक्षा के उच्च मानकों के रखरखाव के लिए हमारे पास इस प्रकृति का एक संस्थान होना चाहिए जो हमारे युवा पुरुषों और महिलाओं को देश में ही अपनी स्नातकोत्तर शिक्षा प्रदान करने में सक्षम करेगा.’

लोकसभा में कौर के भाषण ने संस्थान की प्रकृति को लेकर सदन में जोरदार बहस छेड़ दी, लेकिन विधेयक तेजी से आगे बढ़ा और दोनों सदनों के सदस्यों का अनुमोदन प्राप्त होने के बाद इसे उसी वर्ष मई महीने में स्वीकार्य कर लिया गया.

देश के अपने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) का सपना अब सच हो गया था. राज्य सभा में बिल पारित होने के बाद कौन ने कहा, ‘मैं चाहती हूं कि ये कुछ अद्भुत हो, जिस पर भारत गर्व कर सके और मैं चाहती हूं कि भारत को इस पर गर्व हो.’

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आज जब देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है, तब इस शीर्ष चिकित्सा निकाय की भूमिका कई मौकों पर चर्चा में रही है. ग़ौरतलब है कि ये देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू हैं, जिन्हें एम्स को इन ऊंचाईंयों पर पहुंचाने के श्रेय दिया जाता है, लेकिन इसके पीछे असली ड्राइविंग फ़ोर्स कौर थीं.

कपूरथला की राजकुमारी

कपूरथला रियासत से ताल्लुक़ रखने वाले कौन का इतिहास बेहद दिलचस्प है. उनके पिता राजा सर हरनाम सिंह जालंधर में गोलखनाथ चटर्जी नामक एक बंगाली मिशनरी से मिलने के बाद प्रोटेस्टेंट ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए थे. सिंह ने उनकी बेटी Priscilla से शादी की और उनके 10 बच्चे हुए. उनमें से सबसे छोटी अमृत कौर का जन्म 2 फरवरी, 1889 को लखनऊ में हुआ था.

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भारत में अपने शुरुआती साल बिताने के बाद राजकुमारी अमृत कौर ने इंग्लैंड के डोरसेट में स्थिति शेरबोर्न स्कूल फॉर गर्ल्स से स्कूली पढ़ाई पूरी की थी. उसके बाद ऑक्सफ़ोर्ड चली गईं अपनी उच्च शिक्षा के लिए. जिसके बाद वो 1908 में 20 वर्ष की आयु में भारत लौटीं और राष्ट्रीयता और सामाजिक सुधार के जीवन को अपनाया.

कौर के ग्रेट ग्रैंडसन सिद्धार्थ दास ने कहा कि, वो एक ईसाई थीं, लेकिन भारत में मिशनरी गतिविधियों के सख़्त ख़िलाफ़ थीं.

‘वो एक उत्साही देशभक्त थीं, जिनका मानना था कि मिशनरी भारतीयों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से अलग कर रहे हैं.’

एक गांधीवादी और समाज सुधारक

इंग्लैंड से लौटने के बाद कौर राष्ट्रवाद के विचारों की ओर तेज़ी से आकर्षित हुईं. उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी जैसे नेताओं के साथ बातचीत की. गांधी के उपदेशों से वो ख़ासा प्रभावित हुईं और उनके साथ उनकी एक ख़ास दोस्ती हो गई. इस बात के गवाह उनकी पुस्तक ‘Letters to Rajkumari Amrit Kaur’ में संकलित वो पत्र हैं, जो गांधी और कौर ने एकदूसरे को लिखे थे.

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यूं तो कौर भारत लौटने के तुरंत बाद ही राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़ना चाहती थीं, लेकिन उनका परिवार इसके ख़िलाफ़ था. इसलिए वो 1930 में अपने पिता के निधन तक दूर रहीं. हालांकि, इस अवधि के दौरान, वो सामाजिक सुधारों में, विशेष तौर पर महिलाओं से संबंधित सुधारों में सक्रिय रूप से शामिल थीं. नतीजतन, उन्होंने पर्दा प्रथा, देवदासी प्रथा और बाल विवाह के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ी. 1927 में उन्होंने अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना में मदद की और बाद में इसके अध्यक्ष के रूप में कार्य किया. साल 1930 में दांडी मार्च में शामिल होने के चलते कौर को जेल हो गई.

राजनीतिक कार्यकर्ता अरुणा आसफ अली ने बताया था कि, कौर एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखती थीं, लेकिन गांधी जी के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष में महिलाओं के शामिल होने के आह्वाहन पर वो अपनी सारी सुख-सुविधाएं छोड़कर आंदोलन का हिस्सा बन गईं.

आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाली कौर संविधान सभा में सदस्य बनने वाली कुछ महिलाओं में से एक थीं. हंसराज जीवराज मेहता के साथ वो एकमात्र महिला सदस्य थीं, जिन्होंने संविधान में समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था.

AIIMS की स्थापना करने वाली स्वास्थ्य मंत्री

बतौर स्वास्थ्य मंत्री कौर का सबसे सराहनीय कार्य AIIMS की स्थापना रही. आज जिस यूनिक स्टेटस को AIIMS एन्जॉय करता है, उसमें कौर की बड़ी भूमिका रही है. इसके बाद भी ये बड़ा ही दिलचस्प है कि कैबिनेट मिनिस्टर के तौर पर नेहरू की पहली पसंद अमृत कौर नहीं थीं.

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लेखक संकर घोष ने अपनी क़िताब ‘Jawaharlal Nehru – A Biography’ में लिखा है कि, नेहरू अपनी कैबिनेट में हंसा मेहता को जगह देना चाहते थे, लेकिन गांधी जी के आग्रह पर अमृत कौर को शामिल कर लिया. उन्होंने बताया कि इसके पीछे बड़ी वजह ये थी कि कौर कांग्रेसियों की भी आलोचना करने से हिचकती नहीं थीं.

बहरहाल, कौर भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं. जब AIIMS के लिए धन का मुद्दा सामने आया तो उन्होंने न्यूजीलैंड, जर्मनी, अमेरिका जैसे देशों से फंडिंग का इंतज़ाम भी किया. शिमला में में अपना पैतृक मकान, मैनरविल भी उन्होंने AIIMS को दान कर दिया. ताकि वहां की नर्सें यहां आकर छुट्टियां बिता सकें. कौर ने न सिर्फ़ AIIMS की स्थापना की बल्क़ि संस्थान की स्वायत्त प्रकृति की भी रक्षा की. ये कौर की ही कोशिशें थीं कि 1956 में AIIMS में प्रवेश के लिए एंट्रेंस एग़्ज़ाम हुआ.

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साल 1961 तक AIIMS ने वैश्विक ख़्याति प्राप्त कर ली थी क्योंकि इसे अमेरिका, कनाडा और यूरोप के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों के साथ रखा गया था.

AIIMS की नींव रखने के अलावा, उन्होंने भारतीय बाल कल्याण परिषद की भी स्थापना की और इसकी पहली अध्यक्ष बनीं. वो भारतीय कुष्ठ रोग संघ, तपेदिक संघ के अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस सोसाइटी के उपाध्यक्ष थीं. उन्होंने चार साल के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया और 1950 में WHO एसेंबली की प्रेसिडेंड बनीं.

देश की स्वास्थ व्यवस्था की इमारत में एक मज़बूत नींव डालने वाली राजकुमारी अमृत कौर ने 75 साल की उम्र में 6 फरवरी, 1964 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

साल 2020 की शुरुआत में कौर को प्रतिष्ठित टाइम मैगज़ीन ने वर्ष 1947 की महिला के तौर पर लिस्ट में शामिल किया. उनकी उपलब्धियों और योगदानों को देखते हुए मैगज़ीन ने लिखा, अपनी लक्ज़री लाइफ़ को छोड़कर कौर ने न केवल स्थायी लोकतांत्रिक संस्थानों के निर्माण में मदद की, बल्कि उन्होंने हाशिए पर जीवन गुज़ारने वालों की ख़ातिर लड़ने के लिए आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित किया.