बिरसा मुंडा ये नाम सुनते ही ज़ेहन में एक साहसी व्यक्ति की तस्वीर बन जाती है. वो ऐसे जननायक थे जिन्होंने आदिवासियों के हक़ के लिए लड़ाई लड़ी. वो सिर्फ़ आदिवासियों के ही नहीं आम लोगों के भी जननायक हैं. उन्होंने अंग्रेज़ी हुक़ूमत के ज़ुल्म के ख़िलाफ जमकर अपनी आवाज़ बुलंद की थी. बिरसा मुंडा की कहानी हमें विपरीत परिस्थितियों भी हार न मानने की प्रेरणा देती है.

बिरसा मुंडा को आदिवासी समाज 'भगवान बिरसा मुंडा' कहकर आज भी पूजता है. वो 19वीं सदी के प्रमुख आदिवासी जननायक थे. 1857 में इनका जन्म झारखंड के रांची ज़िले के गांव उलीहातू में हुआ था. उनके अधिकतर परिवारवालों ने तब तक ईसाई धर्म अपना लिया था और बचपन में उनकी प्रारंभिक पढ़ाई भी एक मिशनरी स्कूल में हुई.

birsa munda
Source: kolkata24x7

यहां उन्होंने देखा कि वो लोग आदिवासी संस्कृति का मज़ाक उड़ाते हैं. इसलिए वो भी उनका मखौल उड़ाने लगे. नतीजन उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया. इसके बाद वो स्वामी आनंद जी के संपर्क में आए. उन्होंने बिरसा को हिंदू धर्म और महाभारत के बारे में विस्तार से ज्ञान दिया.

उनसे ज्ञान हासिल करने के बाद उन्होंने आदिवासियों को अपने हक़ और अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया. बिरसा ने देखा की जिस जंगल और ज़मीन को आदिवासी मां की तरह पूजते हैं उस पर अंग्रेज़ों ने ज़मीदारों के साथ मिलकर उनका शोषण करना शुरू कर दिया है. ब्रिटिश सरकार ने आदिवासियों के कई अधिकारों का हनन किया था. इसके ख़िलाफ़ बिरसा मुंडा ने मोर्चा खोला.

birsa munda
Source: indiatoday

उन्होंने "उलगुलान" क्रांति की शुरुआत की. इसका शाब्दिक अर्थ 'भारी कोलाहल व उथल-पुथल' है. बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को बताया कि ये उलगुलान सृजन के लिए होगा, शोषण के ख़िलाफ होगा, उनके अधिकारों के लिए होगा, ब्रिटिश और सामंती व्यवस्था के ख़िलाफ होगा. और लोकसत्ता को स्थापित करने के लिए होगा.

फिर बिरसा मुंडा ने अपने लोगों के दो दल बनाए. एक धर्म का प्रचार करता और दूसरा राजनीतिक कार्य करने लगा. उनके द्वारा गठित गोरिल्ला सेना अंग्रेज़ों के ज़ुल्म के ख़िलाफ लड़ती रही और कई मौर्चों पर जीत भी हासिल की. अंग्रेज़ अब बिरसा मुंडा के नाम से खार खाने लगे थे.

birsa munda
Source: mlupdate

1899 में उनकी सेना ने चक्रधरपुर के थाने पर हमला कर दिया. अंग्रेज़ों की गोलियों और बम के सामने आदिवासियों के तीर कमान टिक नहीं सके. बिरसा के कई साथी मारे गए और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. कहते हैं कि उनकी लोकप्रियता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार बहुत डरी हुई थी. इसलिए उन्होंने जेल में ही बिरसा को ज़हर देकर मार डाला और लोगों से कहा कि उनकी मौत हैजे से हो गई.

birsa munda
Source: wordpress

इस तरह उन्होंने आदिववासियों के अधिकारों के लिए लड़ते हुए शहादत दे दी. वो भले ही आज हमारे बीच न हों, लेकिन आदिवासी लोक गीतों और साहित्य में वो आज भी ज़िंदा हैं. उनकी याद में देश की संसद के सेंट्रल हॉल में उनकी एक तस्वीर भी लगाई गई है. यही नहीं रांची के हवाई अड्डे का नाम भी उनके नाम पर ही बिरसा मुंडा हवाई अड्डा कर दिया गया है.

बिरसा मुंडा जी को हमारा शत-शत नमन.
Life से जुड़े दूसरे आर्टिकल पढ़ें ScoopWhoop हिंदी पर.