17 नवंबर, 1962, किसी आम दिन के तरह ही था. गढ़वाल राइफ़ल्स रेजिमेंट के जसवंत सिंह रावत, अपनी यूनिट, 4 गढ़वाल राइफ़ल्स के साथ NEFA क्षेत्र में तैनात थे.   

Source: Lokmat

रावत की बटालियन ने चीनी सेना के 2 हमलों को नाक़ाम कर चुकी थी. चीनी सेना अपने चौथे हमले के लिए तैयार थी, एक रिपोर्ट के मुताबिक़, तवांग में चीनी सैनिक बुद्ध की एक मूर्ति का हाथ काटकर ले जा चुके थे.   

Source: Quora

सुबह के लगभग 5 बजे चीनी सैनिकों ने सेला टॉप के ज़रिए फिर से हमला किया, जगह थी नूरानांग. रावत ने अपनी पोस्ट का चार्ज लिया और चीनियों के हमले का जवाब दिया. साधनों की कमी की वजह से रावत की कंपनी को आगे बढ़ने से रोका गया पर रावत ने अकेले ही दुश्मन को भगाने का निर्णय लिया. 17 नवंबर को शुरू हुई जंग, 72 घंटों तक चली. रावत ने अकेले ही पोस्ट की कमान संभाले रखी. रावत ने अकेले 300 चीनी जवान मार गिराए.


रावत की सहायता की थी 2 लड़कियों ने, सेला और नूरा. इन दोनों की मदद से रावत ने 3 अलग-अलग जगहों पर हथियार लगाये और उन्हें 3 दिनों तक लगातार चलाया.  

Source: YouTube

सेला एक ग्रेनेड ब्लास्ट में मारी गई और नूरा को भी चीनियों ने बंदी बना लिया. स्थानीय कहानियों की मानें तो रावत को खाना पहुंचाने वाले को भी चीनियों ने पकड़ लिया था जिसने रावत का पता बता दिया. चीनियों ने रावत को बंदी बना लिया पर रावत ने ख़ुद को गोली मार ली और शहीद हो गए. 

चीनी सैनिकों ने रावत का सिर काट लिया और अपने साथ लेकर गए. युद्ध ख़त्म होने के बाद, रावत की वीरता के बारे में सुनने के बाद चीनी कमांडर ने सम्मान के साथ रावत का शीश वापस किया.  

Source: Rediff

रावत ने 21 साल की उम्र में देश की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की. उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. रावत के लिए स्थानीय निवासियों ने एक बौद्ध मंदिर बनाया. भारतीय सेना का मानना है कि रावत आज भी देश की सुरक्षा कर रहे हैं. उनकी शहादत की जगह पर एक घर बनाया गया जहां रोज़ उनका बिस्तर लगाया जाता है, उनके कपड़े-जूते साफ़ रखे जाते हैं, उनकी चिट्ठियां भी आती हैं, रखी जाती हैं और अगले दिन हटाई जाती है. 

Source: Google Sites
Source: Tour My India

स्थानीय निवासियों की कहानी और सेना की कहानी में थोड़ा अंतर है पर पूरा देश रावत की वीरता को सलाम करता है.