मेरे दो बेहद ही पुराने दोस्त हैं. हम तीनों की बचपन की यारी है. ये वो दोस्त हैं जिनके साथ मैंने अपना बचपन जिया है. स्कूल से लेकर घर तक हमने ख़ूब सारी शैतानी के साथ-साथ ढेरों यादें बनाई हैं. ये वो दोस्त हैं जिनके बिना मेरा बचपन अधूरा है. वो दोस्त जिनको मम्मी बोलती हैं, तीनों जब देखो तब एक दूसरे में चिपके रहते हैं.

स्कूल ख़त्म होने के बाद से ही हम तीनों अपने-अपने करियर में आगे बढ़ने के लिए अलग-अलग शहरों में चले गए. एक चेन्नई, तो दूसरा भोपाल और मैं यहां दिल्ली आ गई. उसके बाद से हमारी बेहद ही कम मुलाक़ातें हुई हैं. जब कॉलेज में थे तो साल में एक बार छुट्टियों के दौरान मिल लिया करते थे. और हमेशा सोचा करते थे कि एक बार जॉब लग जाएगी तो तीनों एक साथ हर किसी के शहर एक बार आकर अच्छा समय बिताएंगे.

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ख़ैर, कॉलेज ख़त्म हुआ और जो रहा-सहा मिलना जुलना था वो भी बंद सा ही हो गया था. हम तीनों को जॉब लग गई थी और अपन-अपनी ज़िंदगियों में व्यस्त से हो गए थे. फ़ोन और सोशल मीडिया ही हम तीनों के कनेक्शन या कॉन्टेक्ट का एक मात्र सहारा बन कर रह गया था. इस बीच कई बार प्लान भी बने कि कहीं चलते हैं, जॉब से ब्रेक लेते हैं. मगर वो सारी बातें हमेशा की तरह व्हाट्सअप ग्रुप तक सिमट कर रह जाती थीं.

अभी हाल ही में उन दोनों का मेरे पास अचानक कॉल आया कि हम दोनों दिल्ली आ रहे हैं तुम से मिलने. शुरू में तो मुझे लगा ये हमेशा की तरह इनका कोई मज़ाक या प्लान होगा जो कि कल-परसों तक फ़ेल हो जाएगा. मगर नहीं, इस बार वो दोनों सच में आ रहे थे.

मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना न था. मेरे बचपन के दो पुराने और बेहद क़रीबी दोस्त मेरे से मिलने दिल्ली आ रहे थे. हम तीनों एक अरसे बाद मिलते. मैंने मन में पूरा सोच लिया था कि हम क्या-क्या करेंगे, कहां कहां जाएंगे.. सब !

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मेरे ये दोनों दोस्त एक लम्बे वक़्त से एक दूसरे को डेट भी कर रहे थे.

जिस दिन ये दोनों आने वाले थे मैंने जल्दी-जल्दी ऑफ़िस का काम निपटाया और उनको पिक-अप करने मेट्रो स्टेशन गई. दोनों को देखती ही मैं बेहद ख़ुश थी. मैंने उन दोनों को गले लगाया और अपने घर ले गई.

घर पर हमने ढेरों बातें की.. स्कूल की, ज़िंदगी से जुड़ी, अपनी-अपनी जॉब्स की, उन दोनों के रिश्ते के बारे में और इधर- उधर की कई और बातें. समय एक दम सही बीत रहा था. आख़िर, मेरे सबसे क़रीबी दोस्त मेरे साथ थे, मुझे और क्या ही चाहिए था!

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मगर बीच-बीच में कुछ अटपटा सा भी लग रहा था. वो दोनों बीच-बीच में छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करने लगते थे. शुरू में तो मुझे लगा क्योंकि मुझे इतना वक़्त हो गया है मिले तो इसलिए मुझे उनके इस व्यवहार के साथ ढलने में वक़्त लगेगा. ऊपर से वो दोनों एक बेहद लंबे समय से एक दूसरे को डेट कर रहे थे तो उनके बीच ऐसी लड़ाइयां होती रहती होंगी, ये सोच कर भी मैंने उन्हें इग्नोर करना सही समझा.

मगर जैसे-जैसे मैं उनके साथ और समय बिताती जा रही थी ,मुझे एहसास हुआ कि ये कुछ समय की बात नहीं है. ये दोनों तो हर छोटी-छोटी बात पर लड़ाई कर रहे थे. खाना क्या खाया जाए, कपड़े इधर क्यों डाल दिए, इसको यहां क्यों रखा... मतलब ऐसी कोई बात भी हो जिसको मैं सुलझा भी पाऊं या उसका कोई हल निकल सके, मगर यहां तो बेतुकी बातों पर भी लड़ाइयां चल रही थीं.

कुछ ही समय में ये मामूली सी दिखने वाली लड़ाइयां और बुरी होती चली गईं. बात यहां तक पहुंच गई की दोनों एक-दूसरे पर हाथ उठाने लगे और गंदी-गंदी गलियां भी देने लगे थे.

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ये सब अपने सामने होता देख कुछ समय के लिए तो मैं बेहद हैरान रह गई थी. हड़बड़ा सी गई थी, दोनों को समझ नहीं पा रही थी. समझ नहीं आ रहा था कि कैसे इनकी लड़ाइयां बंद करवाऊं, क्या करूं.

मैंने उनकी लड़ाइयों को सुलझाने की काफ़ी कोशिश की मगर उन्होंने मेरी एक भी नहीं सुनी. ऊपर से उन लड़ाइयों का कोई ओर या छोर हो तो मैं भी कुछ बेहतर समझा पाऊं मगर मेरी हर कोशिश व्यर्थ जा रही थी.

एक समय के बाद मैं उन दोनों को समझाते-समझाते बेहद थक गई थी. उस समय बस शांति चाहती थी.

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मुझे बेहद बुरा भी लग रहा था कि मेरे दो बेहद अच्छे दोस्त आपस में इस तरह लड़ रहे थे और मैं कुछ भी नहीं कर पा रही थी या ये कह लूं मैं अब उस मनोस्थिति में ही नहीं थी कि कुछ कर पाती.

मैंने क्या सोचा था कि हम तीनों इतने समय बाद साथ में एक अच्छा वक़्त बिताएंगे, ये करेंगे, वो करेंगे और यहां तो कुछ और ही हो रहा था.

उस वक़्त मेरे मन में बस यही चल रहा था कि ये सब जल्दी ख़त्म हो और कैसे भी करके ये दोनों यहां से जाएं भले ही इस वक़्त मेरी उनसे दोस्ती ही क्यों न टूट जाए. मेरे बर्दाश्त के बाहर था अब ये सब. मैं उन दोनों से पीछा छुड़ाने के लिए झूठ बोला कि मुझे अचानक से कोई बेहद ज़रूरी काम आ गया है जिसकी वज़ह से मैं उनके साथ अब और समय नहीं बिता पाउंगी और उन्हें मेरे यहां से जाना पड़ेगा.

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अगले दिन जैसे ही वो दोनों मेरे घर से गए सबसे पहले तो मुझे असीम शांति और चैन का अनुभव हुआ और अगले ही पल मैं फूट-फूटकर रोने लगी. मैं कई घंटे तक रोई. मुझे बेहद बुरा लग रहा था ये सोच कर कि मैंने इस तरह झूठ बोल कर उन दोनों को घर से निकाला. मगर मेरे पास उस समय कोई और रास्ता भी नहीं था.

इस पूरी घटना से उभरने में मुझे काफ़ी वक़्त लगा और मैं कभी भी अपनी ज़िंदगी में दोबारा ऐसी स्थिति में नहीं पड़ना चाहूंगी...कभी भी नहीं.

मैं पीछे मुड़ कर जब भी इस बात को सोचती हूं मुझे लगता है कि शायद उस दिन उन्हें मेरी ज़रूरत थी, शायद मुझे उनके साथ ऐसा नहीं करना चाहिए था...शायद मैं ग़लत थी. लेकिन फ़िर लगता है कि शायद उनको घर से निकालना ग़लत भी नहीं था क्योंकि ज़रूरी नहीं की हम हमेशा 'रेस्क्यूर' या 'मददगार' के रोल में आएं. हमें लगता है कि उन्हें हमारी ज़रूरत है मगर आख़िर कब तक ही हम उन्हें समझा सकते हैं. कभी-कभी आपको कोई रोल प्ले करने की ज़रूरत नहीं होती है. बस इतनी ज़रूरत है कि आप उस सिचुएशन को ख़ुद से दूर करें. ये उनकी ज़िंदगी है उन्हें फ़ैसला लेने दें.