भारत के महान समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की आज जयंती है. 1820 में आज ही के दिन उनका जन्म बंगाल के मेदिनीपुर ज़िले में हुआ था. उन्होंने बंगाल और हिंदु समाज में व्यापत बुराईयों को उखाड़ फेंकने के लिए अथक प्रयास किए थे. ख़ासकर महिलाओं के उत्थान के लिए उनके द्वारा किए गए प्रयासों को आज भी याद किया जाता है.

ईश्वर चंद्र विद्यासागर की गिनती आधुनिक भारत के जन्मदाताओं में की जाती है. उन्हें ग़रीबों और दलितों का संरक्षक माना जाता था. औपनिवेशिक काल में ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने समाज में महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए बहुत कार्य किए थे. वो महिलाओं की सशक्त आवाज़ बनकर खड़े हुए थे. बाल विवाह और बहु विवाह का उन्होंने जमकर विरोध किया था.

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विधवा पुनर्विवाह क़ानून 

वो शुरूआत से ही महिलाओं को शिक्षित करने करने के पक्षधर थे. इसके लिए विद्यासागर जी ने कई महिला विद्यालय भी खोले थे. इसके अलावा उन्होंने विधवा पुर्नविवाह के लिए आवाज़ उठाई थी. उनके प्रयासों का ही नतीजा था कि ब्रिटिश सरकार 1856 में विधवा पुनर्विवाह क़ानून पारित किया था. समाज के सामने एक उदाहरण पेश करने के लिए ही विद्यासागर जी ने अपने बेटे की शादी एक विधवा से की थी.  

विद्यासागर जी ने संस्कृत और बंगाली भाषा पर कई शोध भी किए थे. उन्होंने दोनों ही भाषाओं में कई क़िताबें भी लिखी. उनके संस्कृत के ज्ञान के चलते ही उन्हें विद्यासागर कहा जाता है, जबकि उनका असली नाम ईश्वर चंद्र बंदोंपाध्याय था. उन्होंने अपने संस्कृत विद्यालय के दरवाज़े दलितों के लिए भी खोल दिए थे.

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उनके विचार:

“बिना कष्ट के ये जीवन, बिना नाविक के नाव जैसा है, जिसमे खु़द का कोई विवेक नही. एक हल्के हवा के झोंके मे भी चल देता है.”

 “मनुष्य कितना भी बड़ा क्यों न बन जाए उसे हमेशा अपना अतीत याद करते रहना चाहिए.” 

“विद्या सबसे अनमोल ‘धन’ है, इसके आने मात्र से ही सिर्फ़ अपना ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का कल्याण होता है.”

रवींद्रनाथ टैगोर भी हुए थे उनसे प्रभावित 

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ईश्वर चंद्र के व्यक्तित्व से रवींद्रनाथ टैगोर भी काफ़ी प्रभावित हुए थे. उन्होंने अपनी क़िताब चरित्रपूजा में इस महान समाज सुधारक पर एक निबंध भी लिखा था. इसमें उन्होंने बताया कि एक समाजसुधारक और शिक्षाविद के रूप में उनके समकालीनों की तुलना में कैसे भिन्न थे.

उन्होंने तर्क दिया कि वो अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते अपनी सोच को यथार्थ में बदलने का माद्दा रखते थे. वो दूसरे बंगालियों कि अपेक्षा इंग्लिश नहीं अपनी मात्रा भाषा का अनुसरण करने में गर्व महसूस करते थे. वो एक सेल्फ़ मेड मैन थे.

ईश्वर चंद्र विद्यासागर के निधन पर रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था- ‘ये आश्चर्य करने वाली बात है कि भगवान ने 4 करोड़ बंगाली बनाए, लेकिन इंसान एक ही बनाया.’

उनकी मृत्यू के बाद उन्हें बहुत सी जगहों के नाम से याद किया जाता है. जैसे: 

विद्यासागर सेतु (पश्चिम बंगाल में एक नदी) 

विद्यासागर मेला (कोलकाता) 
मिदनापुर में विद्यासागर विश्वविद्यालय 
विद्यासागर स्ट्रीट (कोलकाता) 
विद्यासागर स्टेडियम (बारासात) 
विद्यासागर निवास स्थान (खड़गपुर)

भारतीय समाज में महिलाओं के शक्तिकरण के लिए किए गए विद्यासागर जी के प्रयासों को कभी भुलाया नहीं जा सकता.

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