रतन टाटा एक ऐसा नाम है जिसको पूरी दुनिया एक सफ़ल बिज़नेसमैन ही नहीं एक अच्छे इंसान के तौर पर भी देखती है. वो लोगों के लिए एक आदर्श की तरह हैं.

मगर ज़िन्दगी किसी के लिए भी आसान नहीं होती है फिर चाहे वो रतन टाटा ही क्यों न हों. हर किसी को अपने हिस्से का स्ट्रगल करना पड़ता है.

हाल ही में रतन टाटा ने Humans of Bombay से हुई अपनी बातचीत में अपने बचपन से लेकर अपने संघर्ष तक का ज़िक्र किया. साथ ही ये भी बताया कि कैसे उनकी दादी के मूल्यों ने उन्हें हमेशा एक अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित किया है.

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(1/3) “I had a happy childhood, but as my brother & I got older, we faced a fair bit of ragging & personal discomfort because of our parent’s divorce, which in those days wasn’t as common. But my grandmother brought us up in every way. Soon after when my mother remarried, the boys at school started saying all kinds of things about us–constantly & aggressively. But our grandmother taught us to retain dignity at all costs, a value that’s stayed with me until today. It involved walking away from these situations, which otherwise we would’ve fought back against. I remember, after WW2, she took my brother & I for summer holidays to London. It was there that the values were really hammered in. She’d tell us, ‘don’t say this’ or ‘keep quiet about that’ & that’s where ‘dignity above everything else’ really embedded in our minds. And she’s always been there for us. It’s difficult now to say who’s right or wrong. I wanted to learn to play the violin, my father insisted on the piano. I wanted to go to college in the US, he insisted on UK. I wanted to be an architect, he insisted on me becoming an engineer. If it weren’t for my grandmother, I wouldn’t have ended up at Cornell University in the US. It was because of her that even though I enrolled for mechanical engineering, I switched majors & graduated with a degree in architecture. My father was upset & there was a fair bit of rancour, but I was finally my own, independent person in college & it was my grandmother who taught me that courage to speak up can also be soft & dignified. After college, I landed a job at an architecture firm in LA, where I worked for 2 years. It was a great time–the weather was beautiful, I had my own car & loved my job. It was in LA that I fell in love & almost got married. But at the same time I’d made the decision to move back at least temporarily since I had been away from my grandmother who wasn’t keeping too well for almost 7 years. So I came back to visit her & thought that the person I wanted to marry would come to India with me, but because of the 1962 Indo-China war her parent’s weren’t okay with her making the move anymore & the relationship fell apart.”

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उनके माता-पिता का तलाक़ तब हुआ जब वे स्कूल में थे. उस समय तलाक़ बहुत आम नहीं थे और ऐसे में उन्हें और उनके भाई को स्कूल में हर तरह की बातों का सामना करना पड़ता था.

यह उनके जीवन का एक कठिन दौर था, लेकिन उनकी दादी ने यह हमेशा सुनिश्चित किया कि वे चारों ओर की नकारात्मकताओं के बीच भी अपनी गरिमा बनाए रखें.

उन्होंने लिखा,

मुझे याद है, WW2 के बाद वो मुझे और मेरे भाई को लंदन ले कर गई थीं. और यहीं पर उनके मूल्यों ने वास्तव में मेरे जीवन पर छाप छोड़ी. वो हमें बोलती थी, 'ऐसे मत बोलो' या 'इस बारे में शांत रहो' और यहीं 'इज़्ज़त हर चीज़ से ऊपर है' की बात ने मेरे दिमाग़ में हमेशा के लिए घर कर गई.

शुरू से ही उनके अपने पिता के साथ मतभेद थे. उनके पिता चाहते थे कि वे ब्रिटेन के एक विश्वविद्यालय से इंजीनियर हों और रतन टाटा चाहते थे कि वे अमेरिका के एक विश्वविद्यालय से आर्किटेक्ट बनें. उनके पिता चाहते थे कि वे पियानो बजाना सीखें, जबकि रतन टाटा का दिल वॉयलिन में बसता था.

ratan tata

शुरुआत में उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाख़िला लेने के बावजूद, अमेरिका में कॉर्नेल विश्वविद्यालय में दाख़िला लिया और आर्किटेक्ट में स्नातक की पढ़ाई पूरी की.

बाद में, उन्होंने LA में नौकरी की, प्यार में पड़े और शादी करने का भी फ़ैसला किया. उसी समय उनकी दादी की भी तबियत ठीक नहीं चल रही थी जिसके चलते उन्होंने उस वक़्त के लिए भारत वापिस जाने का फ़ैसला किया.

वह यह सोचकर भारत चले आए कि उनकी पार्टनर इस बात का समर्थन करेंगी और वहां आएंगी लेकिन चीजें उस तरह से काम नहीं करती हैं जैसे हम चाहते हैं और उनके रिश्ता टूट गया.

रतन टाटा की ये कहानी हमें अपने जीवन के शुरुआती चरणों में अपने दादा-दादी से मिले प्यार, समर्थन और मार्गदर्शन के बारे में बहुत कुछ सीखा जाती हैं. और उनका यही प्यार और समर्थन हमारे जीवन को दिशा देने में मदद करता है.

रतन टाटा की ये कहानी हमें अपने जीवन के शुरुआती चरणों में अपने दादा-दादी से मिले प्यार, समर्थन और मार्गदर्शन के बारे में बहुत कुछ सीखा जाती हैं. और उनका यही प्यार और समर्थन हमारे जीवन को दिशा देने में मदद करता है.