ऑफ़िस से घर आ रही थी, तो घर के बगल में एक नया शोरूम देखा. शोरूम में अलग-अलग तरह का सामान मिल रहा था. बाहर से देखते-देखते कब मैं अंदर चली गयी, महसूस नहीं हुआ. अंदर जाते ही नज़र बचपन के एक खोये हुए ख़ज़ाने पर पड़ गयी. ये ऐसा ख़ज़ाना था, जिसने बचपन को अमीर बना दिया था.

साइकिल

किस का बचपन साइकिल के बिना बीता है? हां, आज के बच्चे ये दावा कर सकते हैं कि उन्हें बाइक्स पसंद हैं लेकिन हमारे बचपन में साइकिल उसे मिलती थी, जिसके या तो एग्ज़ाम में नंबर अच्छे आते थे या फिर उसके बड़े भाई के लिए नयी साइकिल आती थी. मेरे पास Avon की साइकिल थी. वो जो लाल वाली होती थी, लेडीज़ वाली.

पहले मम्मी चलाती थी, फिर मुझे मिल गयी. मुझे याद है, लखनऊ के अमीनाबाद से मम्मी वो साइकिल लेकर आयी थी और मैंने लगभग एक महीने तक उन्हें उस साइकिल को चलाने की प्रैक्टिस करते देखा था. उसके बाद कभी-कभी हमें Surprise देने मम्मी साइकिल में स्कूल आती थी. तब शर्म नहीं होती थी कि आपकी मां साइकिल में आपको स्कूल लेने आती थी. मां का स्कूल लेने आना ज़्यादा बड़ी ख़ुशी थी. मम्मी हम दोनों बहनों को उस लाल साइकिल में खींच के लेकर जाती. अभी उन यादों को याद करते हुए कभी इस बात पर ध्यान नहीं गया कि मम्मी हम दोनों को खींच कैसे पाती थी? बस वो फ़ीलिंग याद है, जो गर्मी में पसीना आने के बाद हवा के झोंके सी लगती थी.

शहर बदलने के बाद मम्मी ने साइकिल नहीं चलाई लेकिन तब तक मैं साइकिल चलाना सीख चुकी थी. तीन दिन में सीख गयी थी मैं, एक दिन तो सपने में चलाई थी. दादाजी आये हुए थे, उन्होंने दो तीन दिन तक पकड़-पकड़ कर चलाना सिखाया, फिर एक दिन छोड़ दिया और मैं बिना सहारे के चलाना सीख गयी. वैसी ख़ुशी आज तक नहीं मिली. उस दिन मुझे पहली बार ख़ुद को लेकर अच्छा फ़ील हुआ था. ख़ुशी भी ऐसी कि स्कूल में पूरे दिन हंसती रही. अपने दोस्तों में मैं पहली लड़की थी, जिसे साइकिल आती थी. अलग इज़्ज़त थी मेरी.

साइकिल चलाना आना आपको सबसे पहले आज़ादी का एहसास करवाता है. आप आज़ाद हैं... कहीं भी अपने पंख फैला सकते हैं... बस इन पंखों को थोड़ी सी हवा देनी होती है और चिड़िया उड़ जाती है. मैंने जितने साल साइकिल चलाई, उसकी चेन कभी लगानी नहीं आयी. वो भी मम्मी लगाती थी या फिर सड़क पर चलने वाले कोई अंकल. कभी-कभी साथ के बच्चे, जिन्हें ये समझ नहीं आता था कि कोई इतनी ज़रूरी चीज़ कैसे नहीं जानता. वैसे मुझे भी समझ नहीं आया या मैंने समझने की कोशिश ही नहीं की.

मैंने आखरी बार साइकिल 12वीं क्लास में चलाई थी... उस समय तक स्कूल में स्कूटी ले जाने का ट्रेंड आ चुका था और स्कूटी मेरे पास भी थी. पर मेरे पास साइकिल भी थी. उस वक़्त उससे कोई लगाव नहीं बचा था. बोझ लगती थी वो, जिसे मैं ताकत लगा कर खींचती थी. वो स्कूल पास करने के कई साल तक घर में अपनी जगह पर रही... मैं छुट्टियों में जब घर आती थी, तो उसे देखती भी नहीं थी. फिर एक दिन मम्मी नई साइकिल ले आयी. उस वक़्त भी मुझे उसकी कमी महसूस नहीं हुई. उस वक़्त हुई, जब में उस शोरूम के अंदर 15 मिनट तक खड़ी थी. उस वक़्त मुझे अपने बचपन का हर एक लम्हा याद गया. उस हर एक लम्हे में मेरी लाल साइकिल थी.