'Humans of Bombay' ने अपने इंस्टाग्राम पेज पर एक ऐसे युवक की कहानी शेयर की है, जिसके पिता कश्मीर की झीलों की सफ़ाई किया करते थे, लेकिन झील के विषैले पानी के कारण जब पिता की मौत हो हुई, तो बेटे ने पिता के इस काम को पूरा करने का प्रण कर लिया.

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“As a child, I used to go up & down the Wular lake with Abbu–his job was to take out the trash from the lake & sell it to the Kabadi wala. He’d always tell me how important it is to keep the lake clean; it was sacred. Once, Abbu slipped from the boat & injured his leg. When we took him to the doctor, we found out that Abbu had leg cancer & that the toxic lake water might have caused it–within months, he passed away. I was 8 when the responsibility of Ammi & my 2 sisters fell on me. Ammi wasn’t well, so I left school & took Abbu’s job. I couldn’t forget what the doctors had said–the lake water killed Abbu & I was determined to clean it. So everyday, at 6 AM, I’d set out to collect trash & by evening, I’d have 10-15 kgs of plastic bottles, polythene & other waste. I’d sell it to the kabadiwala who then sent it to a recycling unit–I’d earn Rs.150-200 a day. Most of it, I’d give to Ammi & save the rest for my sister’s school fees. That was my routine for 7 years. Once, a kabadiwala told me, ‘Do you know you’ve bought me 12,000 kgs of plastic?’ Upon seeing the impact I’d made, I thought–what if my friends helped me? The cleaning process would be much faster. So, I motivated my friends & other students to do the same. Finally we could see patches of clear water after years–the neighbours who’d mock me for being a scavenger, praised me for my achievements. The word spread & in 2017, a documentary maker made a film on me. The Srinagar Municipal Corporation made me the ambassador of cleanliness; even the PM praised me. The corporation then gave me Rs.10,000 per 1.5 months to spread awareness! Over the last 3 years, I’ve travelled around Kashmir telling people to respect our waters–we’ve wronged our lakes & we need to make amends. It enrages me to see anyone throwing trash in the water; I give them a mouthful. Over time, I saved up & this year, I had enough to get my older sister married. Now, I want to buy a big house for Ammi & put my younger sister in a reputed school. I want Abbu to be happy wherever he is. I’ve abided by his teaching all my life–he was a good man & he died doing something we all should’ve been doing; keeping our country, it’s waters clean.”

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कश्मीर के बांदीपोरा ज़िले के रहने वाले इस युवक का नाम बिलाल अहमद डार है. बिलाल बचपन से ही अपने पिता के साथ कश्मीर की 'वुलर झील' पर कूड़ा उठाने जाया करता था. कूड़ा बीनकर जो कुछ भी कमाई होती थी उसी से परिवार का पेट पालते थे. इसलिए इलाक़े में लोग बिलाल के पिता को कबाड़ी वाले के नाम से जानते थे.

दरअसल, कई साल पहले बिलाल के पिता हमेशा की तरह झील की सफ़ाई में लगे हुए थे. इस दौरान वो नाव से फिसलकर झील में जा गिरे और उनका एक पैर बुरी तरह से जख़्मी हो गया. झील के टॉक्सिक पानी के कारण पैर के कैंसर का पता चला और कुछ समय बाद उनका निधन हो गया. 

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'जब हम उन्हें डॉक्टर के पास ले गए, तो हमें पता चला कि अब्बू को पैर का कैंसर था और झील के ज़हरीले पानी के कारण ऐसा हुआ है. कुछ ही महीनों में उनका निधन हो गया. मैं 8 साल का था जब अम्मी और मेरी 2 बहनों की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई. अम्मी ठीक नहीं थीं, इसलिए मैंने स्कूल छोड़ दिया और अब्बू की नौकरी ले ली. 

झील के ज़हरीले पानी से पिता की जान गयी है ये बात बिलाल को अक्सर चुभती थी. बावजूद इसके उसने ये काम करना जारी रखा, लेकिन बिलाल को कुछ अलग करना था. पिता की तरह झील का कूड़ा बीनकर परिवार का पेट पलना ही बिलाल का मक़सद नहीं था, बल्कि उसने ख़ुद से 'वुलर झील' की इस समस्या को जड़ से साफ़ करने का वादा किया था. 

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पिछले 7 सालों से बिलाल हर दिन सुबह 6 बजे उठकर 'वुलर झील' का कचरा साफ़ करने में लग जाता है. जायद के पिता ने उन्हें हमेशा ही झीलों को साफ़ रखने की सीख दी थी. इसलिए वो पिछले कई सालों से अकेले ही इनकी सफ़ाई में लगे हुए हैं.   

'मैं हर दिन सुबह 6 बजे उठकर शाम तक 'वुलर झील' से कूड़ा निकलने का काम करता हूं. इस दौरान मैं 10-15 किलो प्लास्टिक की बोतलें, पॉलिथीन और अन्य अपशिष्ट निकाल लेता हूं. इसके बाद मैं इसे कबाड़ीवाले को बेचता हूं. इससे मुझे प्रतिदिन 150-200 रुपये मिल जाते हैं.  

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बिलाल ने एक दिन झील से क़रीब 12,000 किलो प्लास्टिक कचरा निकाला. इस दौरान उसे एहसास हुआ कि अगर इस काम में कोई और भी मदद करे तो ये समस्या हमेशा के लिए ख़त्म हो सकती है. इसके बाद उसने अपने दोस्तों और अन्य छात्रों से भी झील की सफ़ाई में मदद करने का अनुरोध किया.  

1 महीने बाद ही बिलाल की ये कोशिश रंग लाई. झील की सफ़ाई का काम तेज़ी से होने लगा. इलाक़े के लोग अब बिलाल को कूड़ेवाले के बजाय सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में जानने लगे. डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म मेकर्स बिलाल के इस काम को लेकर एक डॉक्यूमेंट्री भी बना चुके हैं.  

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बिलाल ने कहा, साल 2017 में एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म मेकर ने मुझ पर एक फ़िल्म बनाई थी. इसके बाद 'श्रीनगर नगर निगम' ने मुझे स्वच्छता का ब्रांड एंबेसडर भी बनाया. निगम ने मुझे जागरूकता फ़ैलाने के लिए प्रति माह 10 हज़ार रुपये भी दिए थे. पीएम मोदी ने भी मेरी तारीफ़ की थी.  

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साल 2017 से लेकर 2020 तक बिलाल जागरूकता फ़ैलाने के लिए कश्मीर के कई इलाक़ों में गए. वो आज कश्मीर में झीलों की सफ़ाई के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर बन चुके. बिलाल अपनी मेहनत से आज बड़ी बहन की शादी करा चुके है. अब वो अपनी मां को घर और छोटी बहन को किसी अच्छे कॉलेज से पढ़ाना चाहते हैं.