बचपन... मम्मी-पापा का प्यार वो भी एक्सट्रा केयर वाला. बड़े होने के बाद हम सभी वो वाली फ़ीलिंग मिस करते हैं. बैंक बैलेंस में कितने भी ज़ीरो एकस्ट्रा लग जाएं, पर पापा के साथ बैठकर सिक्योर फ़ील करना और मां के गोद में सिर रखते ही सबकुछ भूल जाना हम सभी को याद आता ही है.


पर उनका क्या जिनके मां-बाप बचपन में ही उन्हें छोड़कर चले जाते हैं. कैसे बड़े होते हैं वो बच्चे जिनके ऊपर माता-पिता का साया नहीं होता. Humans of Bombay ने एक ऐसी ही लड़की की कहानी शेयर की है जिसने पहले तो मां को खोया, फिर पिता ने उसे बेसहारा कर दिया और फिर उसे मिली उसे ऐसी मां जिसने उसे न सिर्फ़ गोद लिया बल्कि उसका कन्यादान भी किया.

कहानी को जस का तस रखने की कोशिश कर रहे हैं-

'मैं 9 साल की थी जब मेरी मां की एक दुर्घटना में मौत हो गई. मैं इससे उबर पाती इससे पहले मेरे पिता को मां की मृत्यु के मुख्य संदिग्ध के रूप में गिरफ़्तार कर लिया गया. मेरी पूरी ज़िन्दगी कुछ पलों में बिखर गई. मेरे अंकल, आंटी को क़ानूनी तौर पर मेरी Custody मिली और 5 साल तक मैं उन्हीं के साथ रही. बहुत मुश्किल दौर था वो- मेरे दोस्त नहीं थे, सबके माता-पिता स्कूल फंशन में आते पर मेरे लिए कोई नहीं था. मैं बहुत अकेली थी- मेरा कोई बचपन था ही नहीं.


जब पिता को जेल से छूटे तब मैं 15 साल की थी. मैं बहुत ख़ुश थी कि मैं फिर से उनके साथ रहूंगी. इसीलिए जब उन्होंने दोबारा शादी का फैसला किया तो मैं राज़ी हो गई क्योंकि मैं हम सब की ख़ुशी चाहती थी.

शादी के बाद मेरी सौतेली मां मेरे पिता से कहने लगी कि मैं उनकी ज़िम्मेदारी नहीं हूं. मेरे पिता राज़ी हो गये और उन्होंने मुझे चले जाने को कहा. मैं आंटी के पास नहीं जाना चाहती थी इसीलिए बहुत दर्द होने के बावजूद मैं वहीं रही. मेरे पिता मुझे खाना, पैसे, कपड़े कुछ नहीं देते थे-- मैं गुज़ारा चलाने के लिए ट्यूशन देने लगी.

कहने को तो हम एक ही छत के नीचे रहते पर मेरे पिता का व्यवहार ऐसा था मानो मैं उनके लिए मर चुकी हूं. कुछ दिनों बाद उनकी पत्नी गर्भवती हुई तो वो मेरे पास आई और कहा, 'मैं तुम्हारा साया भी अपने बच्चे पर पड़ने देना नहीं चाहती'- मेरे पिता और वो मुझे घर में अकेला छोड़कर चले गए.


मैं बुरी तरह टूट चुकी थी और मुझमें कोई शक्ति नहीं थी. पर तभी ट्यूशन पढ़ने वाले एक बच्चे की मां जिन्हें मेरे जीवन के बारे में सबकुछ पता था ने मुझे अपने घर पर रहने का प्रस्ताव दिया. वो अपने बच्चों का ध्यान रखने के लिए किसी को ढूंढ रही थी. मेरे लिए ये आख़िरी उम्मीद की किरण थी.

मैं उनके साथ रहने लगी, वो मेरा अपने बच्चों की तरह ही ध्यान रखतीं. उन्होंने मुझे खाना, कपड़े वो सबकुछ दिया जिसकी मुझे ज़रूरत थी. हम किसी आम परिवार की तरह ही बाहर जाते, साथ खाना खाते- ये सब मैंने पहले कभी नहीं किया था. उसने मेरी वकालत की पढ़ाई की फ़ीस भी भरी. आख़िरकार मुझे एक अजनबी की वजह से पता चला कि परिवार का मतलब क्या होता है.

ग्रेजुएशन के बाद, मैंने एक नौकरी ढूंढ ली और मुझे ज़िन्दगी में सालों बाद Stability मिली. उस औरत और उसके परिवार के साथ रहकर मैं अपनी पिछली ज़िन्दगी को भूलकर आगे बढ़ पाई और ये समझ आया कि हर किसी के लिए ज़िन्दगी में उम्मीद होती है.

कुछ दिनों पहले मेरी शादी हुई और मेरी 'मां' ने मेरा कन्यदान किया और मुझे सोना गिफ़्ट किया. मेरी शादी में उन्हें सारी रस्में निभाता देखकर मुझे एहसास हुआ कि ख़ुशी किसे कहते हैं.


कभी-कभी हम ज़िन्दगी में छोटी-छोटी चीज़ों की एहमियत नहीं समझते... हम ये नहीं समझते कि उन्हें तवज्जो देना कितना ज़रूरी है, मेरे लिए वो चीज़ था परिवार. मेरी मां नहीं थी, पिता नहीं थे और आधी ज़िन्दगी मैंने माता-पिता के प्यार के लिए तड़पकर बिताई और वो मिली भी नहीं. पर मेरे पास अब वो है, मुझे मां मिली- ख़ून के रिश्ते की नहीं प्यार के रिश्ते की. और इसके लिए मैं ज़िन्दगीभर शु्क्रगुज़ार रहूंगी. अब मुझे समझ आ गया है कि जो चीज़ें ज़िन्दगी आसानी से देती है उनकी एहमियत समझनी चाहिए. '

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